वह नदी जो मुझसे छीन ली गई
वह जंगल जहां से मुझे किया गया बेदखल .
वह जमीन जहां अभी भी निशान हैं
बैलों के खुरों के,
आसमान पर लटका वह चांद
जिसकी चांदनी से नहाती थी मेरी झोंपड़ी .
अब , वह मेरे देश में नहीं पड़ता
सरकारी रिकॉर्ड से काट दिए गए हमारे नाम .
अब अपने गांव को गांव कहना
नदी को नदी ,
पहाड़ को पहाड़ ,
जंगल को जंगल कहना
सरकारी नीतियों में आतंक है
सत्ता के शीर्ष पर बैठे ‘ साम्राज्यवादी एजेंट
तय करते हैं हमारी देश की नई सरहदें .
गढ़ते हैं धर्म की नई परिभाषा ।
‘ देश प्रेम ‘ मुहावरा है उनकी एय्याशी का .
मैं एक अदना – सा आदमी
भटकता हुआ अपने ही देश में
बार – बार भूलना चाहता हूं कि
मेरा घर .
कहीं दूर छूट गया हैं .
बड़े बांधों के लिए हमें डुबोया गया
खनिज पदार्थों की लूट के रास्ते तैयार किए गए सैन्य अभ्यास

परमाणु परीक्षण के लिए
हमें घरों से निकाला गया
बड़े पूंजीपतियों की एय्याशी के लिए
खदेड़े गए अपने खेतों से
हमारे साथी कहते हैं .
किसी एक शहर के मुख्यालय में कैद
पड़ा है मेरा देश
वहीं
नागरिकों की परिभाषाएं
धर्म – अधर्म की श्रेणियां
और दुश्मनों के नाम तय होते हैं .

उन्हें देश की सुरक्षा के नाम पर
यह सामग्री खरीदने के दलाल चाहिए
टेंक चाहिए .
लडाकू विमान चाहिए
सत्ता की रक्षा के नाम पर
धर्म और संस्कृति के रक्षक
लम्पटों की जमात
गोरक्षक
लुटेरे चाहिए .
उन्हें हमारी जमीन चाहिए
नदियां , पहाड़ , खेत – खलिहान
बच्चों के स्कूल
हमारी बेदखली चाहिए .
वह हमसे हमारी सारी चीजें छीनकर भी
हरे – सहमे रहते
पुलिस उनकी
सैनिक उनके ,
न्यायालय उनके
‘ सलवा जुडूम ‘ , ‘ ग्रीन हंट ‘ उनका

मल्टीनेशनल्स ’ उनके ‘
साम्राज्यवादी आका ‘ उनका
लम्पटला उनकी
लूट उनकी
हमारे पास तो अपने ही देश से बेदखली का दंश है.
अपनी ही जमीन से बिछुड़ने का गम है , आशाऐं है
संघषों की यादें हैं
उम्मीद है .
फिर भी
देश का प्रधान हमसे ही क्यूं डरता है ?

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हंस के जून 2019 के अंक में प्रकाशित कविता . चित्र . उत्तम कुमार