पूना पेक्ट पर डा. आंबेडक और गांधी की तीव्र मतभेद पर अरूधती राय का विश्लेषण .

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एक था डाक्टर एक था संत ” आंबेडकर – गांधी संवाद जामूल रूप से डा. बी आर आंबेडकर लिखित प्रसिद्ध लेख अरूधंती राय ने नस्ल और जाति का विनाश { 1936} के टीका सहित संस्करण की प्रस्तावना के रूप में ,लिखा गया था.
उक्त पुस्तक में पूना पेक्ट में डा.आंबेडकर और गांधी के टकराव को एक दम अलग तीखे तरीके से पूना पेक्ट का विवरण टकराव शीर्षक से लेकर लिखा है।
पूना पेक्ट पर पहले भी खूब लिखा गया हैं लेकिन अरूंधती राय की लेखनी काफी प्रमाणित मानी जाती है।कई नये तथ्यों के साथ यह लेख सीजीबास्केट में प्रस्तुत है।आभार सहित
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टकराव

काग्रेस ने 1930 में हुए पहले गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार किया था , लेकिन दसरे में उसने गांधी को अपने प्रतिनिधि के तौर पर मनोनीत कर दिया । सम्मेलन का उद्देश्य स्वशासन के लिए , एक नया संविधान तैयार करना था । राजे रजवाड़े और विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधि – मुसलमान , सिख , ईसाई , पारसी और अछूत मौजूद थे । आदिवासियों का प्रतिनिधित्व नहीं था । अछूतों के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर था । यह पहली बार था जब उन्हें एक अलग निर्वाचक जनसमूह के प्रतिनिधि के तौर पर आमन्त्रित किया गया था । सम्मेलन में कई समितियाँ थीं , उन्हीं में से एक अल्पसंख्यक समिति थी , जिसका काम था बढ़ते हुए साम्प्रदायिक सवाल का व्यावहारिक समाधान खोजना यह सम्भवतः सबसे ज्वलनशील मुद्दा था और शायद इसीलिए , ब्रिटिश प्रधानमंत्री , रामसे मकडोनाल्ड इसकी स्वयं अध्यक्षता कर रहे थे ।

  यही वह समिति थी जिसके समक्ष आंबेडकर ने अपना ज्ञापन प्रस्तुत किया , जिसका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया : स्वशासित भारत के भावी संविधान में , दमित वर्गों की सुरक्षा के लिए राजनीतिक संरक्षण की योजना । यह अपने समय का , अधिकारों और नागरिकता पर , उदारवादी बहस के ढाँचे के भीतर , एक क्रन्तिकारी दस्तावेज़ था । इसके द्वारा आंबेडकर ने , कानून से वही सब प्राप्त करने की कोशिश की जो उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक रूप से हासिल करने का स्वप्न देखा था । यह दस्तावेज़ कुछ विचारों का एक प्रारम्भिक मसौदा था जिसे आंबेडकर अन्ततः 1947 के बाद के भारतीय के संविधान में डालने में कामयाब रहे ।

शर्त नम्बर 1 : समान नागरिकता ‘ के अन्तर्गत कहा गया :

पुश्तैनी बंधुआ होने की अपनी वर्तमान स्थिति में , दमित वर्ग , खुद को बहुसंख्यक शासन के हवाले करने की सहमति नहीं दे सकता । इससे पहले कि बहुमत शासन की स्थापना हो , अस्पृश्यता की व्यवस्था से दमित वर्ग की मुक्ति , एक मुकम्मल तौर पर प्राप्त तथ्य होना चाहिए । इसे बहुसंख्यक की मनमर्जी पर कतई नहीं छोड़ा जा सकता । दमित वर्गों को , राज्य के अन्य नागरिकों के समान , सभी नागरिक अधिकारों का हक़दार , स्वतंत्र नागरिक बनाना आवश्यक है । /

ज्ञापन ने आगे जा कर चित्रण किया कि कौन – कौन से मौलिक अधिकारों का गठन होगा , और वे कैसे संरक्षित किए जाएंगे । इसने अछूतों को सभी सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश का अधिकार दिया । सामाजिक बहिष्कारों के विषय पर इसमें बहुत गहन चर्चा की गई , और सुझाव दिया कि इसे एक दंडनीय अपराध घोषित कर दिया जाए । इसमें ऐसे बहुत से उपाय निर्धारित किए गए , जिनसे अछूतों को सामाजिक बहिष्कार से संरक्षित किया जाए , और सवर्ण हिन्दुओं को उकसाने और बढ़ावा देने के लिए दंडित किया जाए । शर्त नम्बर 5 में कहा गया कि एक लोकसेवा आयोग का गठन हो , जो सुनिश्चित करे कि अछूतों का ‘ सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व ‘ हो । यह वही है जो अन्ततः शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था में विकसित किया गया है , और जिसके विरुद्ध विशेषाधिकारप्राप्त जातियों ने हाल ही में उग्र आन्दोलन किए हैं ।

     आंबेडकर के ज्ञापन का सबसे अनोखा पहलू चुनावी व्यवस्था के भीतर , सकारात्मक भेदभाव की व्यवस्था का प्रस्ताव था । आंबेडकर यह नहीं मानते थे कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अकेले ही अछूतों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित कर सकता है । चूंकि अछूत आबादी देश - भर में हिन्द गाँवों की सरहदों के बाहर छोटी बस्तियों में बिखरी हुई थी , इसलिए आंबेडकर ने महसूस किया कि एक राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र के भौगोलिक सीमांकन के भीतर वे हमेशा अल्पसंख्यक ही रहेंगे , और कभी भी अपनी पसन्द के उम्मीदवार को चुनने की स्थिति में नहीं होंगे । उन्होंने सुझाव दिया कि अछतों को , जो न जाने कितनी सदियों से उपेक्षित रहे हैं , और अवमूल्यन का शिकार हुए हैं , पृथक् निर्वाचिका दी जाए , ताकि वे दकियानूसी हिन्दुओं की दखलन्दाजी के बगैर , अपने नेतृत्व में , एक राजनीतिक चुनाव क्षेत्र विकसित कर सकें । इसके साथ - साथ , इसलिए कि उनका मुख्यधारा की राजनीति से सम्बन्ध बना रहे । आंबेडकर ने सुझाव दिया कि उन्हें सामान्य उम्मीदवारों के लिए भी वोट का अधिकार मिले । पृथक् निर्वाचिका और दोहरे वोट , दोनों अधिकार दस वर्ष की अवधि के लिए लागू होने थे । हालाँकि विस्तार में परे ब्यौरे पर तो बहस नहीं हुई , लेकिन जब सम्मेलन सम्पन्न हुआ तो सभी प्रतिनिधियों ने सहमति जताई कि अछूतों को , अन्य अल्पसंख्यकों की तरह , पृथक निर्वाचिका का अधिकार मिलना ही चाहिए । 


    जिन दिनों लन्दन में पहला गोलमेज़ सत्र था , भारत में खलबली मची थी । जनवरी , 1930 में कांग्रेस द्वारा ' पूर्ण - स्वराज ' यानी पूरी आजादी की माँग की घोषणा कर दी गई थी । गांधी ने , अपनी सबसे कल्पनाशील राजनीतिक क्रिया - नमक सत्याग्रह का प्रक्षेपण करके , एक राजनीतिक संगठनकर्ता के रूप में अपनी बुद्धिमत्ता और प्रतिभा का प्रदर्शन किया । उन्होंने भारतीयों को समुद्र तक मार्च करने , और अंग्रेज़ों का नमक - कर क़ानून तोड़ने का आह्वान किया । उनके आह्वान पर सैकड़ों - हजारों भारतीय लामबंद हो गए । जेलों को तूंस - ठूसकर खचाखच भर दिया गया । नब्बे हजार लोगों की गिरफ्तारी हुई । नमक और पानी के बीच , सछूतों के सत्याग्रह और अछूतों के दुराग्रह के बीच , एक सुस्पष्ट विभाजित कायनात फैली पड़ी थी - राजनीति की , दर्शनशास्त्र की , और नैतिकता की ।


           मार्च 1931 में सम्पन्न हुए कराची अधिवेशन में , कांग्रेस ने एक स्वतंत्र भारत के लिए मौलिक अधिकारों का संकल्प पारित किया । यह एक मूल्यवान , प्रबुद्ध दस्तावेज़ था , और इसमें कुछ वे अधिकार भी शामिल कर लिये गए थे जिनके लिए आंबेडकर ने अभियान चला रखा था । इसने एक आधुनिक , धर्म निरपेक्ष और बड़े पैमाने पर समाजवादी राज्य की नींव रखी । अधिकारों में शामिल थे - अभिव्यक्ति , प्रेस , एकत्र होने और संस्थाओं के निर्माण की आजादी . क़ानून के सामने सभी की बराबरी , सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार , निःशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा , प्रत्येक नागरिक को जीवन जीने के लिए आवश्यक गारंटीशुदा न्यूनतम वेतन , और काम के सीमित घंटे । इसमें महिलाओं और किसानों के संरक्षण , प्रमुख उद्योगों , और खानों और परिवहन के राज्य स्वामित्व या नियंत्रण को रेखांकित किया गया । सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि इसने धर्म और राज्य के बीच एक अग्नि - कवच बनाया । 

        मौलिक अधिकारों के पारित प्रस्तावों के सराहनीय सिद्धान्तों के बावजद । समाज के निचले तल से देखने पर दृश्य थोड़ा भिन्न था । 1930 के प्रान्तीय विधायिकाओं के चुनाव उसी समय हुए जब नमक सत्याग्रह चल रहा था । कांग्रेस ने चुनावों का बहिष्कार किया था । सम्मानजनक ' हिन्दुओं को , जिन्होंने बहिष्कार की परवाह नहीं की , और स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खड़े हो गए , शर्मिदा करने के लिए कांग्रेस ने ऐसे उम्मीदवार खड़े किए जो अछूत थे - दो मोची , एक नाई , एक दूधवाला और एक सफाईकर्मी । इसके पीछे विचार यह था कि कोई भी , स्वाभिमानी विशेषाधिकारप्राप्त सवर्ण हिन्द , किसी ऐसे संस्थान का हिस्सा नहीं बनना चाहेगा जहाँ उसे अछूतों के बराबर रखा गया हो । अछूतों को नकली उम्मीदवार बनाकर खड़ा करना , कांग्रेस पार्टी की वह रणनीति थी जो 1920 के चुनावों से शुरू हुई और 1943 तक चली । आंबेडकर कहते हैं : 
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हिन्दू स्वतंत्र टिकट पर न खड़े हों , इसके लिए कांग्रेस ने कौन से साधन अपनाए ? ऐसे साधन जिनसे विधायिकाएँ तिरस्कार का पात्र बनें । तदानुसार विभिन्न प्रान्तों में कांग्रेस ने तख्तियाँ उठाकर जुलूस निकाले , यह नारा लगाते हुए ‘ कौन जाएगा विधान सभा में ? केवल नाई , मोची , कुम्हार और मेहतर । ‘ जुलूस में एक व्यक्ति नारे के पहले हिस्से के रूप में सवाल करता था , पूरी भीड़ दूसरे हिस्से को दोहराती , सवाल के उत्तर के रूप में । ##

             गोलमेज सम्मेलन में , गांधी और आंबेडकर में टकराव हो गया , दोनों का दावा था कि वे ही अछ्तों के असली प्रतिनिधि हैं । सम्मेलन कई हफ्तों तक चला । गांधी अन्ततः मुसलमानों और सिखों की पृथक् निर्वाचिका के लिए राजी हो गए , लेकिन आंबेडकर के अछूतों के लिए पृथक् निर्वाचिका के तर्क पर सहमति नहीं दी । गांधी ने सामान्य रिवाजी शब्द आडम्बर का सहारा लिया : " मैं चाहूँगा कि हिन्दू धर्म की मृत्यु हो जाए , बजाए इसके कि अस्पृश्यता जीवित रहे ।

 गांधी ने यह मानने से इनकार कर दिया कि आंबेडकर को अछूतों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है । आंबेडकर भी अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं थे , और न ही इसकी उन्हें कोई जरूरत थी । आद धर्म के मंगू राम सहित , भारत - भर के अछूत समूहों ने , आंबेडकर के समर्थन में तार भेजे अन्ततः गांधी ने कहा , " जो अछूतों के राजनीतिक अधिकार की बात करते हैं वे अपने भारत को जानते ही नहीं । 

वे नहीं जानते कि भारतीय समाज का निर्माण कैसे हुआ है , और इसलिए मैं अपनी पूरी ताकत के साथ कहना चाहता है कि यदि , इसके विरोध में , मैं एक अकेला व्यक्ति भी रहूँगा , तो भी , मैं अपनी जान देकर भी इसका विरोध करूँगा । ' अपनी धमकी देने के बाद , गांधी भारत वापसी का जलपोत पकड़ निकल लिए । रास्ते में वे रोम में मुसोलिनी से मिले और उसके गरीबों की देखभाल , अत्यधिक शहरीकरण के विरोध , पूँजी और श्रम के बीच बेहतर समन्वय के प्रयासों से बेहद प्रभावित हुए । 

        एक साल बाद , रामसे मक्डोनाल्ड ने साम्प्रदायिक सवाल पर ब्रिटिश सरकार के फैसले की घोषणा की । पंचाट में , अछतों को बीस वर्षों के लिए पृथक् निर्वाचिका का अधिकार दे दिया गया । उस समय गांधी पूना की यरवदा केन्द्रीय जेल में सजा काट रहे थे । जेल से ही उन्होंने घोषणा कर दी कि यदि अछूतों के लिए पृथक् निर्वाचिका का निर्णय वापस नहीं लिया गया तो वे अनशन करेंगे , जो उनकी मृत्यु तक जारी रहेगा - आमरण अनशन ।

        एक महीने तक उन्होंने इन्तजार किया जब उनकी ज़िद नहीं मानी गई तो उन्होंने जेल में ही आमरण अनशन शुरू कर दिया । यह आमरण अनशन पूरी तरह से , उनके अपने ही बताए हुए सत्याग्रह के सिद्धान्तों के खिलाफ़ था । यह एक बेशर्मीपूर्ण ब्लैकमेल था , जो आत्महत्या की सार्वजनिक धमकी की चाल से कम नहीं था । ब्रिटिश सरकार ने कह दिया कि इस प्रावधान को केवल तभी निरस्त करेगी , जब अछूत इसके लिए राजी होंगे । पूरा देश लटू की तरह घूम गया । सार्वजनिक बयान जारी किए गए , याचिकाओं पर हस्ताक्षर किए गए , प्रार्थनाएँ की गईं , सभाओं का आयोजन हुआ , अपीलें की गई । 

यह एक हास्यास्पद स्थिति थी : विशेषाधिकारप्राप्त सवर्ण हिन्दुओं ने , जिन्होंने हर सम्भव तरीके से खुद को अछूतों से अलग किया , जिन्होंने अछूतों को मानवीय संग - साथ के क़ाबिल भी नहीं समझा , जो उनके स्पर्श मात्र से भी बचते , दूर भागते - फिरते थे , जो अलग भोजन , पानी , सड़कें , मन्दिर और कुएँ चाहते थे , अब कह रहे थे कि यदि अछतों को पृथक् निर्वाचिका प्रदान कर दी गई तो भारत के टुकड़े - टुकड़े हो जाएंगे । और गांधी , जो पूरे जोश और मुखरता से , अछूतों का पृथक्करण करनेवाली व्यवस्था में दृढ़ - विश्वास व्यक्त करते थे , अछूतों को पृथक् निर्वाचिका से वंचित करने के लिए , खुद को भूखों मारने पर तुले थे । इसका सार यह था कि सवर्ण हिन्दू , अछूतों के लिए अपने दरवाजे बन्द करने की शक्ति तो चाहते थे , लेकिन वे यह क़तई नहीं चाहते थे कि , अछतों को भी वह शक्ति मिले जिससे वे सवर्णों पर अपने दरवाजे बन्द कर सकें । 

आकाओं को पता था कि चुनने का अधिकार एक बहुत बड़ी ताक़त होती है । जैसे - जैसे उन्माद बढ़ने लगा , आंबेडकर के ऊपर खलनायक का लेबल । चस्पा कर दिया गया , गद्दार बता दिया गया , एक ऐसा ग़द्दार जो भारत के 

टुकड़े – टुकड़े करना चाहता था , जो गांधी की हत्या करने पर तुला था । गरम दल और नरम दल के राजनीतिक दिग्गज , टैगोर , नेहरू और सी . राजगोपालाचारी गांधी के पक्ष में जोर – शोर से खड़े हो गए । गांधी को रिझाने के लिए , विशेषाधिकारप्राप्त सवर्ण हिन्दुओं ने सड़कों पर अछूतों के साथ सहभोज का दिखावा करना शुरू कर दिया , और कई हिन्दू मन्दिरों के द्वार अछुतों के लिए खोल दिए गए , हालाँकि अस्थायी तौर पर ही । इस समायोजन की सद्भावना – प्रदर्शन के पीछे , तनाव की एक दीवार भी खड़ी हो रही थी । बहुत सारे अछूत नेताओं को डर था कि यदि आमरण अनशन से गांधी की कहीं जान ही चली गई तो आंबेडकर को इसका जिम्मेदार ठहराया जाएगा । और फिर इससे साधारण अछूतों की जाने जोखिम में पड़ जाएँगी । उन्हीं में से एक एम . सी . राजा मद्रास का अछूत नेता था , जिसने एक प्रत्यक्षदर्शी के बयान के अनुसार कहा :

हजारों वर्षों से – करम दुष्ट हरकत मान सकते हैं किर के अनुस में आरक्षित सी नई सीटों की स मेदवार ऐसे होने को स्वीकार्य हो दने बाजी मारत तुर , अछूतों के हजारों वर्षों से हमारे साथ अछूतों का व्यवहार हो रहा है , दलित , दमित , अपमानित , तिरस्कृत । महात्मा ने हमारे लिए अपना जीवन दाँव पर लगा रखा है , और यदि उनकी मृत्यु हो गई तो अगले एक हजार सालों तक हम वहीं रहेंगे जहाँ आज हैं । हो सकता है इससे भी बदतर हालात में पहुँच जाएँ । हमारे खिलाफ़ इतनी जोरदार भावनाएँ पैदा हो जाएँगी कि हमने महात्मा को मरवा दिया , पूरा हिन्दू समुदाय और पूरा सभ्य समाज मार – मार ठोकर हमें सीढ़ियों में नीचे की ओर धकेल देगा । मैं आपके साथ अब और ज्यादा खड़ा नहीं रह सकता । मैं तो सम्मेलन में शामिल होऊँगा और समाधान ढूँढंगा और तुमसे अलग हो जाऊँगा

आंबेडकर कर ही क्या सकते थे ? उन्होंने डटे रहने की पूरी कोशिश की । अपने तरकश से तर्क और बुद्धि के सभी तीर चलाए । लेकिन उन्माद के उस माहौल में तर्क और बुद्धि को सुन ही कौन रहा था ? आंबेडकर अब बच नहीं सकते थे । चार दिन के अनशन के पश्चात , आंबेडकर यरवदा जेल में जाकर गांधी से मिले , और पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर कर दिए । बॉम्बे में अगले दिन उन्होंने एक सार्वजनिक भाषण दिया , जिसमें वे गांधी के बारे में अप्रत्याशित रूप से शालीन थे :

मुझे यह देखकर अचरज हुआ कि जिस इनसान ने गोलमेज़ सम्मेलन में मुझ से बिलकुल अलग विचार रखे थे , वह मेरे बचाव के लिए तुरन्त आया , और दूसरे पक्ष के बचाव के लिए नहीं ।

बाद में , आघात से उबरने के बाद आंबेडकर ने लिखा :

अनशन में कुछ भी नेक नहीं था । यह एक बेईमान और गन्दी हरकत थी . . . यह बहुत ही घटिया किस्म की जोर – जबरदस्ती थी उन असहाय लोगों के विरुद्ध , उनसे उनके संवैधानिक संरक्षण के अधिकार लूटने के लिए , जो अधिकार उन्हें [ ब्रिटिश ] प्रधानमंत्री के पंचाट द्वारा प्राप्त हुए थे , और उन्हें मानने को मजबूर किया कि वे हिन्दुओं के रहमो – करम पर जीने के लिए राजी हो जाएँ । यह एक नीच और दुष्ट हरकत थी । ऐसे इनसान को अछत सम्मानित और गम्भीर कैसे मान सकते हैं

पेक्ट के अनुसार , अछूतों को पृथक् निर्वाचिका की जगह , सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटें दी गईं । इसी वजह से प्रान्तीय विधायिकाओं में आवंटित की गई सीटों की संख्या बढ़ गई ( सीटें 78 से बढ़कर 148 हो गईं ) लेकिन उम्मीदवार ऐसे होने चाहिए थे जो विशेषाधिकारप्राप्त जातियों के बहुल निर्वाचन क्षेत्र को स्वीकार्य हों , इसलिए उम्मीदवार नख – दन्त विहीन हो गए । 40 अंकल टॉम ने बाजी मार ली । गांधी ने यह पक्का कर दिया कि अछूतों का अपना जुझारू , अछूतों के अधिकारों के लिए लड़ने वाला नेतृत्व न उभर पाए और नेतृत्व विशेषाधिकारप्राप्त जातियों के पास ही रहे ।

मिशेल अलेक्जेंडर ने अपनी पुस्तक The New Jim Crod41 अर्थात नव जिम को क़ानून – में वर्णन किया है कि कैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में अपराधीकरण और जेलों में ठूसने से अफ्रीकी – अमेरिकी आबादी का एक बड़ा भाग – एक असाधारण प्रतिशत – अधिकारविहीन होकर रह गया है । भारत में इससे भी अधिक कपटपूर्ण तरीके से , दिखावटी उदार रूप में अधिकारीकरण ने यथार्थ में दलित आबादी को अधिकारविहीन बनाना सुनिश्चित कर दिया है । फिर भी . आंबेडकर की नजरों में जो ग़लत और गन्दी हरकत थी , दूसरों को वह दिव्य चमत्कार से कम नहीं नज़र आती थी । लुईस फ़िशर , गांधी की सबसे ज्यादा पढी जाने वाली जीवनी के लेखक , ने कहा :

अनशन से अस्पृश्यता के अभिशाप को , जो तीन हजार वर्षों से भी अधिक पुराना था , मारा तो नहीं जा सकता था . . . लेकिन अनशन के बाद अस्पृश्यता ने अपनी राजनीतिक स्वीकृति को खो दिया ; लोगों का विश्वास इसमें नष्ट हो गया . . . गांधी के ‘ ऐतिहासिक अनशन ‘ ने उस लम्बी जंजीर को तोड़ डाला जिसका छोर प्राचीन काल तक जाता था , जिसने करोड़ों को गुलाम बनाया था । जंजीर की कुछ कड़ियाँ बच गई , जंजीर से मिले कुछ जख्म भी रह गए । लेकिन कोई भी भविष्य में नई कड़ियाँ नहीं जोड़ेगा – कोई भी भविष्य में कड़ियों को फिर से एक साथ नहीं जोड़ेगा . . . यह ( पूना पैक्ट ) एक धार्मिक सुधार के रूप में दर्ज हो गया , एक मनोवैज्ञानिक क्रान्ति । हिन्दू धर्म अपने हजारों साल पुराने कोढ़ से मुक्त हो , अपना शुद्धिकरण कर रहा था । जन साधारण ने अपने व्यवहार में शुद्धिकरण किया . . . अगर गांधी ने अपने जीवन में कुछ और नहीं भी किया होता , केवल अस्पृश्यता की संरचना को चकनाचूर कर दिया होता , तो भी वे एक महान सामाजिक सुधारवादी कहलाते . . . गांधी की पीड़ा ने उनकी पूजा करने वालों को प्रातिनिधिक पीड़ा दी , वे जानते थे कि उन्हें पृथ्वी पर परमेश्वर के दूत की हत्या नहीं करनी है । उसकी पीड़ा को यथावत रखना बुरा होता । हम उन लोगों के साथ सद्व्यवहार करेंगे , जिन्हें वे [ गांधी ] ‘ परमेश्वर की सन्तान ‘ ( हरिजन ) कहते हैं , हम उन्हें बचा लेंगे और इस तरह हमें ईश्वर की कृपा प्राप्त हो जाएगी ।

गोलमेज़ कॉन्फ्रेंस के मौके पर गांधी ने आंबेडकर को अछूतों का प्रतिनिधि मानने से इनकार कर दिया था , लेकिन पूना पैक्ट के अवसर पर उन्होंने पैंतरा बदला और आंबेडकर को उनका प्रतिनिधि मानकर पैक्ट पर हस्ताक्षर कराने के लिए तुरन्त राजी हो गए । गांधी ने स्वयं पैक्ट पर हस्ताक्षर नहीं किए , लेकिन अन्य लोग जिनके हस्ताक्षर इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ पर थे , उनकी सूची रोचक है : जी . डी . बिड़ला , गांधी के उद्योगपति प्रायोजक – संरक्षक ; पंडित मदन मोहन मालवीय , रूढ़िवादी ब्राह्मण नेता और दक्षिणपंथी हिन्दू महासभा के संस्थापक ( जिसका एक सदस्य रहा था नाथूराम गोडसे , जो भविष्य में गांधी की हत्या करेगा ) ; वी . डी . सावरकर , गांधी हत्या के षड्यंत्र का आरोपी , जो हिन्दू महासभा का अध्यक्ष बना ; पलवंकर बालू , एक अछूत क्रिकेट खिलाड़ी , जिसे पूर्व में आंबेडकर ने एक आदर्श खिलाड़ी के रूप में प्रसिद्ध किया था , और जिसे बाद में कांग्रेस और हिन्दू महासभा की सरपरस्ती और बैसाखियों पर खड़ा कर के , आंबेडकर के विरुद्ध एक अछूत नेता के रूप में खड़ा किया गया था हाँ , एम . सी . राजा ( जो बहुत बाद में आगे चलकर गांधी , हिन्दू महासभा और और कांग्रेस से अपनी साँठ – गाँठ पर पश्चात्ताप , खेद और दुख प्रकट करता है । ) ।

भारत में गांधी की आलोचना करने पर न केवल नाक – भौं सिकोड़ी जाती है , बल्कि ऐसी आलोचना को सेंसर भी किया जाता है । इसके अनेकों कारणों में से एक जो ‘ सेकुलरवादी ‘ बताते हैं , यह है कि हिन्दु – राष्ट्रवादी ( जिनमें से गांधा का हत्यारा भी निकला , और जिनके सितारे आजकल बलन्दी पर चल रहे हैं ) इस आलोचना को झपट लेंगे , और इसका इस्तेमाल कर फ़ायदा उठाएंगें । सच्चाई यह है कि जाति के विषय पर गांधी के विचार , और दक्षिणपंथी हिन्दुओं के विचारों में कभी कोई खास दूरी रही ही नहीं । दलित नज़रिए से देखा जाए तो गांधी की हत्या एक भ्रातृ – घात थी अर्थात भाइयों के आपसी झगड़े में हुई हत्या , बजाय विचारधारा विरोधी द्वारा की गई हत्या के । आज भी नरेन्द्र मोदी , हिन्दू राष्ट्रवाद के सबसे आक्रामक समर्थक और एक संभावित भावी प्रधानमंत्री , अपने भाषणों में बिना किसी हिचक के गांधी का खूब नाम लेते हैं । ( मोदी ने गुजरात में दो अल्पसंख्यक विरोधी अधिनियमों को न्यायोचित ठहराने के लिए गांधी का बखूबी आह्वान किया – धर्म – परिवर्तन विरोधी कानून 2003 – ‘ गुजरात धार्मिक स्वतंत्रता क़ानून – 2003 ‘ के नाम से और पुराने गो – वध कानून में 2011 का संशोधन ) 145 मोदी की बहुत सारी घोषणाएँ गांधी नगर में स्थित महात्मा मन्दिर से की जाती हैं , जो एक चकाचक नया सम्मेलन हॉल है , और जिसकी बुनियाद में गुजरात के 18000 गाँवों में से विशेष कलशों में लाई मिट्टी डाली गई । इन 18000 गाँवों में से अधिकतर में आज भी घृणित रूप से अस्पृश्यता जारी है ।

पूना पैक्ट के बाद गांधी ने अपनी पूरी ऊर्जा और जज्बात अस्पृश्यता उन्मूलन में झोंक दिए । शुरू में उन्होंने अछूतों का पुन : नामकरण किया और एक संरक्षण का अहसास दिलाने वाला नाम , ‘ हरिजन ‘ दे दिया । हरिजन यानी भगवान के लोग । इस तरह से गांधी ने अछूतों का लंगर हिन्दू धर्म की गोदी में डाल दिया । उन्होंने एक समाचार – पत्र की स्थापना की जिसका नाम था ‘ हरिजन ‘ । उन्होंने हरिजन सेवा संघ के नाम से एक संस्था शुरू की , जिसका प्रबन्धन पूर्ण रूप से विशेषाधिकारप्राप्त जातियों द्वारा किया जाना था , जिन्हें अछतों पर किए अपने पुराने पापों के लिए पश्चात्ताप करना था । आंबेडकर ने इस सब को कांग्रेस की एक योजना के रूप में देखा , जिसका उद्देश्य था . ‘ अछूतों को दयालुता से ‘ मार ‘ डालना.

अरूंधती राय ,लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता

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