हम तो अपनी सांसों की वकालत करेंगे….पूरी दुनिया में ही जंगलों की जान को खतरा है…

कबीर संजय ,जंगल कथा से …


पूरी दुनिया में ही जंगलों की जान को खतरा है। कहीं पर रेल की पटरियों के लिए, कहीं पर बुलेट ट्रेन के लिए, कहीं पर एक्सप्रेस वे के लिए, कहीं पर खेती के लिए, कहीं पर बांध के लिए, कहीं पर कोयला-लोहा जैसे खनन के लिए, कहीं पर शहर बसाने के लिए, कहीं पर किसी अन्य कमर्शियल एक्टिविटी के लिए उन्हें काटा जा रहा है। हैरत तो यह है कि कहा जाता है कि जंगल साफ किया जा रहा है। क्या जंगल धरती पर पड़ा हुआ कूड़ा-कचरा है, जिसे साफ करने की जरूरत है। आज से चार सौ सालों पहले कोई फोटो सिंथेसिस यानी प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के बारे में नहीं जानता था। लोगों को यह नहीं पता था कि पेड़-पौधे ही वह कीमती ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जिस पर हम जिंदा हैं। लेकिन, लोगों को प्रकृति के साथ जीवन जीने का शऊर था। वे अपने हर कदम में पेड़-पौधों की हिफाजत करने का प्रयास करते थे। वे जंगलों और प्रकृति को प्यार करते थे। जंगलों को हटाकर उनकी जगह पर खेती और इंसानी बस्तियों को बसाने का मलाल आप विभूति भूषण बंधोपाध्याय की किताब आरण्यक में देख सकते हैं।


पेड़ हमकों सांस देते हैं। आज यह हमारे सामान्य ज्ञान का हिस्सा है। फिर हम क्यों न अपनी सांसों की हिफाजत करें। हम क्यों न उन पेड़ पौधों को बचाने का प्रयास करें, जो हमें जीवन देते हैं। जंगल हर कहीं काटे जा रहे हैं, वे छत्तीसगढ़ के जंगलों में भी काटे जा रहे हैं, वे ब्राजील के एमेजॉन के जंगलों में भी काटे जा रहे हैं, वे इंडोनेशिया में भी काटे जा रहे हैं। हर जगह कमर्शियल एक्टिविटी सदियों से चली आ रही नेचुरल एक्टिविटी पर भारी पड़ रही है।


इन जंगलों को धरती पर पड़े कूड़े-कचरे की तरह साफ कर देने से किसी कंपनी का फायदा होगा। किसी पूंजीपति की तिजोरी और ज्यादा भर जाएगी। इससे वह लंदन में बंगला खरीदेगा और स्विस बैंक के खातों में और मोटी रकम जमा करेगा।


जाहिर है कि कारपोरेट अपने हितों की वकालत करेगा। लेकिन, हम क्यों कारपोरेट की वकालत करेंगे। हम क्यों उनके मुनाफे की हिफाजत करेंगे। हम तो अपनी सांसों की वकालत करेंगे। हम तो अपनी सांसों की हिफाजत करेंगे। छत्तीसगढ़ हो, महाराष्ट्र हो या फिर एमेजॉन या इंडोनेशिया, कहीं भी पेड़ों के काटे जाने से हमारा विरोध है।


कुछ मित्रों को लगता है कि यह प्रोपेगंडा है। नहीं यह प्रोपेगंडा नहीं है। यह हमारा कंसर्न है। सरोकार है। जीवन को बचाने का एक प्रयास है। बात भाजपा-कांग्रेस, सपा-बसपा, सीपीआई-सीपीएम, डीएमके-एडीएमके से बहुत आगे निकल चुकी है। राजनीतिक पार्टियों के लिए तर्क गढ़ने की बजाय अपने और पृथ्वी के जीवन के लिए तर्क गढ़ो।


अपनी हिफाजत करो। क्योंकि, यह करने कोई और नहीं आएगा। यह हमें ही मिलकर करना होगा। यह प्रोपेगंडा नहीं, प्रकृति, पर्यावरण और पृथ्वी को बचाने की मुहिम है।

और अंत में एक भूलसुधारः


दो दिन पहले जंगलों पर हो रहे हमलों पर लिखी एक पोस्ट में जल्दबाजी वश यह लाइन लिखी गई कि सरकार ने एक लाख 70 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हसदेव अरण्य में खनन को मंजूरी दी है। जबकि, सही लाइन यह है कि सरकार ने एक लाख 70 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हसदेव अरण्य के पारसा ब्लाक में खनन को मंजूरी दी है। इसमें आठ सौ हेक्टेयर के लगभग जमीन आती है। कुछ मित्रों द्वारा ध्यान दिलाए जाने के बाद तुरंत ही इसे ठीक कर लिया गया है। हालांकि, कुछ लोग इसी लाइन को लेकर ट्रोल करने का प्रयास कर रहे हैं। उन मित्रों से भी हाथ जोड़कर गुजारिश है कि किसी कारपोरेट या राजनीतिक पार्टी की वकालत मत करो, अपनी सांसों और अपने जीवन की वकालत करो। यह वह लड़ाई है जिसमें कोई नहीं बचने वाला।


(तस्वीर इंटरनेट से साभार ली गई है और हसदेव अरण्य की ही है।)

junglekatha #जंगलकथा

  • Kabir Sanjay जी की वॉल से साभार।

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