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देशबन्धु में संपादकीय आज.

श्रीकांत वर्मा अपनी कविता ।’काशी का न्याय’ में कहते हैं-

सभा बर्खास्त हो चुकी, सभासद चलें
जो होना था सो हुआ, अब हम, मुंह क्यों लटकाए हुए हैं?
क्या कशमकश है? किससे डर रहे हैं?
फ़ैसला हमने नहीं लिया-
सिर हिलाने का मतलब फ़ैसला लेना नहीं होता, हमने तो सोच-विचार तक नहीं किया
बहसियों ने बहस की, हमने क्या किया? हमारा क्या दोष?
न हम सभा बुलाते हैं, न फ़ैसला सुनाते हैं
वर्ष में एक बार, काशी आते हैं-
सिर्फ यह कहने के लिए, कि सभा बुलाने की भी आवश्यकता नहीं
हर व्यक्ति का फ़ैसला, जन्म के पहले हो चुका है।

आज यह कविता जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में सटीक उतरती नजर आ रही है। मोदी सरकार के कड़े और बड़े फैसले का जश्न पूरे देश में मनाया जा रहा है, ऐसी खबर सरकारी प्रचार तंत्र और सरकार समर्थित प्रचार तंत्र के जरिए फैलाई जा रही है। जो विरोध कर रहा है, उसे फिर देशद्रोही की नजर से देखा जा रहा है। और जिस राज्य के लिए यह फैसला लिया गया है, वहां की जनता को तो शायद अब तक पूरी बात भी पता नहीं है कि उसके भविष्य पर कितना बड़ा दांव लगा दिया गया है।

लगता है हम कुरु राजसभा का दृश्य देख रहे हैं,
जहां कौरव अपनी संख्या और राजदंड के बल पर द्यूत खेल रहे हैं, युधिष्ठिर के फेंके पांसों को भी अपने पक्ष में पलटवा रहे हैं। बहुमत का अर्थ अब यह हो गया है कि अगर ज़्यादा लोग रात को दिन कहें तो फिर सबको उसे दिन ही मानना पड़ेगा, भले ही तब रात क्यों न हो। जैसे भाजपा ने कह दिया कि आर्टिकल 370 नेहरूजी की भूल थी, कि श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इसका विरोध किया था, तो फिर इसे ही नया इतिहास मानना होगा।

जबकि सच ये है कि संविधान सभा ने 17 अक्टूबर 1949 को अनुच्छेद 370 को अपनाया था। और जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी उस संविधान सभा के सदस्य थे। अनुच्छेद 370 जब संविधान सभा में पास किया जा रहा था तब मुखर्जी ने उसका विरोध नहीं किया था, बल्कि उन्होंने नेहरू-लियाक़त समझौते के विरोध में 8 अप्रैल, 1950 को उद्योग और आपूर्ति मंत्री पद से त्यागपत्र दिया था। इस समझौते के तहत दोनों देशों में अल्पसंख्यक आयोग गठित हुए थे और दोनों देशों ने अपने-अपने देशों में रह रहे अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करने का वादा किया था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी पूर्वी बंगाल में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर चिंतित थे और इसलिए विरोध कर रहे थे।

जहां तक 370 के विरोध का सवाल है तो जब जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला ने भूमि सुधार शुरू किया और इसके तहत गरीबों और उत्पीड़ित तबकों को ज़मीन दी जाने लगी तो डोगरा जमींदारों और कश्मीरी पंडितों का एक वर्ग इससे नाखुश हुआ। इसके बाद ही अनुच्छेद 370 के विरोध के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस राज्य में आए, जहां श्रीनगर की जेल में उनकी मृत्यु हो गई। अब अनुच्छेद 370 के नाममात्र को बने रहने, जम्मू-कश्मीर से विशेष अधिकार हटने और उसके दो टुकड़े हो जाने पर इस जन्नत की ज़मीन पर पैर जमाने के रास्ते खुल गए हैं। देश का उद्योग जगत जो कई दिनों से शेयर बाजार के गिरने, जीएसटी से होने वाली तक़लीफ़ों से सरकार से खिन्न था, अब उसकी बांछें खिल गई हैं।

सरकार ने अक्टूबर में जम्मू-कश्मीर में एक बड़ा निवेश सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई है, जिसमें देश के नामी-गिरामी कारोबारी हिस्सा लेंगे और निवेश के नए-नए तरीके ढूंढेंगे। जैसे अंधेरे में कुछ नज़र नहीं आता है, वैसे ही चौंधियाती रौशनी में भी आंखें खोलना मुश्किल हो जाता है। जम्मू-कश्मीर को उसकी जनता से पूछे बिना, बताए बिना, बांट दिया गया। उसके जिन नेताओं के साथ मिलकर सत्ता में बैठने से भाजपा ने गुरेज नहीं किया था, उन्हें ही राज्य की दुर्दशा के लिए दोषी ठहरा दिया और बिना किसी अपराध के हिरासत में ले लिया।

इसके बाद संसद भवन को बाहर से रौशन किया गया, ताकि जनता को लोकतंत्र के मंदिर में पसरे अंधेरे का अहसास न हो सके। और होगा भी कैसे, क्योंकि जनता को केवल आधी-अधूरी, मनगढ़ंत बातों की व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी का ज्ञान दिया जाता है। संविधान का असली पाठ नहीं पढ़ाया जाता, जिसके अनुच्छेदों का इस्तेमाल कर भारत के निर्माण का ताना-बाना बुना गया। जम्मू-कश्मीर ही नहीं संविधान के खंड 21 के तहत बहुत से राज्यों को उनकी क्षेत्रीय, भौगोलिक, सामाजिक स्थिति के हिसाब से विशेष अधिकार दिए गए हैं।

लेकिन जम्मू-कश्मीर मुस्लिमबहुल है, तो यहां के अधिकार खटकने लगेे। वैसे आतंक, बेरोज़गारी, गरीबी, पिछड़ापन से कई राज्य ग्रसित हैं। लेकिन इनका बंटवारा तो नहीं हुआ। इनके विशेष अधिकार तो ख़त्म नहीं हुए। न ही इनका ज़िक्र जनता के बीच चुनावी सभाओं में उस तरह हुआ, जैसे जम्मू-कश्मीर का किया गया। अब जश्न मनाने वाली जनता ही देखेगी कि कैसे कश्मीर में केसर की क्यारियों पर किसी च्यवनप्राश बनाने वाले बाबा का कारोबार फलेगा या कोई मोबाइल नेटवर्क कंपनी लोगों को जियो और जीने दो स्कीम के तहत अनलिमिटेड बात करने का आकर्षक प्रस्ताव देगी, ताकि खुली जेल में रहने का दर्द कश्मीरी कुछ देर के लिए भुला सकें।

‘हस्तिनापुर का रिवाज़’ में श्रीकांत वर्मा कहते हैं-


मैं फिर कहता हूं
धर्म नहीं रहेगा, तो कुछ नहीं रहेगा-
मगर मेरी
कोई नहीं सुनता!
हस्तिनापुर में सुनने का रिवाज़ नहीं-

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