संपादक , दक्षिण कोसल

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मिथक के अनुसार एक सीधा और भोला आदिवासी युवक को देखकर गांव के सियान उसे शिवनाथ कहने लगे। गांव के इस युवक पर गांव के एक किसान की दृष्टि पड़ी। किसान की पारू नाम की एक सुन्दर कन्या थी। किसान के मन में इच्छा हुई कि वह शिवनाथ को घर जंवाई बनाकर अपने घर रख ले।

आदिवासी संस्कृति के रीति-रिवाज के अनुसार वर-पक्ष को कन्या पक्ष वालों को एक निश्चित धन-राशि, मुर्गा, वस्त्र, अनाज आदि वस्तुएं देना आवश्यक होता है, किन्तु शिवनाथ अत्यधिक ग़रीब होने के कारण इन वस्तुओं को देने में असमर्थ था। ऐसी स्थिति में एक विकल्प था कि यदि युवक लमसेना बनकर किसान के घर रहकर उसकी सेवा करे और उसके कार्यों में हाथ बंटाये और वह अपनी ये सेवायें तीन साल तक निरन्तर देता रहे तो भावी ससुर के सन्तुष्ट एवं प्रसन्न होने पर कन्या का विवाह उसके साथ हो सकता है। अतः शिवनाथ, किसान को अपनी सेवाएं देने लगा और एवज में उसे खाना-पीना, रहने के लिए स्थान और कुछ धनराशि मिलने लगी। शिवनाथ ने अपनी ईमानदारी एवं श्रमशीलता से किसान का हृदय जीत लिया।

पारू भी शिवनाथ के भोजन आदि कि व्यवस्था अपनी पूर्ण निष्ठा के साथ किया करती थी और उसकी साधन-सुविधाओं को भी हर तरह से ध्यान रखा करती थी। पारू का आकर्षण शिवनाथ के प्रति दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था और शिवनाथ के हृदय में पारू के लिए भी उदात्त प्रेम का स्थान बन गया था। इस बीच ज़मीदार के बेटे की दृष्टि पारू पर पड़ी और वह उसके रूप सौन्दर्य पर मुग्ध हो गया और पारू के भाईयों के सामने उससे विवाह करने की अपनी इच्छा व्यक्त की, किन्तु शिवनाथ के होते हुए ऐसा नहीं सो सकता था।

अतः जमींदार के पुत्र ने पारू के भाईयों को अनेक सब्ज-बाग दिखाये और तरह-तरह की सुख-सुविधायें व मान-सम्मान देने की भी बात कही। अतः पारू के तीनों भाई लालच में आकर शिवनाथ के विरुद्ध षड़यंत्र रचने की बात सोचने लगे। एक दिन की बात है कि पूरे गांव में सूचना फैल गई कि मेड़ के फूट जाने से सारा पानी खेतों में भरकर फसल को नुकसान पहुँचा रहा है और मेड़ को जल्दी से जल्दी ठीक करना आवश्यक है। शिवनाथ जैसे ही घर काम से लौटा तो उसे मेड़ फूटने की घटना का पता चला और वह तुरन्त मेड़ बांधने के लिए उल्टे पैरों चल पड़ा। पारू ने बहुत आग्रह किया कि वह भोजन करने के बाद मेंड़ बांधने जाये, किन्तु शिवनाथ तो अपने काम की धुन का पक्का था और उसने पारू से कहा कि पहले वह मेड़ बांध कर आ जाये, फिर भोजन बाद में कर लेगा, इस तरह से शिवनाथ मेड़ बनाने के लिए चल पड़ा। कुछ देर बाद पारू के तीनों भाऊ भी लाठियां लेकर वहां पहुंच गये।

उसने सोचा कि शायद ये लोग भी मेड़ बनाने में सहायता के लिए पहुंचे हैं, किन्तु हुआ यह कि उसके ऊपर लाठी पर लाठी बरसने लगी और शिवनाथ ने वहीं अपना दम तोड़ दिया। रात व्यतीत हो गई, किन्तु शिवनाथ घर नही लौटा। पारू ने उसकी प्रतीक्षा करते हुए कोरी आंखों सारी रात निकाली, पर शिवनाथ तो अब इस दुनिया में ही नदी था तो फिर वह लौटता भी कैसे? पारू उसे खोजते हुए मेड़ के पास पहुँची और ‘शिवनाथ-शिवनाथ’ उसे पुकारने लगी, किन्तु उसकी पुकार शून्य में गुंज कर रह जाती। पारू उसे इधर-उधर खोजने लगी। सहसा उसकी दृष्टि शिवनाथ की एक अंगुली पर पड़ी। शिवनाथ का शव एक गड्ढे में गड़ा हुआ था और बाहर केवल वह अंगुली ही निकली हुई थी। पारू ने गड्ढे सारी मिट्टी हटा डाली। उसने गड्ढे मे शिवनाथ की लाश को पड़े हुए पाया। पारू भी पछाड़ खाकर गड्ढे में गिर गई। वह शिवनाथ के बिना नहीं जी सकती थी। अतः दुख में उसके प्राण-पखेरू भी उड़ गये और वह शिवनाथ की लाश के ऊपर जा पड़ी। अब इस दुनिया में न तो शिवनाथ था और न पारू ही थी। यदि जीवित थी तो बस उनके उदार और वासनारहित प्रेम की कहानी ही जीवित थी।

कहते हैं तभी से यह प्रेम धारा निरंतर जलधारा के रूप में सदानीरा बनकर प्रवाहित हो रही है और आदिवासी संस्कृति के उज्ज्वल पक्ष को उद्घाटित करती है। महानदी, शिवनाथ से जल ग्रहण कर उड़ीसा के उस बांध तक पहुंचा देती है, जिस बांध का लाभ छत्तीसगढ़ को तो नहीं, बल्कि उड़ीसा प्रान्त को मिलता है।

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