18 अगस्त 2019 को नवलपुर बेमेतरा जिला में गुरू बालक दास की 214 वीं जयंती समारोह : गुरुघासीदास सेवादार संघ[GSS]

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मुख्य अतिथि गुरुदयाल बंजारे ( विधायक नवागढ़ ) एवं पुरुस्कार वितरण समारोह

निर्माण व्यवस्थापन समिति नवलपुर ( ढारा ) बेमेतरा छ . ग . के तत्वाधान में 18 अगस्त 2019 रविवार को 11 बजे से ग्राम नवलपुर ( ढारा ) जिला बेमेतरा ( छ . ग .) में लोक समाज के रोटी व सम्मान की सुरक्षा के लिए शहीद हुए गुरुघासीदास के पुत्र गुरू बालकदास ( जन्म 18 अगस्त 1805 – शाहिद 17 मार्च 1860 ) के 214वीं जयंती अवसर पर गुरू बालकदास जयंती समारोह एवं पुरुस्कार वितरण समारोह


ई .1850 में गुरुघासीदास के बाद गुरूबालकदास सतनाम आंदोलन के मुखिया बने। तब सतनाम आदोंलन का जोर-शोर से प्रचार-प्रसार हुआ।इसी दरम्यान ,ई. 1857 में सैनिक गदर हुआ। इस घटना ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता के बदले सीधे अंगेजी राज की स्थापना हुई ।जिससे यहां की राजनीति,सामाजिक,अर्थनीति में बुनियादी परिवर्तन हुआ। अंग्रेजी शासन ने व्यवस्थित तौर पर राज – काज करने के लिए जमीनों पर कब्जाधारियों के रिकार्ड रखने मालिक मकबुजा कानून लागू किया । इस कानून में यह प्रावधान था कि ई . 1840 से जो अपनी भूमि पर काबिज है , उसे शासन द्वारा वाजिब काश्तकार माना जाय ।


साथियों, सतनाम आंदोलन जो ई .1820 से शुरू हुआ था , जिसमें भू-दासों ने जमीनों पर हक कब्जा किये थे , वे इस कानून से सरकारी तौर पर आदिम काश्तकार माने जाते । इससे लोकदमनकारियों में खलबली मच गयी ,क्योंकि वे आश लगाये थे कि एक न एक दिन वे सतनामियों को बेदखल करके फिर से भूदास बनाएंगे । अंग्रेजी प्रशासन ने कानून लागू करने के लिए अधिकारियों को यह निर्देशित किया था कि; यदि कोई विवाद होता है तो स्थानीय जन समुदाय के मान्य प्रमुखों की राय – मशवरा से उचित निर्णय किया जावे ।गुरुबालकदास किसी विवादित मामले में उचित निर्णय देने से उनकी स्थिति राजा- न्यायाधीश की तरह हो गयी थी ।इसलिए आमजन उन्हें सम्मान से ‘राजागुरु’ कहते थे।


लोकदामनकारी सामंत व उनके बिचौलिए अपने हित साधने में गुरु बालकदास को बहुत प्रभावित करने की कोशिश किये।उन्होंने गुरु बालकदास को यह भी प्रलोभन दिया कि,उनके लिए अधिकांश भूमि -सम्पत्ति की व्यवस्था वे कर सकते हैं, बशर्ते कि वे भूमि मामलों में अपनी सक्रियता हटा ले । इन सब पर गुरुबालकदास स्पष्ट तौर पर कहते कि – हमारे लोग अपनी संगठन – समाज की शक्ति से अपनी भूमि पर काबिज हैं और यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा भर नहीं हैं,यह हमारी थाली में हमारी मेहनत से रखा हुआ रोटी है। यदि कोई हमारी रोटी छीनने की कोशिश करेगा तो हम नहीं होने देंगे ।


इस बहादुरी के साथ सतनामी एवं अन्य शोषित तबकों में अन्याय का मुकाबला करते हुए अपने स्वाभिमान ,अधिकार के साथ रामत-रावटी निकला करते थे।इन स्थिति मेंलोकदमनकारियों ने बहुत गहरा षडयंत्र रचा, जिसमें छत्तीसगढ़ एवं बाहरी इलाकों के अपराधी सामती गुंडों एवं सतनामी समाज के अंदर के भीतरघातियों ने 17 मार्च इ . 1860 में उनकी हत्या की गई , गद्दारों के सहयोग से सतनामियों पर जुल्म ढाए गये और गद्दारों से बचाएं।गद्दारों के शह पर आज तक दमन चल रहा है ।


साथियों , आज हम इस इतिहास को जानकर अधिकतम रूप से ज्ञानवान , समर्थन बने । अपनी एकता को गददारों से बचाएं।सिर्फ जयंती की औपचारिकता न करें, वास्तविक रूप से सभी शोषितों को सही न्याय – विकल्प के लिए तैयारी करें तभी हमारा जयंती मनाना सार्थक होगा ।

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