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वन कानून संशोधन

पुरुषोत्तम शर्मा
( लेखक अखिल भारतीय किसान महासभा राष्ट्रीय सचिव और ‘ ‘ विप्लवी किसान संदेश ‘ ‘ पत्रिका केे संपादक है )
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मार्च 2018 में जब पूरे देश का ध्यान आगामी लोकसभा चुनावों पर लगा था , मोदी सरकार ने चुपके से सभी राज्य सरकारों को भारतीय वन कानून 1927 में भारी संशोधन एक प्रस्ताव भेज दिया । इसमें राज्यों सुझाव की मांग जुलाई 2019 तक इसे कानुन बना देने का संकेत दे दिया । मोदी सरकार जानती कि यही समय है जब इस संशोधन पर न किसी की नजर जाएगी और न ही कोई बहस होगी । इस संशोधित वन कानून में अब तक देश जनता खासकर आदिवासियों , वनवासियों , पहाड और जंगलों में सदियों से रहने वाले समुदायों को मिले परंपरागत वन अधिकारों को ख़त्म करने उन्हें अतिक्रमणकारी घोषित करने , उनके उत्पीड़न के लिए वन विभाग को असीमित अधिकार देने और अंततः जनता द्वारा हजारों वर्षों पाले पोसे गए हमारे वनों कारपोरेट लूट का अड्डा बनाने का प्रावधान किया गया है ।

 वन कानून में मोदी सरकार का यह संशोधन कहता है कि अब राज्य सरकार किसी भी सरकारी वन , सामुदायिक वन निजी वन व अन्य किसी भी प्रकार भूमि आरक्षित वन गठित कर सकती । यदि सरकार को पारस्थितिक , वानस्पतिक , पुष्प जीव , सिल्वीकल्चर , ज्यूलाजिकल भू - आकृति विज्ञान हाइड्रोलाजिकल महत्व लिए वहां ऐसा करना जरूरी लगे जहां राज्य सरकार ने ऐसा वन गठित न किया हो , वहां केंद्र सरकार राज्य सरकार को इसके लिए समयबद्ध दिशा निर्देश दे सकती हैं । संशोधन जनता , आदिवासियों और वनवासियों के वन अधिकारों पर रोक लगाता है । अब वन भूमि के रूप में दर्ज पर वही रह सकता है जिसके पास इसकी विरासत के सबूत या कोई सरकारी आदेश पर उसे इस सब के बावजूद इस भूमि का पट्टा भूमि अधिकार नहीं मिलेगा । वह उस सीमित जमीन पर फसल नहीं बो सकता। मकान , दुकान , टिनसैड नहीं बना सकता । घास , गिरी सूखी पत्तियों , गिरी लकड़ी , पेड़ की छाल , पारा पत्ती सहित किसी भी वन उत्पाद का दोहन नहीं कर सकता । वन भूमि आग नहीं जला सकता । 

वन भूमि में किसी भी प्रकार के पालतू जानवर को चराने लिए ले जाना भी वन अपराध श्रेणी में होगा । वन भूमि ऐसी गतिविधियां अब गंभीर वन अपराध श्रेणी में गिनी जाएंगी । राज्य या सरकार गजट नोटिफिकेशन के जरिये जनता को अब तक मिले परंपरागत कानूनी और संवैधानिक वन अधिकारों पर कभी रोक लगा सकती है । 

 प्रस्तावित संशोधन कहता है कि रेंज स्तर वन अधिकारी अब ऐसी किसी भूमि लिए सर्च वारंट जारी कर वहां जांच कर सकता है । वह सीआरपीसी ( CRPC ) की धाराओं तहत लोगों लिए वारंट जारी कर सकता और उन्हें गिरफ्तार कर सकता । वन अपराध दिखने पर जरूरत पड़े तो उसे गोली चलाने का अधिकार दे दिया गया है । जबकि पहले कानून में प्रावधान था वन अपराध होने वन विभाग के अधिकारी पहले संबंधित ग्राम सभा उस अपराध पुष्टि करेंगे तभी वन अपराध दर्ज  होगा । पहले आम लोगों द्वारा वन अपराध पर न्यूनतम 50 रुपए अधिकतम 500 तक जुर्माना और एक माह तक की सजा का प्रावधान इसे अब अलग अलग धाराओं अपराधों के लिए अलग - अलग जुर्माना और सजा का प्रावधान में बदला गया जो न्यूनतम 10 , 000 रूपए जुर्माना और माह की सजा से शुरू कर 50 , 000 रुपए जुर्माना और छः माह की सजा तक बढ़ा दिया है , दूसरी बार उसी अपराध में पकड़े पर जुर्माना व सजा दोगुना हो जाएंगे । यानी एक साल की सजा और 1,00,000 ( एक लाख )रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा । 

पहले जंगल से सूखी जलावनी लकड़ी का गठ्ठर पकड़े जाने पर जो 50 रुपए का जुर्माना भरना होता था , अब वह 10,000 रूपया कर दिया गया है । जंगलों में आग लगाने पर अब तक वन विभाग व पुलिस को सूचित करने की जिम्मेदारी जनता की थी । उसमें राजस्व विभाग को भी जोड़ा जा चुका है । वन भूमि में जमीन को तोड़ना , खोदना , वनस्पति को नष्ट करना और मिट्टी क्वालिटी को खराब करना भी वन अपराध की 9 में होगा । यानी अब घरों की लिपाई के लिए लाई जाने वाली मिट्टी पर भी रोक लग जाएगी । 

 संशोधन में प्रावधान है कि जिन लोगों अधिकार सरकार खत्म करेगी वे अब कोई अपील कर सकते हैं और न ही उनकी कहीं कोई सुनवाई होगी । सरकार को इसका कारण बताने के लिए भी बाध्य नहीं किया सकता है । लोगों या समुदायों के अधिकारों खत्म करने का आदेश जिला वन अधिकारी डीएफओ ) दे सकता है । इसके खिलाफ फारेस्ट कंजरवेटर के पास अपील करने अधिकार जरूर है । पर कंजरवेटर का आदेश कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती । माना अंतिम होगा और उसके आदेश को किसी वन अपराधों के मामले में डीएफओ मजिस्टेट और कंजरवेटर को सुप्रीम जैसी पावर दे दी गयी है । अब वन । ' आपके खिलाफ अपराध दर्ज करेगा और वही 

आपको न्याय देने वाली संस्था भी होगा मगर किसी कंपनी या संस्था से वन अपराध होने पर स्थल पर मौजूद अधिकारी देह भागी होगा । पर यह साबित कर दिया जाय कि वह अधिकारी अपराध से अनजान या तो उसको सजा दंड छूट पाने अधिकार होगा । इस तरह से वन अपराध मामले में आम जनता को अपराधी ठहरा कर सजा देन आर कारपोरेट कंपनियों को खुला संरक्षण देने का प्रावधान किया गया है । इस प्रारूप में वन समुदायों नई परिभाषा बताई गयी है । लोगों के वह समूह जो जंगलों में रहते हैं , सरकारी रिकार्ड में वन आश्रित के रूप में दर्ज हैं और वनों सामूहिक उपयोग करते हैं । उन्हें अब किसी नस्ल , धर्म और जाति में शामिल नहीं किया जाएगा । इसका मतलब वनों रहने वाले लोग अथ अनुसूचित जाति , जनजाति या वन गुर्जर के रूप में दर्ज नहीं हॉगे जब ऐसा हो जाएगा तो ” वनाधिकार कानून कानून 2006 ” , आदिवासियों के संरक्षण के लिए संविधान की पांचवीं अनुसूची में दर्ज पंचायत एक्सटेंशन टू सिड्यूल एरियाज एक्ट 1996 ( सा ) ‘ , ‘ संथाल परगना टेनेसी एक्ट ” , सिंहभूमि में लागू ‘ विलकिंसन सिड्यूल एक्ट ‘ जैसे कानून स्वतः निष्प्रभावी हो जाएंगे |

        प्रस्तावित प्रारूप वनों की नई परिभाषा बताता है । जैसे ( 1 ) कोई भी ऐसी भूमि जिसे केंद्र या राज्य सरकार ने जंगल के रूप नोटिफाइड किया हो , वह निजी या सामूहिक भी हो सकती है । 2 ग्राम सभा , वन पंचायत , समूदाय द्वारा संचालित ग्राम वन अब सरकार की सूची में आ गए हैं । ( 3 ) पंचायतों को अब वन कानुन या सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत करानी अनिवार्य होगा । ( 4 ) वन पंचायतें फिर संयुक्त वन प्रबंधन समिति ( जे एफ एम ) माध्यम से संचालित होंगी । ( 5 ) दनों में अब उत्पादक जंगल एक नई श्रेणी होगी । जिनमें किसी खास समय तक के लिए सरकार कंपनियों या संस्थाओं को लकड़ी , प्लाइवुड जड़ी - बूटी , मछली सहित तमाम वन उत्पादों व्यावसायिक उत्पादन और दोहन इजाजत देगी । इसके लिए बैंक ऋण या जंगल गिरवी रखने की इजाजत नहीं दी जाएगी

6 ) आदिवासी समुदायों को अपनी परंपरागत शुम खेती की इजाजत अव नहीं होगी । इसके लिए सरकार एक कमेटी गठन करेगी जो ज्यादा जरूरी होने सीमित रूप में झूम खेती के लिए जमीन चिन्हित करेगी ।

  मोदी सरकार ने एक साल पहले ही वन कानून की धारा 2 ( 7 ) में बदलाव कर बांस वन उत्पाद की श्रेणी से बाहर कर दिया था । अब नए संशोधन में इसे व्यावसायिक उत्पाद घोषित कर कारपोरेट द्वारा उसके व्यापक दोहन का रास्ता खोल दिया गया भारत में इस समय बाँस की 125 किस्में उगाई जाती हैं । भारत में अभी 113 . 6 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में वास उगाया जाता है । लगभग 135 लाख टन बांस के उत्पादन का बाजार भाव अभी 5 हजार करोड़ रुपए का है । इसे अब 50 हजार करोड़ रुपए तक पहुंचाने लक्ष्य है । कारपोरेट के हाच में बास उत्पादन दोहन का काम हस्तांतरित होने के आदिवासी वनवासी अपनी जरूरतों के लिए जंगलों बसि नहीं ला पाएंगे । इसी तरह अब टिंबर की परिभाषा को भी बदला जा पहले जो पेड़ गिरे या गिराए गए टिंबर कहते थे । अब इसके साथ उखाड़े और आरी काटे गए टुकड़ों को भी टिंबर की श्रेणी में रखा गया है । 

   नए वन कानुन का उद्देश्य वनों का संरक्षण पर्यावरण संरक्षण , वन्य जीव संरक्षण और जैव विविधता का संरण करना बताया रहा है । जबकि 1927 के वन कानून उद्देश्य वन पद पर टैक्स चुगी ) और उन उत्पादों की निकासी को नियंत्रित करने संबंधित था । इसके अलावा 1878 और 1927 के वन कानूनों वन आच्छादित क्षेत्र व्यवस्था , वन्य जीवों की सुरक्षा भी शामिल । नए कानून के प्रारूप की अन्य मुख्य बाते खतरनाक है । अब वन क्षेत्र से निकलने वाले वन उत्पादों व मनी के इस्तेमाल पर 100 % अतिरिक्त “ वन विकास टैबस ' ' देना होगा । वनों के संवर्धन के लिए इसका अलग कोष बनेगा । अगर वनों के प्रबंध संरक्षण में लोगों की आबादी के कारण असर पड़ रहा हो तो राज्य सरकार इन लोगों ऐसी भमि से हटा सकती या अन्यत्र स्थानांतरित कर सकती है । जरूरत पड़े तो उन्हें मुआवजा देकर वन क्षेत्रों से बेदखल सकती है । वनाधिकार कानून में मिले पढ़ी अलावा अब वन भूमि में कोई नया पट्टा भी दिया जाएगा । अब तक फारेस्ट सेटमः अधिकारी सम्मुख पेशा शिकायत पर तीन माह के नोटिस पर मुआवजा देना होता था अब अवधि को 6 माह तक बढ़ा दिया गया पहले विस्थापित किया जाने ताला व्यक्ति या समुदाय अगर फैसले मुआवजे संतुष्ट न हो तो अपनी आपत्ति करा सकता । पर अब अगर आपने सरकार तय मुआवजा नहीं लिया तो आपको स्थान से हटा दिया जाएगा ।

         संशोधित प्रारूप में प्रावधान है कि जंगल क्षति बचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें नोटिफिकेशन के माध्यम एक नई अथारिटी बनाएंगे । इस संबंण में राज्य सरकार केंद्र सरकार के कानूनों में टकराव रिथति में केंद्र सरकार के कानून लागू होंगे । केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय वानिकी बोर्ड बनाएगी प्रधान मंत्री जिसके अध्यक्ष और वन मंत्री उपाध्यक्ष होंगे । केंद्र इसमें अन्य सदस्य नामित करेगा । पर प्रारूप के अनुसार इसमें वनों पर निर्भर समुदायों और आदिवासियों को सीधे प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाएगा वन कानूनों में इस सधार के लिए वर्ष 2010 में एम बी शाह कमेटी ने सरकार की एक रिपोर्ट पी । 22 मार्च 2011 को केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने वन अधिकारियों को मिले अधिकारों को कम कर दिया था जिसके बल पर वे आदिवासियों और वन समुदायों को अनावश्यक उत्पीड़न कर रहे । वर्ष 2015 में टी एस आर सुन्नमण्या कमेटी ने भी अपनी एक रिपोर्ट सरकार के सौंपी । इंस्पेक्टर जनरल फारेस्ट नोयाले थॉमस द्वारा भी इस संबंध में सरकार के इनपुट दिए गए । कुल मिलाकर कहा जाए वन कानून 1927 में मोदी सरकार द्वार लाया गया यह संशोधन वनों से जनता परंपरागत कानूनी और संवैधानिक अधिका खत्म करने और वनों को कारपोरेट की को चारागाह बनाने का दस्तावेज है ।

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