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इस सवाल पर डॉ . नरेन्द्र दाभोलकर बेबाकी से कहते हैं – ‘ अंधश्रद्धा श्रद्धा के क्षेत्र का काला बाजार है । काला बाज़ार वालों का धर्म – जाति पूछने की परम्परा नहीं है । अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति सभी धर्मों की अंधश्रद्धा का विरोध करती
है । आज धर्म की बात तो छोड़िए , जातियों में फैली हुई अंधश्रद्धा पर बात करना कोई पसंद नहीं करता । उपनयन संस्कार के बारे में बात करना ब्राह्मण पसंद नहीं करता , विधवा विवाह की बात मराठे पसंद नहीं करते । यात्रा में पशु – हत्या क्यों की जाती है , पूछा जाना धनगर पसंद नहीं करते । जब जातियों के बीच कुछ कहना – सुनना पसंद नहीं किया जाता , तो दूसरे धर्मियों द्वारा बोला गया कैसे सहन होगा ? ‘

  वे आगे कहते हैं , ' मेरे पारा अंधश्रद्धा निर्मूलन की साढ़े तीन हजार वर्षों की परम्परा है । चार्वाक का काल है तीन से साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व । एक मजेदार प्रसंग सुनिये ।  चार्वाक ने एक बार भोजन के लिए ब्राह्मणों को अपने घर बुलाया । बढ़िया खाना बनवाया । खुद निचली मंजिल में बैठे , ऊपरी मंजिल पर ब्राह्मणों को बैठाया । नीचे आराम से भोजन करने लगे , ऊपर ब्राह्मणों को परोसा ही नहीं । इस पर ब्राह्मण बहुत ज़्यादा क्रोधित हुए । वे सीढ़ी उतरकर नीचे आए और गुस्से में कहने लगे - ' ' अरे ! ये कोई बात हुई ! आपने हमें भोजन के लिए बुलाया , खुद तो नीचे आराम से खा रहे हैं , हमें ऊपर भोजन क्यों नहीं परोसा ? ” इस पर चार्वाक ने कहा - ' ' मेरी कोई गलती नहीं है । मुझे लगा कि जब यहाँ परोसा हुआ भोजन आप ऊपर भगवान को पहुँचा सकते हैं । तो नीचे की मंजिल पर परोसा गया भोजन आप आसानी से प्राप्त कर ही लेंगे । 

साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व की तर्कशीलता की यह परम्परा अगर मुझे मिली है तो मुझे उसका उपयोग करना चाहिए या नहीं ! मेरी बात छोड़िए , सावरकर की बात सुनिये । उन्होंने कहा  था , “ आप कहते हैं कि गाय के पेट में तैतीस करोड़ देवता निवास करते हैं पेट ज्यादा बड़ा न होने के कारण वहाँ उनकी बहुत ज्यादा भीड़ हो जाती होगी । स्थान के अभाव में वे गाय के सींग की नोंक से लेकर पूँछ के बालों के सिरों तक जोंक की तरह चिपक कर बैठे रहते होंगे । जब इसतरह भगवानों से ठसाठस भरी वह गोमाता किसी गो - भक्त किसान की खड़ी फसल चरने लगती है तब खेत की मेड़ पर रख किसान अपने हाथ में पकड़े डंडे से उस गाय की पीठ पर दो - चार डंडे जमा देता है । जब उसके पेट में स्थित सौ - डेढ़ सौ भगवानों को चित्त कर देता है । यह बात मैं नहीं कर रहा , सावरकर कहते हैं । वे आगे कहते हैं कि , इस देश में थोड़ी - बहुत गो - हत्या हुई । तो चल सकता है मगर बुद्धि - हत्या नहीं होनी चाहिए । यह प्रवृत्ति क्या मानव - विरोधी चरित्र को रेखांकित नहीं करती ?

वे समाजसुधारकों के प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहते हैं , ‘ मैं तो महाराष्ट्र के समाज सुधारकों की विरासत को आगे बढ़ाने का काम कर रहा हूँ । मुझमें और मेरे आंदोलन में यह क्षमता नहीं है कि हम उस समूची परम्परा को आगे बढ़ा सकें । महाराष्ट्र की इस सुदीर्घ परम्परा में लोकहितवादी , महात्मा फुले , सावित्रीबाई फुले , न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे , विठ्ठल रामजी शिंदे , गोपाल गणेश आगरकर , शाहू महाराज , तुकडोजी महाराज , गाडगे बाबा , डॉ . बाबासाहेब आंबेडकर , सावरकर , प्रबोधनकार ठाकरे आदि शामिल हैं । इनका भरपूर लिखित साहित्य भी उपलब्ध है । इन सब लोगों में से किसी ने भी मुस्लिम अंधश्रद्धाओं के बारे में एक भी शब्द कहा हो तो मुझे बताएँ । आखिर उन्होंने मुस्लिम अंधश्रद्धाओं पर क्यों कुछ नहीं कहा ? इराके दो कारण हो सकते हैं – पहला कारण है कि वे मुसलमानों से डरते थे , क्योंकि उस समय देश में तीस प्रतिशत मुसलमान थे । उस समय देश का विभाजन नहीं हुआ था । हम कह सकते हैं वे तो बड़े । निडर लोग थे , वे कसे इर सकते थे ? इसलिए दूसरा कारण ज़्यादा सही हो । । कि , उन्हें महसूस ही नहीं हुआ होगा कि मुसलमानों की अंधश्रद्धा दूर नहीं करने का क्या खतरा । हो सकता है ! मतलब उनकी प्रतिभा कमतर साबित हुई ? परंतु ये लोग तो महामानव थे । । हम इन्हें सलाम करते हैं । तो फिर उन्होंने ऐसा क्यों किया ? इसका कारण इसतरह समझा । जा सकता है कि एक बहुत बड़ी इमारत है । उसमें दस दालान हैं । एक – एक दालान में दस – दस करोड़ लोग हैं । तो इनमें से सात दालान हुए हिंदुओं के और तीन दालान हुए । बाकी धर्मियों के । सभी दालानों में घनघोर अंधेरा है । उन्होंने सोचा कि चलो , सात दालानों को हम प्रकाशित करते हैं । इससे उन सात दालानों में तो प्रकाश फैलेगा ही , या में प्रकाश की कुछ किरणे अन्य दालानों तक भी फैल जाएंगी । इससे शायद उन्हें भी महसस हो कि उन्हें भी प्रकाश की आवश्यकता है ।

मगर इसकी बजाय लोग तो कहते हैं कि हमारी ओर अंधेरा हैं इसलिए उनकी ओर भी प्रकाश नहीं होना चाहिए । इस बात का यही अर्थ निकलता है कि वे संबंधों को अंधेरे पर आधारित मानते हैं । हम भी अंधेरे में रहते हैं , तुम भी अंधेरे में रहो , यह मानसिकता समाज को आगे ले जाने वाली नहीं है । मतलबी है , स्वार्थी है । ‘ कल ही मुझसे किसी ने पूछा कि आप हिंदुओं की अंधश्रद्धा पर ही क्यों बात करते हैं ? मैंने उससे कहा – ” देखो , अगर अपना घर जल रहा है तो मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति होती है कि वह पहले अपना घर बचाएगा | ” उसने पूछा , ‘ ‘ क्या मतलब ? ‘ ‘ मैंने कहा , ‘ जैसे में हिंदू हैं . उसने फिर पूछा , ‘ ‘ आप हिंदू कैसे हैं ? ‘ ‘ मैंने कहा , ‘ ‘ जैसे आप हैं । आप हिंदू है क्योंकि आपने हिंदू माता – पिता के घर में जन्म लिया है । इसके अतिरिक्त हिंदू बनने में आपका क्या योगदान है ? आप हिंदू घर में जन्मे , पले – बढ़े और जन्म भए । आपने हिंदू धर्म नहीं बदला , वैसे ही मैंने भी नहीं बदला ; तो मैं हिंदू हैं या नहीं ? अव अगर । मेरा घर जल रहा है और इसे बचाने के लिए मैं बोल रहा हूँ तो उस पर आपत्ति क्यों ? आपको आपत्ति इसलिए है कि एक ओर लोगों को जागरूक करने वाले आंदोलन के बारे में लोगों के मन में संदेह उत्पन्न करने की आपकी इच्छा है , वहीं दूसरी ओर आप लोगों को यह बता रहे हैं कि देखो , अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति सिर्फ हिंदुओं की अंधश्रद्धाओं का निर्मूलन करेगी , तो उनकी अंधश्रद्धा समाप्त होगी , अंधश्रद्धामुक्त हिंदू कायर बन जाएंगे ।

जब वे मुसलमानों का अंधश्रद्धा निर्मूलन नहीं कर रहे हैं तो मुसलमान कट्टर बने रहेंगे । जब देश में हिंदू और मुसलमान आमने – सामने आएंगे तब हिंदुओं का क्या होगा ? इस सवाल के बरअक्स डॉ . नरेन्द्र दाभोलकर सवाल करते हैं , ‘ ‘ अरे ! आप दुनिया के इतिहास को देखेंगे या नहीं ? मनुष्य जाति किस आधार पर आगे बढ़ी है ? अंधश्रद्धाओं के बल पर आगे बढ़ी है क्या ? ” फिर से सावरकर का उदाहरण लें तो उन्होंने कहा था कि ‘ ‘ धर्माधता का इंक तोड़ने के लिए एकमात्र बल है – विज्ञान | ‘ ‘ इस बात को अगर ठीक से समझ लेंगे तो आपको समझ में आ जाएगा कि यह आरोप एक ओर । तो बहुत हास्यास्पद है तो दूसरी ओर अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के कामों के कारण पैदा हुआ डर भी इसकी जड़ में है ।

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