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राष्ट्रीय

इतिहासकार ने कहा कि उस वक्त के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने से सहमत होने के वाजिब कारण थे।

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने से जुड़े आर्टिकल 370 के प्रावधानों को खत्म करने के मोदी सरकार के फैसले की इतिहासकार इरफान हबीब ने निंदा की है। उन्होंने इसे ‘कश्मीर के निवासियों के साथ धोखा’ करार दिया है। 87 साल के इतिहासकार ने अलीगढ़ में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ये विचार रखे। उन्होंने कहा, ‘केंद्र सरकार ने J&K को खतरे का बहाना बनाते हुए बिना कश्मीर के लोगों को भरोसे में लिए यह फैसला लिया।’

अंग्रेजी अखबार द टेलिग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, हबीब ने कहा कि बीजेपी कभी कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह की तारीफ करते नहीं थकी, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय का विरोध किया और राज्य की स्वायत्तता की पैरवी की। उन्होंने कहा, ‘आर्टिकल 370 को खत्म करने का सवाल उठता ही नहीं अगर महाराजा जम्मू-कश्मीर के साथ किसी अन्य राज्य की तरह ही बर्ताव किए जाने की तत्कालीन केंद्र सरकार की इच्छा से सहमत हो जाते।’

हबीब ने कहा, ‘उस वक्त के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के कश्मीर को विशेष दर्जा दिए जाने से सहमत होने के वाजिब कारण थे।’ हबीब ने कहा कि उस वक्त संघ परिवार ने कश्मीर के मुसलमानों पर हमले करना शुरू कर दिया था। उन्होंने कहा, ‘संघ के सदस्य स्थानीय मुसलमानों का उत्पीड़न करने लगे थे और उनकी जमीनें छीन लीं। यही कारण था कि सरदार पटेल (कश्मीर में एंट्री के लिए) परमिट सिस्टम के लिए राजी हुए ताकि बाहरियों को स्थानीय लोगों की जमीनें हथियाने से रोका जा सके।’

संसद में जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पास होने के बाद पाकिस्तान भड़क उठा है। कश्मीर में आर्टिकल 370 का प्रभाव खत्म करने से नाराज पाकिस्तान ने भारत के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को तोड़ने या कम करने का फैसला ले लिया है।

इतिहासकार के मुताबिक, ‘इसके बाद भी देश के लोगों को कश्मीर जाने के लिए आसानी से परमिट मिल जाता था। हालांकि, श्यामा प्रसाद मुखर्जी (जनसंघ के संस्थापक) जैसे नेताओं को वहां जाने से रोका गया क्योंकि उनकी नीयत ठीक नहीं थी।’ हबीब ने बताया कि कश्मीर में स्थानीय निवासियों को जमीन, सरकारी नौकरी आदि में खास वरीयता देने से जुड़े आर्टिकल 35ए को 1954 में लाने का मकसद यह था कि विभाजन के बाद पाकिस्तान गए कश्मीरियों को वापस लाया जा सके।

हबीब के मुताबिक, आर्टिकल 35ए की वजह से लोग वापस भी लौटे। हबीब ने कहा, ‘उस वक्त जम्मू-कश्मीर की कृषि नीति देश में सबसे बढ़िया थी क्योंकि राज्य सरकार ने किसानों को मुफ्त में जमीन दी। ऐसा भारत सरकार के कानून के तहत करना मुमकिन नहीं हो पाता।’ इतिहासकार ने कहा कि बेहतर होता अगर लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई विधानसभा प्रस्ताव पास करके इन अनुच्छेदों को खत्म करती है।

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