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डा. नरेंद्र दाभोलकर इस सवाल का जवाब तर्कों के आधार पर देते हुए कहते हैं । आदि आत्मन इति आत्मन .
आत्मा का विचार करना ही आध्यात्म का प्रचार करना है.आत्मा नाम की कोई चीज तो होती नहीं है । इसलिए कायदे से मुझे आत्मा के बारे में बात करने की जरूरत नहीं है । इसलिए जब कहा जाता है कि जब विज्ञान खत्म होता है वहीं से आत्मा शुरू होता है . तो यह बात वैसी ही हैं कि कहा जाए – जहाँ पुणे की सीमा समाप्त होती हैं वहीं से मुम्बई की सीमा आरंभ होती है । इसके विपरीत भी कहा जा सकता है कि जहां मुंबई को सीमा समाप्त होती है , वहीं से पुणे को सीमा आरम्भ होती है ।

डा दाभोलकर ने पहले ही विज्ञान के विकास पर चर्चा करते हुए बताया था कि विज्ञान कोपर्निकस से आरंभ हुआ और सिर्फ 6 सौ साल पुराना हैं . 6 सौ साल पहले तो विज्ञान नहीं था सिर्फ अध्यात्म ही था . पाँच – दस हजार साल में अध्याय ने मनुष्य के स्वास्थ की समस्या हल नहीं को मनुष्य की भूख को नहीं मिटाया , मनुष्यों के बीच मेलमिलाप की समस्या को हल नहीं किया । जब अध्यात्म को चार साढ़े चार हजार साल तक कुछ भी करना संभव न हुआ तो विज्ञान का जन्म हुआ . उसने चार साढ़े चार सौ साल में बहुत कुछ किया . इसलिए उपर्युक्त वक्तव्य को उलटकर कहा जाना चाहिए कि जहाँ अध्यात्म समाप्त हुआ , वहाँ से विज्ञान का प्रवेश हुआ . संक्षेप में कहा जाए बुद्धि का आयाम विज्ञान है और नैतिकता का आधाभ अध्यात्म है . इसलिए मनुष्य के नीतिवान बनाए रखने की अवधारणा के रूप में अध्यात्म की भूमिका के बारे में भी कुछ नहीं कहना है । मगर अध्यात्म मनुष्य को नीतिवान नहीं बनाता यही मेरी अडचन हैं.

दो बाबा हैं – एक , सत्यसाँई बाबा और दूसरा , गाडगे बाबा . एक के पास चालीस हजार करोड़ की संपत्ति थी तो गाडगिल बाबा ने भी करोड़ रूपये जमा किये . अंगूठाछाप होने के बावजूद वे पैस – पैसे का हिसाब रखते थे । करोड़ रूपये होने के बावजूद उनके खुद के पास क्या था ? भीख माँगने के लिए खपरैल का एक टुकडा , हाथ में डंडा और शरीर पर फटे – पुराने वस्त्र तो ज्यादा आध्यात्मिक कौन था ? सत्यम बाबा या गाडगे बाबा ? अर्थात् लौकिक सुख के परे भी जीवन की एक सार्थकता है , जो लौकिक सुख की तुलना में हजारों गुना अधिक मूल्यवान है । यह बात जिसने पहचान ली और न केवल पहचान लो बल्कि उसे आचरण में भी उतार लिया , वहीं अध्यात्म है । इसीतरह जो लोग संयमी होते हैं , संतोषी होते हैं , सदाचारी होते हैं , सादे होते हैं , अपग्रहो होते हैं , करूणा से भरकर मानवोन्मुख कार्य करते हैं और जिनके चरित्र में शुचिता ओर सच्चरित्रता होती है , उसे यदि आध्यात्मिक कहा जाए तो ऐसे अध्यात्म से मेरा कोई विरोध नहीं है । परंतु सामान्यतः जिस अध्यात्म पर जोर दिया जाता है , वह इस स्वरूप का अध्यात्म नहीं है । इस प्रकार के अध्यात्म ने मनुष्य को किसी भी समस्या को हल नहीं किया है । यह आज का यथार्थ है । इसलिए हम कहते हैं कि विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाज के लिए अनिवार्य है ।

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