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भारत में विस्तार से तथ्यगत पत्रकारिता के लिए चर्चित पत्रिका ‘कारवां’ के संपादक विनोद जोसआमतौर पर भारतीय मीडिया खासकर अंग्रेजी या हिंदी में कहीं बोलते हुए नहीं देखे जाते, बावजूद इसके कारवां इंटरनेट पर सर्वाधिक प्रसारित होने वाली न्यूज वेबसाइटों में प्रमुख है। वजह है कारवां की धार उसी धार की वजह से इन दिनों विनोद जोस आरएसएस के निशाने पर हैं।

10 और 11 जुलाई को ब्रिटेन और कनाडा सरकार ने लंदन में मीडिया स्वतंत्रता पर विश्व सम्मेलन का आयोजन किया था. इस सम्मेलन में 100 से अधिक देशों के 1500 से अधिक मंत्रियों, राजनयिकों, नेताओं, न्यायाधीशों, शिक्षाविदों और पत्रकारों ने भाग लिया. कारवां के कार्यकारी संपादक विनोद जोस को धर्म और मीडिया पर आयोजित चर्चा में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था. उस चर्चा में जोस ने दीर्घ अ​वधि की धार्मिक असहिष्णुता के कारण भारत के अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति बढ़ती हिंसा जो मुस्लिमों और दलितों की भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्या की बढ़ती घटनाओं में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं, पर बात की. जोस ने बताया कि एक हद तक अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति घृणा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक और हिन्दुत्व विचारधारा की शिक्षाओं का नतीजा है.

जोस की प्रस्तुति के बाद प्रसार भारती के अध्यक्ष सूर्य प्रकाश ने आरोप लगाया कि जोस गलत जानकारी दे रहे हैं. दर्शक दीर्घा से सूर्य प्रकाश ने कहा कि जोस की प्रस्तुति से भारत की छवि धूमिल हुई है, लेकिन प्रस्तुति को गलत बताने के बावजूद वह कोई गलती नहीं दिखा सके. कई भारतीय मीडिया संस्थानों ने श्री प्रकाश की टिप्पणी को आधार बनाकर रिपोर्ट छापी जिसमें दावा किया गया कि सूर्य प्रकाश ने जोस की टिप्पणी की निंदा की है. परंतु किसी भी संस्थान ने रिपोर्ट पर जोस की प्रतिक्रिया के लिए संपर्क नहीं किया.

जोस ने सम्मेलन के आयोजकों, फरवरी में आयोजित विश्व मीडिया सम्मेलन के आयोजक और प्रतिनिधि तथा ब्रिटेन सरकार के विदेश मंत्री जेरेमी हंट और कनाडा सरकार के विदेश मंत्री क्रिस्टिया फ्रीलैंड को पत्र लिखकर इस घटना से अवगत कराया है और भारत में मीडिया की स्वतंत्रता और मतविरोधियों के अधिकारों के हालातों पर प्रकाश डाला है.

पेश है जोस का लिखा पत्र—

पिछले सप्ताह लंदन में आयोजित विश्व मीडिया सम्मेलन अपने आप में एक अनोखा आयोजन था और आज जिस तरह के हालात दुनिया के कई देशों के हैं उस स्थिति में यह बहुत महत्वपूर्ण था. मैं निडर, स्वतंत्र और सिद्धांतों वाली मीडिया के सामाजिक मूल्य को उससे बेहतर शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता जो मुझे सम्मेलन के वक्ता के रूप में प्राप्त आमंत्रण पत्र में लिखा था :

“स्वतंत्र मीडिया, आर्थिक समृद्धि, सामाजिक विकास और ताकतवर लोकतंत्रों के लिए महत्वपूर्ण तत्व है. यह एक ऐसा अधिकार है जो मानवाधिकारों के सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 19 में उल्लेखित है और सभी सरकारों ने इसके प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की है.”

म्मेलन के दूसरे दिन आयोजित जिस पैनल चर्चा में मैंने भाग लिया उसका शीर्षक था- “धर्म और मीडिया : अनकही को कहना”. चर्चा में भाग लेते हुए मैंने खुशी और बेबाकी से आज के भारत में विचार, अभिव्यक्ति और विश्वास की स्वतंत्रता पर दिखाई पड़ने वाली मुख्य अड़चनों पर अपनी बात रखी. उस पैनल में राष्ट्र संघ की धर्म या विश्वास की स्वतंत्रता समिति के विशेष प्रतिवेदक और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के धर्म या विश्वास के विशेष दूत, वर्ल्ड वॉच मॉनिटर और मीडिया डायवर्सिटी संस्था के प्रतिनिधियों के साथ पाकिस्तान और होली सी के पत्रकार भी शामिल थे.

से हास्यास्पद ही कहा जाना चाहिए कि खुल कर और सच्चाई से मीडिया की स्वतंत्रता पर बात रखने के कारण भारत सरकार के प्रतिनिधियों ने मुझे डराने और बदनाम करने की कोशिश की. उनका प्रयास लचर और अप्रभावकारी था और इस मामले को वहीं भुला दिया जाना चाहिए था लेकिन भारत सरकार के अधिकारियों ने देश में इस मामले को तूल दिया. इसके बावजूद मैं यह कहना चाहता हूं कि मेरे मामले में सरकारी अधिकारी का रवैया देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर होने वाले हमलों में शायद ही बहुत बड़ा हमला कहा जाए. सम्मेलन में लिंचिंग और लक्षित हत्याओं की बढ़ती घटनाओं पर मेरी प्रस्तुति से यह स्पष्ट हो जाता है. क्योंकि यह मामला उस सम्मेलन से जुड़ा है जिसका आयोजन आपने किया था इसलिए मुझे लगता है कि मुझे आपको इस बारे में अवगत कराना चाहिए ताकि आपको पता चल सके कि भारत में विरोध को किस तरह देखा जाता है और कैसा व्यवहार किया जाता है.

ससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि मैं इस बात को प्रकाश में ला सकूं कि मेरे साथ जो हुआ वह भारत में जारी चिंताजनक प्रवृत्ति का एक छोटा सा नमूना है. भारत सरकार और सत्तारूढ़ हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी का पितृ संगठन पूरी ताकत के साथ विरोध करने वालों को जनता के शत्रु के रूप में चिन्हित करने पर तुले हैं. यह विरोधियों को सताने और उन पर होने वाली संभावित हिंसा को वैधता प्रदान करने का जरिया है.

स सम्मेलन में उपस्थित एक वक्ता ने कहा था कि भारत कमजोर हो रहे ऐसे लोकतंत्रों में से एक है जो यह बात मानने को तैयार नहीं है. इसलिए भारत की सच्ची कहानी बताना पहले से अधिक जरूरी है.

म्मेलन में भारत का अनुभव साझा करते हुए मैंने अपनी बात लिंचिंग (हत्या) करते वक्त हत्यारी भीड़ द्वारा मोबाइल फोन से बनाए गए कुछ वीडियो दिखा कर शुरू की. सबसे ताजातरीन वीडियो कुछ सप्ताह पहले झारखंड में हुई एक मुस्लिम युवा की हत्या का था. इसके बाद मैंने 1984 से 2016 तक हुईं ऐसी घटनाओं के बारे में बताया- 4 दलित पुरुषों को एक जीप के सामने बांधकर पीटना, कंधमाल में ईसाईयों को लक्षित कर हत्या करना (लगभग 100 ईसाई मारे गए), तीन दशकों तक कुष्ठरोगियों के बीच काम करने वाले ऑस्ट्रेलियन मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों को जिंदा जला दिया जाना, गुजरात में मुस्लिम विरोधी हिंसा (लगभग 2000 मुसलमान मारे गए) और दिल्ली में सिख नरसंहार (लगभग 2700 सिख मारे गए). मैंने दिखाया कि हिंसा की ये घटनाएं स्वतःस्फूर्त नहीं थीं बल्कि लंबे समय से व्यवस्थित तरीके से फैलाई गई धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत और असहिष्णुता का ही परिणाम थीं.

स हिंसा की गहरी ऐतिहासिक जड़ों को समझाने के लिए मैंने वी. डी. सावरकर और एम. एस. गोलवलकर के फासीवाद और नाजीवाद विचारों को बताया. सावरकर और गोलवलकर को हिंदुत्व का संस्थापक माना जाता है जो हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), के वैचारिक मार्गदर्शक हैं. यह संगठन सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी सहित तमाम संबद्ध हिंदुत्ववादी संगठनों का संरक्षक संगठन है. 30 सालों तक आरएसएस का नेतृत्व करने वाले गोलवलकर, जिन्होंने भविष्य के दो प्रधानमंत्रियों को प्रशिक्षित किया, कहते थे कि कैसे “नाजियों द्वारा सीमेटिक नस्लें- यहूदी को मिटाया जाना हिंदुस्तान के लिए अच्छा सबक है और लाभदायक भी.” आरएसएस के संस्थापकों ने अपने संगठन को मुसोलिनी के बलीला और एवनगार्डिस्टी के रूप में खड़ा किया, यह बात इस संगठन के आरंभिक संरक्षकों में से एक की डायरी में बताई गई है जो राष्ट्रीय अभिलेखागार में आज भी उपलब्ध है.

सके बाद मैंने इस बात की चर्चा की कि कैसे हिंदू दक्षिणपंथ के उदय के साथ भारत के मुख्यधारा के मीडिया ने धार्मिक अल्पसंख्यकों और उत्पीड़ित जातियों पर हमला करने वालों की वैचारिकी और संगठनिक शक्ति पर बहुत कम पड़ताल की है या गंभीरता से काम नहीं किया है. मैंने अपनी बात यह कहते हुए खत्म की थी कि भारतीय न्यूज रूम में इन समूहों का प्रतिनिधित्व बेहद कम होने के चलते ऐसे हालात हैं. (15 फीसदी अगड़ी जातियों के लोग भारतीय मीडिया के 85 प्रतिशत पदों पर काबिज हैं और बाकी की जनता को केवल 15 प्रतिशत स्थान प्राप्त है.)

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