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सीमा आजा़द

एटीएस या एसटीएफ जब माओवाद या ‘अर्बन नक्सल’ के नाम पर किसी को गिरफ्तार करती है तो उससे बहुत खौफ खाती है, इस खौफ के कारण वो उसे अकेला करने का तमाम प्रयास करती है। ये हमने अपनी जेल डायरी में विस्तार से लिखा है, अब इसका एक और नमूना भी देख लीजिए। मनीष और अमिता की गिरफ्तारी के बाद भाई भाभी होने के नाते मैं उनसे मिलने कोर्ट में, जेल में जा रही हूं, वकालत की जानकारी के कारण उनके केस की पैरवी भी मैं ही कर रही हूं। इसके कारण एटीएस मुझे डराने, धमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है, उन्होंने कोर्ट में मुझे धमकाने की कोशिश की, गैरकानूनी तौर पर मेरा विडियो बनाया, मनीष से पुलिस कस्टडी में मिलने गई तो वकील की आपत्ति के बाद भी मेरी तस्वीर ली, लखनऊ से इलाहाबाद तक लम्पटों को पुलिस के निशान वाली मोटर साइकिल देकर पीछा करवाया। इन सबसे भी मैं नहीं डरी तो आज मेरे फेसबुक की एक पोस्ट के कमेंट बॉक्स में ये समाचार चेपवाया। जिसके अनुसार एटीएस के निशाने पर मेरी गतिविधियां भी हैं, और मुझसे भी पूछताछ हो सकती है।

मनीष श्रीवास्तव और अमिता


तो क्या मैं डर जाऊं और मनीष अमिता की पैरोकारी से हट जाऊं.


इसका एक ही जवाब है कि इन लोगों ने मुझे इतना डराया है कि मेरा डर ही खत्म हो गया है, डरने की बजाय इन षड्यंत्रकारियों को देखते ही मुझे गुस्सा आने लगता है।
डराने के ये सारे काम ये लोग मुझे गिरफ्तार करने के समय भी करते थे। हमसे कोर्ट में मिलने आने वालों की उन्हे दिखा कर तस्वीर लेना, हमारे वकील के जूनियर को फोन करना और संदेहास्पद बातें कहना, मेरे घर वालों का न सिर्फ पीछा करना, बल्कि उनका पीछा किया जा रहा है इसे जताने के लिए, रास्ते में रोककर सवाल पूछना, अनजान नंबरों से फोन करना – सब कुछ।
फिर भी वे हमें लोगों से अलग नहीं कर सके, इस बार भी नहीं कर सकेंगे, बस ये सब आप लोगों को बताने के लिए लिख रही हूं कि पुलिसिया सिस्टम कैसे गैरकानूनी तरीको का इस्तेमाल कर काम करता है। दरअसल इसे जानने के बाद ही ये डर खत्म होता है। इसलिए इसे जानना जरूरी है।

मीडिया पुलिस गठजोड़

बात अभी खत्म नहीं हुई है।
एक ओर तो वो पैरोकार को आरोपी से अलग करने की कोशिश करते हैं, दूसरी ओर अपने कई तरह के पैरोकार खड़े करते हैं। एक तो कानूनी पैरोकार होता है, जो घोषित होता है, कोर्ट में आकर उनकी ओर से केस देखता है, और इसके लिए उसे घोषित तौर पर तनख्वाह मिलती है।
दूसरी ओर वे कई ऐसे पैरोकार खड़े करते हैं, जिन्हें अघोषित तौर पर पैसा मिलता है, ऐसे अघोषित पैरोकारों में ये पत्रकार और अखबार होते हैं, जो पुलिसिया कथन को investigation कह कर लिखते हैं,और लोगों को अपने समर्थन में और गिरफ्तार लोगों को और उनके साथ खड़े लोगों को भी निशाना बनाते हैं।


मुझे एक बात याद आयी, यहीं बताना ज़रूरी है।
मैंने अपनी पत्रकारिता सन 2000 में देहरादून से शुरू की थी, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कुछ दिन काम करने के बाद प्रिंट में आ गई। मेरे साथ मेरा हमउम्र एक और लड़का आया, जो ‘क्राइम बीट’ देखता था, मुझे संस्कृति और विधानसभा मिला। शुरू में वो पैदल आता था, मै साइकिल से ऑफिस पहुंचती थी, हम दोनों की तनख्वाह बराबर ही थी। जल्द ही उसने मोटरसाइकिल ले ली। हम दोनों अच्छे दोस्त थे, इसलिए मैंने उससे पूछा- इतनी जल्दी कैसे पैसा जमा लिया, उसने मुस्कुरा कर कहा ‘क्राइम रिपोर्टिंग में आ जाओ पता चल जाएगा।’ मेरी आंख फैल गई, फिर उसने बताया, पुलिस उनके पक्ष में लिखने के लिए उन्हें दारू पिलाती है, मुर्गा खिलाती है, धन भी देती है। तो इस समाचार को लिखने वाले सौरभ शुक्ल जी भी इस समय एटीएस की पैरोकारी कर रहे हैं, जिसे investigation का नाम दे रहे हैं। इन्हें पत्रकार समझने की भूल न करें।

कुछ.क्राइम रिपोर्टर जनता के पक्ष में.भी लिखते हैं ,कृपया अपने लिया न लें.


पैरोकार सौरभ शुक्ल जी “पैरोकार अखबार” में लिखते हैं कि मैं “सोशल मीडिया पर एटीएस के खिलाफ दुष्प्रचार कर रही हूं।” वैसे तो मानवाधिकार और नागरिक समाज में जो पहले से ही बदनाम हैं, उनके बारे में क्या दुष्प्रचार करना, लेकिन शुक्ल जी से पूछना चाहती हूं कि वो क्या कर रहे हैं? क्या ये मेरे और मेरे भाई भाभी के बारे में बगैर किसी तथ्य के दुष्प्रचार नहीं कर रहे हैं?
अच्छा हुआ जो सोशल मीडिया है, जिसके माध्यम से में अपना पक्ष भी रख सकती हूं, वरना मेरे समय में तो “पत्रकार पैरोकार” और “अखबार पैरोकार” एकतरफा हमारे बारे में उट-पटांग पुलिसिया कथन लिखते ही जा रहे थे।
दोस्तों इस साज़िश को और पुलिस के छिपे हुए पैरोकारों को पहचानिए, यह साज़िश वे हर गिरफ्तार व्यक्ति और उससे जुड़े लोगों के साथ कर सकते हैं।

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