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सुविख्यात कवि राजेश जोशी जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ

सुविख्यात कवि राजेश जोशी का जन्म 17 july1946 को मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ जिले में हुआ। उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद पत्रकारिता शुरू की और कुछ सालों तक अध्यापन किया। फिर स्टेट बैंक में नौकरी की . राजेश जोशी ने कविताओं के अलावा कहानियाँ, नाटक, लेख और टिप्पणियाँ भी लिखीं। साथ ही उन्होंने कुछ नाट्य रूपांतर तथा कुछ लघु फिल्मों के लिए पटकथा लेखन का कार्य भी किया। उनके द्वारा भतृहरि की कविताओं की अनुरचना भूमिका “कल्पतरू यह भी” एवं मायकोवस्की की कविता का अनुवाद “पतलून पहिना बादल” नाम से किए गए है। कई भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अँग्रेजी, रूसी और जर्मन में भी उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं।

राजेश जोशी के चार कविता-संग्रह- ‘एक दिन बोलेंगे पेड़’, ‘मिट्टी का चेहरा’, ‘नेपथ्य में हँसी’ और ‘दो पंक्तियों के बीच’, दो कहानी संग्रह – ‘सोमवार और अन्य कहानियाँ’, ‘कपिल का पेड़’, तीन नाटक – ‘जादू जंगल’, अच्छे आदमी’, ‘टंकारा का गाना’ प्रकाशित हुए हैं । इसके अतिरिक्त आलोचनात्मक टिप्पणियों की किताब – ‘एक कवि की नोटबुक’ भी प्रकाशित है । उन्हें शमशेर सम्मान, पहल सम्मान, मध्य प्रदेश सरकार का शिखर सम्मान और माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार के साथ केन्द्र साहित्य अकादमी के प्रतिष्ठित सम्मान से सम्मानित किया गया है।

राजेश जोशी की कविताओं में गहरे सामजिक सरोकार हैं। यह कविताएँ जीवन की निराशा में भी गहरी आस्था और विश्वास को उभारती हैं। उनकी कविताओं में स्थानीय बोली-बानी, मिजाज़ और मौसम , कहावतें और मुहावरे सभी कुछ बिम्बों और रूपकों में दिखाई देता है।कहीं कहीं यह कविताएँ एक कथा की तरह चलती हैं उनके काव्यलोक में आत्मीयता और लयात्मकता है तथा मानवता को बचाए रखने का एक निरंतर संघर्ष भी दिखाई देता है । दुनिया के नष्ट होने के खतरे की ओर वे इशारा करते हैं वहीँ जीवन की संभावनाओं की खोज के लिए बेचैन दिखाई देते हैं।

आज राजेश जी का जन्मदिन है उन्हें अनगिनत बधाईयाँ और शुभकामनाएँ . साथ में उनको चित्रों को लेकर मेरे द्वारा बनाया गया एक कोलाज

शरद कोकास

कवि राजेश जोशी की चिठ्ठी शरद कोकास के नाम

प्रिय शरद ,

बहुत दिन बाद तुम्हारी लम्बी कविता ‘देह’ को पढ़ा है । हालांकि एक पाठ कविता के लिये और खासतोर से लम्बी कविता के लिये नाकाफ़ी है । गहन आवेगात्मक लय के साथ चलती यह एक महत्वपूर्ण कविता है । इसमें देह की विकासगाथा भी है और देह के इतिहास का आख्यान भी । एक साथ कई स्तरों पर चलती कविता की कई परतें हैं ।

पृथ्वी सहित अनेक ग्रहों की देह के आकार लेने की गाथा से शुरू कविता धरती पर जीवन के आकार लेने की गाथा में प्रवेश करती है और अमीबा के निराकार से आकार तक की यात्रा की तरफ जाती है ।

कहना न होगा कि तुम एक साथ विज्ञान , इतिहास ,दर्शन और क्लासिकल साहित्य की स्मृतियों को एक दूसरे से बहुत खूबसूरती से गूंथ देते हो। यह रास्ते बड़ी कविता की ओर जाते हैं ।

इसमें किस तरह हमारे पुरखों की , कई बार हमारे विस्मृत पुरखों की परछाइयाँ उनकी सन्ततियों तक जाती हैं , इसका भी बहुत खूबसूरती से तुमने इस्तेमाल किया है ।

यह सच है कि मनुष्य की देह सचमुच एक पहेली है । जितना उसे ज़्यादा से ज़्यादा जानने की कोशिश होती रही है उतनी ही वह अबूझ भी बनी ही रहती है ।

“एक देह की जिम्मेदारी में शामिल होती हैं
अन्य देहों की ज़रूरतें ।”

यह एक महत्वपूर्ण विचार भी है और पंक्ति भी । तुम इतिहास में मनुष्य देह के साथ किये गये अनेक अत्याचारों की स्मृतियों के साथ ही तात्कालिक इतिहास की यूनीयन कार्बाइड , नरोड़ा पाटिया , आदि को भी समेट लेते हो । इस तरह एक बड़ा वृत्त यह कविता बनाती है ।

इसमें उन भविष्यवाणियों की ओर भी संकेत है जो खतरों की तरह मंडरा रही हैं । देह के मशीनों में बदलने के प्रयास का भी जिक्र यहाँ है । कहना न होगा कि बिना एक सही और प्रगतिशील विचारधारा के इतना बड़ा वृत्त खींचना और उनके बीच के सम्बंधों के महीन तागों को छूना संभव नहीं था । उपलब्धि , खतरे और भयावह सच्चाइयों के साथ कहीं लगता है कि एक बड़े स्वप्न को भी इसमें जगह मिलनी चाहिये थी । लेकिन एक महागाथा की तरह यह कविता बहुत सारे मनों को बेचैन करेगी ।

शुभकामनाओं के साथ ..

तुम्हारा

राजेश जोशी

भोपाल ,14.10.16


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