Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

बच्चे देश और समाज का भविष्य होते हैं। स्वस्थ बच्चे एक समृद्ध देश और समाज का निर्माण करते हैं। स्वतंत्रता के 70 वर्षों बाद भी जिस देश में कुपोषित बच्चों की संख्या , विश्व में सबसे अधिक है , वह विश्व गुरु होने के सपने कैसे देख पायेगा ?

‘ भूख ‘ के वैश्विक इंडेक्स में भारत 119 देशों की लिस्ट में 103 वे स्थान पर है , प्रतिदिन 3000 बच्चे कुपोषण से मरते हैं हमारे देश में। भारत सरकार के राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने , जोकि भारत सरकार के स्वास्थ एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतरगत संचालित होता है, कुपोषण मुक्त बच्चों वाले भारत के लिए , मध्यान्ह भोजन में अंडे देना अनिवार्य बताया है।

इसी के तहत छत्तीसगढ़ में लाखों गरीब बच्चों को कुपोषण के दुष्चक्र से बाहर निकालने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने , मध्यान्ह भोजन के अंतर्गत जो बच्चे स्वेक्षा से अंडे खाना चाहें उन्हें अंडे खिलाने की एक बेहतरीन योजना प्रारंभ की है। दुर्भाग्यवश कुछ लोग धार्मिक आस्थाओं के नाम पर इसका विरोध कर रहे हैं।

सभी की धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करना चाहिए किन्तु क्या विश्व में दूसरे नंबर का बीफ निर्यात करने वाला देश होने और देश की संसद की कैंटीन में subsidized मांसाहार बेचने पर धार्मिक भावनाओं को आघात नहीं पहुंचता ? ‘यत्र नार्यस्य पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ जैसे धार्मिक मूल्यो वाले देश में छह महीने में 24000 बलात्कार की शिकार बच्चियों के लिए भावनाएं आहत नहीं होतीं , सड़कों पर नहीं निकलता कोई , हाँ गरीब बच्चों को स्वस्थ रखने के लिए अंडे खिला दिए जाएँ तो लोग धर्म के नाम पर सड़कों पर उतर आते हैं।

पता नहीं कब और किस प्रकार से हमारी धार्मिक आस्थाएं , मानव हित के सामयिक सन्दर्भों से दूर होकर जड़ , अंधविश्वास में परिवर्तित हो गयीं और हम , धर्म को मानव हित के व्यापक मूल्यों की स्थापना के एक माध्यम के रूप में देखने के बजाये , खाने पीने की वस्तुओं में ही धर्म के अस्तित्व को ढूढ़ने जैसी संकुचित सोच के शिकार हो गए।

धार्मिक आस्थाओं के नाम पर जब समाज हित और देश हित को अनदेखा किया जाने लगे , धार्मिक आस्थाएं जब घर और समाज की सीमा से बाहर आकर सार्वजनिक मुद्दों में अपनी पहचान स्थापित करने कोशिश करने लगें , तब क्या यह नहीं समझ लेना चाहिए कि वह धर्म नहीं कुछ और ही है ?

और फिर , यह कोई थोपी जाने वाली योजना तो है नहीं , जिसकी आस्था प्रभावित हो वह ना खाये। बिलासपुर में हर 100 कदम पर एक दूकान में अंडे बिकते हैं और प्रति किलोमीटर एक दूकान में मुर्गे । मांसाहार को इससे प्रोत्साहन नहीं मिलता ? नहीं ना , क्योकि इनसे तो वही मांसाहारी होते हैं ना जिनकी जेब में पैसा हो। और साधन सम्पन लोगों के मांसाहारी होने से धार्मिक आस्थाएं आहत नहीं होती , वे तो बस गरीब बच्चों के अंडा खाने से होती हैं। कभी कभी लगता है , इस प्रकार की योजनाओं का विरोध भी गरीबों के विरुद्ध ‘खाये अघाये ‘ लोगों का एक षड्यंत्र होता है , धर्म के नाम पर, क्योकि स्वस्थ होंगे बच्चे तो बुद्धिमान होंगे बच्चे , समृध होंगे बच्चे , जो शायद कुछ लोगों को पसंद नहीं.

मै एक धार्मिक व्यक्ति हूँ , मै स्वयं भी प्रतिदिन एक अंडा खाती हूँ और मेरे बच्चे भी रोज़ अंडे खाते हैं। क्योंकि अंडे , पोषण की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित सरकारी संस्था के मतानुसार , पोषक तत्वों के सबसे सस्ते , सबसे सुलभ , सबसे अच्छे स्त्रोत हैं। इसलिए मेरी अपेक्षा है की छत्तीसगढ़ सरकार इस योजना को अवश्य लागू करेगी.

Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.