छत्तीसगढ़ में अंडे का विरोध,संघी चाल .

राजकुमार सोनी, आम मोर्चा के लिये

छत्तीसगढ़ की सरकार आंगनबाड़ी केंद्र और मध्यान्ह भोजन में गर्भवती माताओं और बच्चों को पोषक आहार के रुप में अंडा देना चाहती है. बहुत से लोग सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं और इसे एक अच्छा कदम बता रहे हैं, लेकिन कतिपय संगठन और लोग ( जिसमें कुछ तथाकथित शाकाहारी भाजपाई पत्रकार भी शामिल है.) विरोध जता रहे हैं. कुछ खुलकर विरोध जता रहे हैं तो कुछ का विरोध सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली… मुहावरे को चरितार्थ करने वाली शैली में हैं. इस विरोध को देखकर लग रहा है कि सब असंतुष्ट भूपेश सरकार को पलट देने की हड़बड़ी में हैं. चूंकि भोजन में अंडे देने का समर्थन करने वाले संगठन और उससे जुड़े लोग झंडे-बैनर लेकर सड़कों पर उतर नहीं रहे और केवल प्रेस विज्ञप्ति तक ही सीमित है, इसलिए ऐसा लग रहा है कि अंडे ने प्रदेश की राजनीति में उबाल ला दिया है.

निजी तौर पर अगर आप मुझसे पूछेंगे कि मैं किस तरफ हूं तो कहूंगा कि मैं अंडा खाने वालों के साथ हूं और चाहता हूं कि एक बच्चे को एक या दो नहीं बल्कि खाने में चार-चार अंडे देना चाहिए. जिन लोगों ने कभी गरीब बच्चों को बड़े चाव से अंडा खाते नहीं देखा वे इस बात को कभी नहीं समझ पाएंगे कि अंडा क्या होता है ? मैं एक ऐसे परिवार से हूं जहां अंडा एक ख्वाब था. जब कभी भी घर में अंडा आता तो हम पांच भाई इस ताक में रहते थे कि कब अंडा उबलेगा और कब हमें खाने को मिलेगा. कई बार तो अंडे के बंटवारे को लेकर भाइयों के बीच प्यार से होने वाली झड़प भी हो जाया करती थी. एक अंडे के कई हिस्से हो जाया करते थे. एक उबले हुए अंडे में थोड़ा सा नमक और काली मिर्च डालकर खाने का मजा क्या होता है इसे वही समझ सकता है जो इसे रोज खाता है. जिसके भोजन में काजू-कतली शामिल रहती है वे इस बात को कभी नहीं जान पाएंगे कि अंडे का मतलब क्या है. मुझे लगता है कि छत्तीसगढ़ के गांवों में अब भी कई घर ऐसे होंगे जहां रहने वाले बच्चे अंडे का इंतजार करते हैं. उनका इंतजार खत्म होना चाहिए.

वैसे अंडा वितरण योजना के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि सरकार ने इसे लेकर कोई बाध्यता नहीं रखी है. जो बच्चे अंडा खाना चाहेंगे उन्हें अंडा दिया जाएगा जो नहीं चाहेंगे उन्हें उतनी ही कैलोरी का कोई अन्य पोषक तत्व देने की योजना भी बनाई गई है. सरकार ने खानपान की स्वतंत्रता का ख्याल रखा है बावजूद इसके सोमवार को एक विधायक ने विधानसभा में यह आशंका जताई कि अगर कोई शाकाहारी बच्चा अंडे को आलू समझकर खा लेगा तब क्या करिएगा ? अब आशंकाओं का कोई हकीम तो होता नहीं है. ये हो जाएगा… वो हो जाएगा… कहने का हक तो सबको है. वैसे विधायक महोदय ने विधानसभा में खुद को लेकर एक मजेदार बात भी बताई. विधायक ने कहा- मैं मटन खाता हूं. चिकन खाता हूं और अंडा भी खाता हूं, मगर फिर भी चाहता हूं कि बच्चों को भोजन में अंडा न दिया जाय. विधायक का कथन सुनकर बचपन में सुना हुआ एक मुहावर भी याद आया- आप गुरूजी बैगन खाए और दूसरों को ज्ञान सिखाएं. ( बैगन मत खाना… बैगन में कीड़े होते हैं.)

छत्तीसगढ़ में काफी समय से विज्ञप्ति आधारित पत्रकारिता चल रही है अन्यथा पत्रकारों के लिए एक अच्छा विषय यह भी हो सकता था कि कौन-कौन सा जनप्रतिनिधि अंडा खाता है? छुपकर खाता है या सार्वजनिक जीवन में भी खाता है ? अंडे का विरोध करने वाले ठीक-ठाक ढंग से यह नहीं बता पाते हैं कि अगर बच्चों को खाने में अंडा न दिया जाए तो फिर क्या दिया जाय. क्या बच्चों को लड्डू-पेड़ा बांटना चाहिए. किसी संगठन ने सोयाबीन देने की बात कहीं है. पाठकों को याद होगा कि प्रदेश में जब भाजपा की सरकार थीं तब सरकार ने स्कूलों में सोयाबीन दूध के वितरण की योजना बनाई थीं. इसके लिए मनीष शाह नाम के एक दलाल से अनुबंध भी किया गया था. खूब हो-हल्ला हुआ कि बच्चों को पौष्टिक सोयाबीन का दूध दिया जाएगा, लेकिन हुआ क्या… दलाल शाह कई करोड़ रुपए का भुगतान लेकर बैठ गया. हालांकि यह दलाल अब भी सक्रिय है और इन दिनों इसकी आवाजाही मंत्रालय में भाजपा सरकार के स्वामीभक्त अफसरों के कमरों में देखी जा सकती है.

वैसे काफी पहले अंडे को फैलाए गए तमाम भ्रम टूट गए हैं. खानपान का अध्ययन करने वाले चिकित्सकों ने  मान लिया है कि अंडा बढ़ते हुए बच्चों के लिए प्रोटीन का एक उत्तम विकल्प है. अंडे में विटामिन सी जैसे एक- दो तत्व छोड़कर सभी तरह के पोषक तत्व मिलते हैं. एक सर्वे यह भी बताता है कि छत्तीसगढ़ के 38 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है और अनुसूचित जनजाति के बच्चों में कुपोषण की यह दर 44 फीसदी है. छत्तीसगढ़ में 83 फीसदी आबादी अंडे का सेवन करती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि देश के 15 से अधिक राज्यों में मध्यान्ह भोजन आंगनबाड़ी केंद्रों में कई सालों से अंडे का वितरण किया जा रहा है. सवाल यह है कि आखिर हम अपने नौनिहालों को क्या कुपोषित ही रहने देना चाहते हैं ? सच तो यह भी है कि शाकाहार या मांसाहार के नाम पर किसी भी समुदाय-विशेष को अन्य लोगों के खानपान पर प्रतिबंध लगाने का कोई अधिकार नहीं है और इसका हमारी संस्कृति से भी कोई लेना-देना भी नहीं है. किसी बच्चे के अंडा खा लेने से संस्कृति नष्ट हो जाएगी और किसी के केला-मौसंबी-संतरा खा लेने से संस्कृति बच जाएगी यह सोचना सिवाए मूर्खता के और कुछ नहीं है. श्रीमान जी प्रदेश की 80 फीसदी आबादी अपने भोजन में मांस का उपयोग करती है. अगर आप शाकाहारी है तो शाकाहारी बने रहिए… आपके शाकाहार होने पर तो कोई विरोध नहीं करता ? चूंकि आप शाकाहार है, इसलिए संस्कृति के रक्षक है यह सोचना ठीक नहीं है. अंडा खा लेने से किसी का धर्म भ्रष्ट नहीं हो जाता है. दरअसल प्रदेश में अंडे का जो विरोध दिख रहा है उसके पीछे संघी गिरोह की कसरत साफ तौर पर दिखाई दे रही है. इस गिरोह को लगता है कि लोग समझ नहीं रहे हैं. सबको पता है कि कौन किस मुद्दे को जरूरत से ज्यादा उछाल रहा है. किसका क्या मकसद है.  संघी गिरोह आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को कुपोषित बनाए रखने की साजिश रचता ही रहा है. इस बार भी यहीं खेल खेला जा रहा है. अफसोस इस बात का है कि इस गिरोह को चारों खाने चित्त कर देने वाला कोई माकूल जवाब अब तक नहीं दिया जा सका है.

अरे… संडे हो या मंडे, हर रोज खाओ अंडे

पर…समझे प्यारे समझो, चड्डियों के हथकंडे

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