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चूँकि अब ये तुम्हारा शहर मेरा हो गया है, तुम्हारे दोस्त मेरे दोस्त हो गए हैं और तुम्हारे रास्ते भी मेरे हो गए हैं….
बस इतना ही नही तुम्हारे विचार भी तो मेरे हो गए है…
अजीब है न….पर प्रेम में ऐसा होता है…
तुमसे लबरेज़ मैं जैसे नशे में कोर्ट पहुँचती हूँ…
पानी पिलाने वाले भइया जो तुम्हारे गांव के हैं कभी कभी कह देते हैं- “मोका तोर आँखि ललिलियाये दिखथे नोनी”
मैं कह देती हूँ – “बने सोये नई रहेंव भइया”
ये झूठ और सच दोनों होता है…


पर ये नशा मदहोश नहीं होश में लाता है…सारे काम ये समझ कर करती हूँ जैसे तुम्हारे लिए कर रही हूँ…
कोर्ट का वो हिस्सा जहां वकीलों के चेम्बर्स बने हैं अंग्रेजों के ज़माने का है…
पर क़ायम है वैसे ही जैसे रहने वाला है मेरा प्रेम भी..
जब केस का ट्रायल होता है तब अभियुक्तों को देख ये सोचती हूँ कि क्या उन्हें प्रेम नहीं होता? क्या प्रेम में भी अपराध कर सकता है कोई???
जानते हो! हर रोज़ कुटुंब न्यायालय में देखती हूँ कि लोग अपने साथी को छोड़ चले जाते हैं…और अकेला छूटा इंसान रोता रह जाता है..
क्या ये सम्भव है कि एक वक़्त का प्रेम नफरत में बदल जाता है….एक वक़्त का प्रेम धोखे में बदल जाता है??? क्या ऐसा होता है???


तुम अपनी साथी को कभी मत छोड़ना…वरना मैं भी शायद नफरत करने लगूंगी तुमसे….
आज एक केस में बयान होना था मजिस्ट्रेट के सामने…इतना धीमे काम उफ़्फ़….साढ़े 4 घण्टे में फ़क़त दो बयान….
मैडम हमारी बड़ी धैर्य वान हैं इस मामले में…
जब बयान हो रहा था मृतक के पिता का तो वो लाचार सा फफक कर रो पड़ा… अनायास ही उसके आंसुओं में तुम दिख गए…बयान लिखने वाली मैडम अब और सजग होकर बयान लिखने लगीं….साबित हो गया कि , हर रोज़ अपराधों को पंजीबद्ध करने के बाद भी वो सम्वेदनशील है अब भी…तुम यहाँ भी थे…
कलेक्टोरेट परिसर का ये हिस्सा भी अंग्रेजों के ज़माने का है… बड़ा ही मज़बूत भवन…क्या इस भवन को भी किसी ने किसी के प्रेम में बनाया होगा…तभी तो इतना मज़बूत है न….
वहां भी नीम का बड़ा सा पेड़ है….सायादार है…बिलकुल तुम्हारी तरह…
बारिश में फसी हूँ….अब तक घर नहीं पहुंची…आज संगीत कॉलेज और बच्ची को पढाने नहीं जा सकी…कोट और जूते भीग गए हैं…मोबाईल, लैपटॉप और बटवा किसी तरह मैडम ने बचा रखा है…..
वैसे प्रेम में भीगना और बारिश में भीगना एक सा है न….
अब इस गरजती रात का मज़ा लेती हुँ…..तुम्हारे प्रेम में…

-रोशनी बंजारे “चित्रा”

सभी रेखा चित्र मनोज कुलकर्णी भोपाल से आभार सहित

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