पापा की खिंची भीष्म साहनी की कुछ पुरानी तस्वीरें। आज 11 जुलाई भीष्म साहनी जी का स्मृति दिवस है।प्रोम्थियस प्रताप सिंंह

26 मई 1982 में प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में भीष्म साहनी बिलासपुर आए थे, आयोजित कार्यक्रम का नाम था ‘महत्व भीष्म साहनी’। साहित्यकार के रूप में 1934 से अपनी यात्रा शुरू कर चुके थे, उसके बाद लेखन का काम लगातार चलता रहा। उनका व्यक्तित्व निरंतर विराट होता चला गया। राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित होते गए। एक रचनाकार रचना कर्म से जुड़े लोगों की विषय-वस्तु बन चुके थे। इस बात को बिलासपुर में महसूसा गया और ‘महत्व भीष्म साहनी’ के बहाने एक समकालीन महान साहित्यकार पड़ताल करने की कोशिश पहली बार की गई। राजेश्वर सक्सेना और उनकी टीम ने इस कार्य को पूरी गम्भीरता से अंजाम दिया और आयोजन के समय “भीष्म साहनी- व्यक्ति और रचना” का प्रकाशन सम्भव हो सका। वह ग्रन्थ अपने नाम के अनुरूप एक साहित्यकार की विराटता, विविढ़ता को समेटने वाला तथा आम से खास पाठकों को भीष्म का दिग्दर्शन कराने वाला सिद्ध हुआ। डॉ. राजेश्वर सक्सेना और प्रताप ठाकुर(पापा) के संपादकत्व में प्रकाशित ग्रन्थ का विमोचन स्वयं भीष्म साहनी द्वारा किया।

किताब के आरंभ में पापा ने ‘शुरुआत’ नाम से जो एक लंबा लेख लिखा है उसके कुछ महत्वपूर्ण अंश इस प्रकार हैं।

‘भीष्म साहनी के कथा संसार में भारतीय जनता की आज़ादी के यथार्थवादी तर्क का निर्माण हुआ है। उनके कथा सन्दर्भों में सामन्तवाद और पूंजीवाद के अंतर्विरोध, वर्ण और वर्ग के अंतर्विरोध, मध्यवर्ग के अंतर्विरोध तथा पुनरुत्थानवाद और आधुनिकतावाद के अंतर्विरोध क्रमशः खुलते जाते हैं। आधुनिक भारत के नगरों और महानगरों में रहने वाला मध्यवर्ग उनकी कथा के केंद्र में है। भारत की पूंजीवादी व्यवस्था में औद्योगिक दबावों का जनता के जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ा है? भारतीय पूंजी की आकांक्षाओं में पलने वाली उपभोक्ता संस्कृति तथा उसके विरुध्द भारतीय जनता के श्रम से उत्पन्न होने वाली लोकतंत्रीय जनवाद की संस्कृति का संघर्ष भीष्म की रचनाओं में अंतःस्त्रोत की तरह प्रवहमान है।

यहीं पर भीष्म की रचना-प्रतिबध्दता स्पष्ट होती है। वर्णवादी, जातीय और साम्प्रदायिक दृष्टि के मूल कहां हैं? समन्वयवादी संस्कृति के इस महादेश में धर्म के नाम पर सामूहिक हत्याओं का मूल कारण कहां है? कृषि और औद्योगिक सम्बन्धों के बदलने में जनता के श्रम को यदि धर्म-निरपेक्ष आधार नहीं मिला, तो श्रमिक का नज़रिया वैज्ञानिक न होकर जातीय और धार्मिक परम्पराओं वाला ही बना रहेगा। भीष्म जी ने अपनी कथा में साम्प्रदायिकता के भौतिक परिवेश को विश्लेषित किया है। वे यह बतलाने में चूक नहीं करते कि पूंजी का संस्कार साम्प्रदायिक, गैर प्रजातांत्रिक और प्रतिबद्धता विरोधी होता है जिसकी परिणति, अराजकता, अपराध और अंत में फ़ासिस्ट व्यवहार में होती है। अतः धर्म-निरपेक्ष होने का अर्थ है अपने भौतिक परिवेश के प्रति बौद्धिक होना तथा सामाजिक-आर्थिक सहकार में कर्म की चेतना ग्रहण करना।’

-“भीष्म साहनी- व्यक्ति और रचना”,
शुरुआत-प्रताप ठाकुर, 1982

तस्वीरों का विवरण- प्रगतिशील लेखक संघ सम्मेलन जबलपुर(म.प्र) 1980, जयपुर (राजस्थान) 1981, बिलासपुर(म.प्र) 1982.