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भावनाओं के कोर्ट रूम में,
पुकार लगी मेरे नाम की..
मैं अभियुक्त थी तुमसे प्रेम करने की…
वादी भी मैं थी…परिवादी भी मैं ..
दोनों तरफ से पैरवी करनी थी मुझे ही..
माननीय न्यायाधीश की कुर्सी पर थे तुम..
ट्रायल शुरू हुआ…

अभियुक्त थी ..
बतौर गवाह पेश हुईं कविताएं मेरी…कटघरे पे
हर्फ हर्फ मेरे गुनाह की गवाही देने लगे…
मैंने भी वकालत की अपनी .
खुद के ख़िलाफ़ भी बोला…
तुम्हारी आँखों पर इल्ज़ाम लगाते हुए ये भी कहा कि, मुंसिफ़ ही मेरा क़ातिल…
पर…तुमने एक तरफ मुझे सज़ा सुनाई..
दूसरी तरफ किया रिहा भी
.

सज़ा ये थी ,
उम्र भर का इंतज़ार..
और खुद से मुहब्बत करते रहने के लिए रिहाई भी दे दी…
अब कटघरे से उतरीं कविताये मेरी..
वो रो रही थीं .
मुझसे माफी मांग रही थीं..
कि मेरी होते हुए भी, बयान तुम्हारे हक़ में दे डाला…

मैं सिर्फ मुस्कुरा रही थी,
ये गुनाह भी तो अजीब रहा…
कौन वादी परिवादी दोनों हो सकता है?
कौन दोनों के तरफ से दलीलें पेश कर सकता है??
ये सारा मसला ही अजीब रहा..

इस कटघरे से तो कविताएं उतर गईं..
पर मेरे कटघरे में वो हमेशा रहेंगी..
मैं हमेशा पूछुंगी उनसे,
कि सिर्फ एक ही शख़्स को क्यों बयान करती हैं ये???
और फिर कटघरे में मैं खुद भी आ जाऊंगी ..
और फिर लिखूंगी… कटघरे में कविता…

—-रोशनी बंजारे “चित्रा”

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