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रोशनी बंजारे (चित्रा)”

 अब ये शहर बिलासपुर... अपना लगने लगा है...तुम्हारे जाने के शुरुआती दिनों में वो नेहरू चौक जहां तुम्हे पहली बार देखा था ...उस जगह से अजब सा खौफ़ होता था....मैं उन किसी भी जगह से गुजरना ही नहीं चाहती थी, जहाँ तुमसे जुड़ी याद हो...

पर,”इशरते क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना,
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना…”

      कुछ ऐसा ही हुआ...अब भी वो रास्ते मुझसे तुम्हारा पता पूछते हैं... कई बार आंखें भर जाती हैं...पर मुझे बिना रुके चलते रहना पड़ता है....

अब चूंकि रास्ते बताने के लिए तुम नहीं हो तो मैं रास्ते भूलती भी नहीं….ठीक ठीक पते पर पहुंच ही जाती हूँ…

वो नीम का पेड़ भी याद है …जिसके नीचे हम कुछ देर खड़े थे…
फिर अब भी जब -जब वहां से गुज़रती हूँ कोर्ट जाते वक्त तो वो नीम का पेड़ पलट कर देख लेती हूँ… वो पेड़ भी मुझे देखता है…वो नीम का पेड़ अभी बहुत बड़ा नहीं हुआ है ..युवा है कह सकते हैं…
जब तक वो बड़ा होगा शायद मैं नहीं रहूँगी….
पर वो पेड़ मेरी ये कहानी नहीं भूलेगा…

अगर विकास की चपेट से वो बच गया और सड़क और चौड़ी न हुई तो वो बरसों कायम रहेगा…और आने वाली नस्लों को मेरी ये कहानी सुनाएगा…

कभी जब किसी दोस्त के साथ नेहरू चौक से गुजरती हूँ तो एक दफ़ा वो कहानी सुना ही देती हूँ…

और नीम का वो पेड़ अपनी शाख़ें हिला कर शायद मुस्कुरा देता है…..

और उस पेड़ के बाजू के पेट्रोल पंप में जब भी पेट्रोल लेती हूँ… तुम्हारा चेहरा दिखने लगता है…

फिर वो गाना गुनगुना के आगे बढ़ जाती हूँ…..”बेख्याली में भी तेरा ही ख्याल आये….”

वो चौराहा , वो सड़क और वो पेड़ भी एक दिन नहीं रहेगा…पर मैं तुम्हारे प्रेम में हमेशा रहूँगी…

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