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सम्पादक दक्षिण कोसल

छत्तीसगढ़ के स्कूलों में मध्याह्न भोजन में अंडा परोसने के फैसले का विरोध होने के बाद स्कूल शिक्षा विभाग ने कलेक्टरों से कहा है कि यदि स्कूलों में अंडा मुहैया कराने को लेकर सहमति नहीं बने तो मांसाहारी बच्चों के घरों में अंडा पहुंचाने की व्यवस्था की जाए। विभाग के जनवरी माह के एक पत्र में प्रोटीन और कैलोरी की पूर्ति के लिए छात्रों को मध्याह्न भोजन में सप्ताह में कम से कम दो दिन अंडा, दूध या समतुल्य पोषक मूल्य का खाद्य पदार्थ दिए जाने का उल्लेख और सुझाव है।

16 जुलाई के पत्र में बताया गया है कि स्कूली स्तर पर आगामी दो सप्ताह में शाला विकास समिति एवं अभिभावकों की बैठक आयोजित कराई जाए। इस बैठक में ऐसे छात्र-छात्राओं को चिह्नित किया जाए जो मध्याह्न भोजन में अंडा ग्रहण नहीं करना चाहते हैं। मध्याह्न भोजन तैयार करने के बाद अलग से अंडे उबालने या पकाने की व्यवस्था की जाए। जिन छात्र-छात्राओं को चिह्नित किया गया है, उन्हें मध्याह्न भोजन के समय पृथक पंक्ति में बैठाकर भोजन परोसा जाए। जहां अंडा वितरण किया जाना हो, वहां शाकाहारी छात्र-छात्राओं के लिए अन्य प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ जैसे कि सुगंधित सोया दूध, सुगंधित दूध, प्रोटीन क्रंच, फोर्टिफाइड बिस्किट, फोर्टिफाइड सोयाबड़ी, सोया मूंगफली चिकी, सोया पापड़, फोर्टिफाइड दाल इत्यादि विकल्प की व्यवस्था की जाए।

पत्र में यह भी कहा गया है कि यदि बैठक में मध्याह्न भोजन में अंडा परोसे जाने पर आम सहमति न बने, तो ऐसे स्कूलों में मध्याह्न भोजन के साथ अंडा न देकर विकास समिति अंडा घर में पहुंचाने की व्यवस्था करे। छत्तीसगढ़ में स्कूलों में मध्याह्न भोजन के दौरान बच्चों को अंडा मुहैया कराने के फैसले का विरोध शुरू हो गया है। राज्य के मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ जेऔंऔऔऔके विधायकों ने इस मामले को विधानसभा में उठाया था और सरकार पर आरोप लगाया था कि संत कबीर के अनुयायियों के विरोध के बाद भी सरकार ने यह फैसला किया है। कांग्रेस का कहना है कि राज्य के बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए यह फैसला लिया गया है।

अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता मनोज अभिज्ञान ने युवल नूह हरारी द्वारा लिखी गई पुस्तक सैपियन्स: ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ़ ह्यूमनकाइंड का उल्लेख बड़ी विद्वता के साथ किया है। हमें मनुष्य के खाद्यान चक्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करना चाहिए और धार्मिक अंधविश्वास के कुचक्र से बाहर आना चाहिए। इस पुस्तक में लिखा है कि लाखों साल से मनुष्य उन वनस्पतियों को बटोरकर और उन पशुओं का शिकार कर अपना पेट भरता था, जो उसके किसी प्रकार के हस्तक्षेप के बिना रहते और प्रजनन करते आए थे।

लेकिन लगभग 10,000 साल पहले यह सब बदल गया, जब मनुष्य ने कुछ जीव और वनस्पति प्रजातियों के जीवन को नियन्त्रित करने की कोशिश में अपना सारा समय ख़र्च करना शुरू कर दिया। सूर्योदय से सूर्यास्त तक मनुष्य का सारा दिन बीज बोने, पौधों को पानी देने, ज़मीन की निराई करने और अपने पालतू जानवरों को सबसे अच्छे चरागाहों में ले जाने में बीतने लगा। उनका ख़याल था कि यह काम उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा फल, अनाज और मांस उपलब्ध कराएगा। यह मनुष्य के लाइफ स्टाइल में एक रेवोल्यूशन था – एग्रीकल्चरल रेवोल्यूशन। पहली सदी तक आते-आते दुनिया के अधिकांश हिस्से की विशाल आबादी कृषक बन गई।

एग्रीकल्चरल रेवोल्यूशन ने सरल जीवनयापन के नए युग की शुरुआत करने की बजाय कृषकों को घुमंतू जीवन के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मुश्किल और कम सन्तोषप्रद जीवन के सामने लाकर पटक दिया। एग्रीकल्चरल रेवोल्यूशन से भोजन की कुल मात्रा में वृद्धि तो हुई लेकिन अतिरिक्त भोजन का अर्थ बेहतर ख़ुराक और ज़्यादा आराम कतई नहीं था। अतिरिक्त उत्पादन से सिरचढ़े अभिजात्य वर्ग का उदय हुआ। एक औसत कृषक एक औसत घुमंतू मनुष्य के मुक़ाबले ज़्यादा कठोर मेहनत करता था और बदले में बदतर ख़ुराक हासिल करता था।

पुस्तक में आगे लिखा है कि एग्रीकल्चरल रेवोल्यूशन इतिहास का सबसे बड़ा फ्रॉड था। मनुष्य 10,000 साल पहले तक शिकार और वनस्पतियों को खाते हुए अच्छा-ख़ासा चैन का जीवन जी रहा था, लेकिन इसके बाद इसने खेती में ज़्यादा से ज़्यादा उद्यम लगाने की शुरुआत की। कुछ ही सहस्राब्दियों के भीतर मनुष्य दुनिया के बहुत-से हिस्सों में खेती पर बहुत ज्यादा ध्यान देने लगा। यह आसान नहीं था। फसलों को चट्टानें और कंकड़-पत्थर पसन्द नहीं थे, इसलिए मनुष्य इन सब चीज़ों से खेतों को साफ़ करने में कमर तोड़ मेहनत करने लगा। फसलों को अपने पास मौजूद पानी और पोषक तत्वों को दूसरी वनस्पतियों से साझा करना पसन्द नहीं था, इसलिए मर्द और औरतें पूरे दिन-दिन भर तीखी धूप में बैठकर खेतों की निराई करने लगे। फसलें बीमार पड़ जाती थीं इसलिए मनुष्य को कीड़ों और पाले पर निगाह रखनी पड़ती थी। फसलें खरगोशों से लेकर टिड्डी दल तक अनेक दूसरे प्राणियों के सामने असहाय थीं, इसलिए किसानों को उसकी रखवाली और रक्षा करनी पड़ती थी। फसलें प्यासी थीं इसलिए मनुष्य झरनों और नदियों से पानी ढोकर उसकी सिंचाई करते थे। यहां तक कि फसलों की भूख ने मनुष्य को जानवरों का मल इकट्ठा करने तक पर मजबूर कर दिया, ताकि वे इस मल से फ़सल वाली ज़मीन को पोषण मुहैया करा सकें।

मनुष्य का शरीर इस तरह के कामों के अनुरूप ढला नहीं था। वह वृक्षों पर चढ़ने और हिरणों के पीछे दौड़ने का अभ्यस्त था, ना कि चट्टानें हटाने और पानी की बाल्टियां ढोने का। इसकी क़ीमत इंसानों की रीढ़, घुटनों, गर्दन और तलुओं को चुकानी पड़ी। प्राचीन कंकालों का अध्ययन बताता है कि दुनिया में कृषि के प्रवेश ने अनेक क़िस्म की बीमारियों को जन्म दिया, जैसे कि स्लिप डिस्क, गठिया और हर्निया।खेती से जुड़े नए उद्यम इतने ज़्यादा समय की मांग करते थे कि लोगों को मजबूर होकर खेतों के क़रीब स्थाई रूप से बस जाना पड़ा। इसने मनुष्य की जीवन-पद्धति को पूरी तरह बदल दिया। धीरे धीरे हम इस खेती के पालतू बनते चले गए। गेहूं, चावल और आलू जैसी फसलों को हमने पालतू नहीं बनाया बल्कि इन फसलों ने हमें पालतू बना कर रख दिया।

कृषि को मनुष्य के जीवन के लिए मूल आधार बताने वालों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि कृषि ने मनुष्य को स्वतंत्र मनुष्य से पालतू जानवर में तब्दील कर दिया।कृषि मनुष्य के अब तक के इतिहास का सबसे बड़ा फ्रॉड है। एग्रीकल्चरल रेवोल्यूशन से पहले अनाज मनुष्य के आहार का एक बहुत छोटा-सा हिस्सा हुआ करते थे।अनाजों पर आधारित आहार खनिजों और विटामिनों की दृष्टि से कमज़ोर, पचाने की दृष्टि से मुश्किल और आपके दांतों और मसूड़ों के लिए वाक़ई बुरा होता है। कृषि ने लोगों को आर्थिक सुरक्षा भी उपलब्ध नहीं कराई। एक किसान की ज़िन्दगी घुमंतू मनुष्य के मुक़ाबले कम सुरक्षित होती है। घुमंतू मनुष्य अपने जीवित बने रहने के लिए दर्जनों प्रजातियों पर निर्भर करते थे इसलिए भोजन के संरक्षित भंडारों के बिना भी मुश्किल हालात का सामना कर सकते थे। अगर एक प्रजाति की उपलब्धता कम हो जाती थी तो वे दूसरी बहुत-सी प्रजातियों का शिकार और संग्रह कर सकते थे।कृषक समाज, अभी बहुत हाल के वक़्त तक अपनी कैलोरी की बहुत बड़ी मात्रा के लिए घरेलू बना ली गई वनस्पतियों की बहुत थोड़ी-सी ही क़िस्मों पर निर्भर हुआ करता था। बहुत-से इलाक़ों में वे महज़ एक ही मुख्य भोज्य पदार्थ, जैसे कि गेहूं, आलू या चावल पर निर्भर करते थे। अगर बारिश नहीं हुई या टिड्डी दल का हमला हो गया या फफूंद ने उस भोज्य पदार्थ की प्रजाति को दूषित करना सीख लिया, तो किसान हज़ारों और लाखों की तादाद में मरते थे। एग्रीकल्चरल रेवोल्यूशन ने मनुष्य को न सिर्फ पालतू बनाया बल्कि भोजन समेत किसी भी मामले में आत्मनिर्भरता खत्म कर दिया। पालतू जानवरों के विशाल हिस्से के लिए एग्रीकल्चरल रेवोल्यूशन एक भयावह तबाही थी।

जानवरों को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ चलने पर मज़बूर करने के डेरी उद्योग के अपने ढंग रहे हैं। गायें, बकरियाँ और भेड़ें तभी दूध देती हैं, जब वे बछड़ों और मेमनों को जन्म देती हैं और जब तक उनके ये बच्चे स्तनपान करते हैं। इन जानवरों के दूध की आपूर्ति को जारी रखने के लिए किसान के लिए ज़रूरी होता है कि स्तनपान के लिए बछड़े और मेमने हों, लेकिन उन्हें दूध पर एकाधिकार से वंचित रखना भी अनिवार्य होता है। इसके लिए बछड़ों और मेमनों का हक़ छीनकर उनकी मां का सारा दूध निकाल लिया जाता है और उन्हें फिर से गर्भवती बनाया जाता है ताकि दूध देने का सिलसिला अनवरत जारी रहे। बहुत से आधुनिक डेरी फ़ार्मों में एक दुधारू गाय काटे जाने के पहले सामान्यतः पांच साल जीवित रहती है।इन पांच सालों के दौरान वह बार बार गर्भवती की जाती है ताकि दूध का अधिकतम उत्पादन सुनिश्चित हो सके। उसके बछड़ों को जन्म लेने के कुछ ही समय बाद उससे ज़ुदा कर दिया जाता है। बछियों को दुधारू गायों की अगली पीढ़ी के तौर पर पाला जाता है, जबकि बछड़ों को मांस उद्योग के हाथों में सौंप दिया जाता है। एक अन्य तरीक़ा बछड़ों और मेमनों को उनकी मांओं के क़रीब बनाए रखना, लेकिन तरह-तरह की युक्तियों के सहारे उन्हें बहुत ज़्यादा दूध पीने से रोकना है। इसका सबसे सरल तरीक़ा मेमने या बछड़े को स्तनपान की छूट देना और दूध का प्रवाह शुरू होते ही उसे वहां से दूर भगा देना है। इस तरीक़े को सामान्यतः मां और बच्चे दोनों का विरोध झेलना पड़ता है। गड़रियों के कुछ क़बीले बछड़ों या मेमनों को मार दिया करते थे, उनका मांस खा लेते थे और उनकी चमड़ी के ढांचे को घास से भर देते थे। इसके बाद इस घास से भरे हुए बच्चे को उसकी मां के सामने खड़ा कर दिया जाता था, ताकि उसकी मौजूदगी उसे दूध पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करे। कभी कभी वे घास से भरे जानवरों पर उनकी मां का मूत्र चुपड़ देते थे, ताकि इन नक़ली बछड़ों से पहचानी हुई जीवित गन्ध आ सके।

लुप्त होने की कगार पर खड़ा एक दुर्लभ गैंडा शायद उस बछड़े के मुक़ाबले ज़्यादा सन्तुष्ट होगा, जो अपना संक्षिप्त-सा जीवन एक छोटे से कटघरे में बिताता है। इससे यह समझ बनती है कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से अपने भोजन की स्वयं वर्षों से व्यवस्था करते आ रहा है। हर एक व्यक्ति को उसके पसंद के आधार पर भोज्य पदार्थ ग्रहण करने की स्वतंत्रता है। विभिन्न जाती, धर्म, सम्प्रदाय तथा पंथ के आधार पर इसे बाटने की कोशिश नहीं किया जा सकता है।

अंडा गोल या अंडाकार जीवित वस्तु है जो बहुत से प्राणियों के मादा द्वारा पैदा की जाती है। अधिकांश जानवरों के अंडों के ऊपर एक कठोर आवरण होता है जो अंडे की सुरक्षा करता है। यद्यपि अंडा जीवधारियों द्वारा अपनी संताने पैदा करने का मार्ग है, किन्तु अंडा खाने के काम भी आता है। पोषक तत्वों की दृष्टि से इसमें प्रोटीन एवं चोलाइन भरपूर मात्रा में पाये जाते हैं।

The egg remains one of nature’s most perfect foods. Locked inside the white shell lie a host of vitamins and minerals in addition to the highest quality protein found in any food – all for just 70 calories in a standard-size egg. In fact, egg protein is the standard by which other proteins are measured. The nutrients found in eggs contribute to a healthy diet and can play a role in weight management, muscle strength, eye health and brain function to name a few benefits.

New test results show that pastured egg producers are kicking the commercial industry’s derriere when it comes to vitamin D! Eggs from hens raised on pasture show 4 to 6 times as much vitamin D as typical supermarket eggs

Eggs from hens allowed to peck on pasture are a heck of a lot better than those from chickens raised in cages! Most of the eggs currently sold in supermarkets are nutritionally inferior to eggs produced by hens raised on pasture. That’s the conclusion we have reached following completion of the 2007 Mother Earth News egg testing project. Our testing has found that, compared to official U.S. Department of Agriculture (USDA) nutrient data for commercial eggs, eggs from hens raised on pasture may contain:

• 1⁄3 less cholesterol
• 1⁄4 less saturated fat
• 2⁄3 more vitamin A
• 2 times more omega-3 fatty acids
• 3 times more vitamin E
• 7 times more beta carotene

These amazing results come from 14 flocks around the country that range freely on pasture or are housed in moveable pens that are rotated frequently to maximize access to fresh pasture and protect the birds from predators. We had six eggs from each of the 14 pastured flocks tested by an accredited laboratory in Portland, Ore. The chart in Meet the Real Free-range Eggs (October/November 2007) shows the average nutrient content of the samples, compared with the official egg nutrient data from the USDA for “conventional” (i.e. from confined hens) eggs. The chart lists the individual results from each flock.

Free-Range, Pastured and Organic Eggs
Free Range vs. Pastured Chicken and Eggs – Discover the difference between the labels “free range” and “pastured”when it comes to eggs and chicken meat.

How to Decode Egg Cartons – Not all eggs are created equal, so it’s important to know how to decode egg cartons’ different labels.

  1. How Do Your Eggs Stack Up?
    Whether you live in the city or country, here’s how to find healthy, delicious, farm-fresh eggs — and even raise a few happy chickens of your own.
  2. Portable Chicken Mini-coop Plan
    With this unique, portable chicken mini-coop design, anyone can keep a few chickens, even in small back yards.
  3. Best Chicken Breeds for Backyard Flocks.Use our survey results to help you choose the best chicken breeds for eggs, meat, temperament, and more.
  4. Raising Free-Range Chickens
    A homestead handbook for novice poultry keepers. Details on raising free-range chickens naturally and selling eggs.
  5. Saving Heritage Breeds
    Join the Real Food Revival and you can help save heritage breeds and endangered livestock

Poultry Pest Patrol – Expert tips on how poultry can control problems with flies, mosquitoes, ticks, fleas, pillbugs, grasshoppers, millipedes and more.

Raising Poultry – Everything to get you started raising poultry!

Heritage Chicken Breeds and Other Poultry – All about heritage poultry breeds.

Coops and Cages – Tips for choosing a coop and DIY plans to build your own.

Feeding Your Poultry – Expert advice on what how to choose feed for your poultry.

All About Eggs – Free-range vs. pastured, tips for selling eggs, how to store fresh eggs, and much more.

Preparing Poultry Meat – How to prepare poultry for cooking.

Eat Wild: The Clearinghouse for Information on Pasture-Based Farming – The #1 clearinghouse for information about pasture-based farming and features a state-by-state directory of local farmers who sell directly to consumers.

The Livestock Conservancy – Protects genetic diversity in livestock and poultry species through the conservation and promotion of endangered breeds.

City Ordinances: Resources to Legalize Chickens in Your Community
How to Change Chicken Ordinances – Learn how to approach your city council to revise the rules with these tips from our readers.

Seattle Tilth: FAQs About City Chickens
Answers to common questions about chickens in the city.

Statement on Chicken Ordinances
A statement in support of changing chicken ordinances.

एक शोध के अनुसार वैज्ञानिकों ने उन तमाम तथ्यों का खंडन किया है कि हाई कोलेस्ट्रोल युक्त भोजन या अंडो का सेवन ह्रदयघात की सम्भावनाओं को बढ़ाता है। रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि ऐसे व्यक्तियों में भी जिनके परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी ह्रदय रोग की समस्या होाता है, उनमें भी कोलेस्ट्रोल या अंडो के सेवन से ह्रदय रोग का खतरा नहीं होता। वैज्ञानिकों ने इस तथ्य को ख़ारिज किया है कि हाई कोलेस्ट्रोल या प्रतिदिन एक अंडा खाने से कोरोनोरी ह्रदय रोग के साथ सामान्य कैरोटिड धमनी की दीवार अधिक मोटी हो जाती हैं। इसके साथ ही कोलेस्ट्रोल मेटाबोलिज्म को प्रभावित करने वाले APOE 4 फिनोटाइप प्रोटीन की मौजूदगी वाले व्यक्तियों में भी इसका कोई प्रमाण नहीं मिला हैं। शोध में शामिल प्रतिभागियों ने पिछले 21 सालों तक की जीवन शैली का अनुशरण करने के बाद ही इन तथ्यों को उजागर किया गया है कि विटामिन और मिनरल्स से भरपूर अंडे को जायके के साथ-साथ अन्य तरह के भोजन में भी बड़े चाव के साथ परोसा एवं खाया जाता है।

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