13 फरवरी 2019 का आदेश आदिवासियों के हित में नहीं : आदिवासी अपने अधिकारों के लिए एकजुट हों

भारत या अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत आने वाली उत्पीडित व शोषित तबकों की आबादी 12 . 5 करोड़ से ज्यादा है । भारत में अंग्रेजी उपनिवेशियों ने जल , जंगल जमीन पर आदिवासी जनता परम्परागत अधिकार से बेदखल कर आदिवासी इलाकों को सामंती / जमीन्दारी प्रथा या बागानों के अधीन लिए संगठित और व्यवस्थित ढंग से घुसपैठ करना शुरू किया । मूलनिवासियों के विश्वव्यापी आन्दोलन के चलते संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा “ मूलनिवासी जनता के लिए विशेष प्रावधान करते हुए , 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया ।

किन्तु भारतीय राजसत्ता ने आदिवासियों के पक्ष में आदिवासी भूमि संरक्षण कानून 1970 , वन अधिकार जैसे सांकेतिक कानून ही बनाये हैं । आदिवासियों के विशाल बहुमत को जमीन , आवास , शिक्षा और रोजगार से वंचित रखा गया है । नौकरशाहों , वन विभाग के अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत से बेनामी हस्तांतरण , फर्जी करारनामे , इत्यादि के जरिए आदिवासियों को उनकी जमीन से बड़े पैमाने पर अलग किया जा रहा है , उनका हल – बैल – जमीन छीना जा रहा है । केन्द्र की मोदी सरकार , अंग्रेजों के जमाने के जन – विरोधी वन अधिकार कानून , 1927 को लागू करने पर तुली हुई है । 13 फरवरी 2019 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार की निष्क्रियता के चलते यह आदेश जारी किया था कि , वन अधिकार कानून के तहत् जिन दावेदारों का दावा खारिज किया जा चुका है उनको अगली सुनवाई से पहले वन क्षेत्रों से बेदखल किया जाये ।

हालांकि 28 फरवरी 2019 को इस पर रोक लगा दी गई है । इस मामले पर अगली सुनवाई 24 जुलाई 2019 होगी । इसलिए तमाम आदिवासी जनता को अपनी जमीन की रक्षा के लिए एकजूट होने की जरुरत है । भाजपा सरकार के आदिवासी विरोधी नीतियों के चलते आदिवासियों का शोषण और उत्पीड़न कई गुना बढ़ गया है । भारत सरकार ने 30 नवंबर 2017 तक जो आंकड़े पेश किये हैं , उसके अनुसार छत्तीसगढ़ के वनों में रहने वाले 8 , 52 , 530 व्यक्तियों के दावे सरकार के समक्ष आये थे । सरकार ने इसमें से 3 , 86 , 206 दावों को योग्य माना और उन्हें अधिकार पत्र सौंपा , अर्थात केवल 45 . 30 प्रतिशत दावों को ही मान्य किया । इसी प्रकार सामुदायिक अधिकार दावों की संख्या 47 , 548 थी , जिनमें से केवल 14 , 161 अर्थात 51 . 40 प्रतिशत को सामुदायिक अधिकार दिया जबकि 48 . 60 प्रतिशत आवेदनों को खारिज कर दिया । अर्थात , छत्तीसगढ़ में 55 प्रतिशत वन अधिकार के दावों को खारिज कर दिया गया है । छत्तीसगढ़ में लगभग 11 हजार गांव ऐसे हैं जो वनों से 5 कि . मी . की परिधि में बसे हुए हैं तथा 9 हजार गांव ऐसे हैं जो वनों के अंदर बसे हैं । इन लोगों की आजीविका व निस्तार पूर्णतः वनों पर आश्रित है ।

आज भी अपने वन अधिकारों से लाखों आदिवासी वंचित हैं , जो दावा जमा नहीं कर पाये हैं या फिर उनके दावों को बिना कोई पूर्व सूचना दिये निरस्त कर दिया गया है ।

इसी परिप्रेक्ष्य में 19 जुलाई 2019 दिन शुक्रवार को दुर्गा चौक मैनपुर में सुबह 11 . बजे से आदिवासी भारत महासभा द्वारा निम्नलिखित मांगों को लेकर आयोजित एकदिवसीय धरना सभा को व्यापक रुप से सफल बनावें ।

हमारी मांगे

1 . सुप्रीम कोर्ट में प्रदेश सरकार आदिवासियों के वन अधिकारों की आवश्यकता के संबंध में अपना पक्ष मजबूती से रखे ताकि आदिवासियों को बेदखली से बचाया जा सके । आदिवासियों को जमीन और जंगल पर उनके अधिकारों से बेदखल करने में सहायक सभी निरंकुश कानूनों को खारिज किया जाए ।

2 . छत्तीसगढ़ में 55 प्रतिशत वन अधिकार के खारिज दावों की जांच कर आदिवासियों को अधिकार मान्यता प्रमाण पत्र दिया जाए । वन अधिकार मान्यता कानून 2006 और कम्पेन्सेण्टरी फॉरेस्ट एक्ट लागू किया जाए ।

3 . सभी गैर – कानूनी खदानों पर तत्काल रोक लगाया जाए । बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व कारपोरेट घरानों की परियोजनाओं के लिए आदिवासियों के विस्थापन पर तत्काल रोक लगाया

4 . आदिवासियों के निवास स्थलों , संस्कृति और भाषा की रक्षा की जाए । सबके लिए शिक्षा , स्वास्थ्य , आवास और रोजगार सुनिश्चित किया जाए ।

5 . आदिवासी बहुल इलाकों में ग्राम सभा , पेसा कानून , संविधान की पांचवीं व छठवीं अनुसूचि लागू किया जाए ।

6 . अभ्यारण्य , रिजर्व फॉरेस्ट एवं टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों का विस्थापन करना बंद किया जाए ।

7 . सलफ जलाशय का अधूरा निर्माण पूरा किया जाए । फरसरा बांध के लिए विस्थापन पर रोक लगाया जाए ।


आदिवासी भारत महासभा ( ABM ) छत्तीसगढ़ राज्य कमेटी .