गहरे वैचारिक संघर्ष के मूड़ में राहुल गांधी .

जगदीश्वर चतुर्वेदी

 राहुल गांधी वह नहीं है जो मीडिया बना रहा है या बता रहा है। किसी भी राजनेता के बयान और राजनीतिक आचरण के बारे में बयान और एक्शन में साम्य करके देखा जाना चाहिए।खासकर कांग्रेस के बारे में नए रूप में सोचने की जरूरत है। कांग्रेस सत्तामोह के पैराडाइम से निकल चुकी है। उसे सत्तामोह के बाहर जनसंघर्षों के नए पैराडाइम की तलाश है और उसके अनुरूप सांगठनिक संरचनाओं की जरूरत है। राहुल गांधी ने अपने राजनैतिक कैरियर में सबसे मुश्किल जिम्मेदारियों को उठाया है।एक ऐसे संगठन को जिंदा करने का काम किया है जिसकी जमीनी संघर्षों में शामिल होने की कल्पना नहीं की जाती थी। विगत पांच सालों में कांग्रेस ने लगातार जनसंघर्षों को समर्थन दिया है।

 भाजपा-आरएसएस के विशालकाय संगठन और उसके पीछे सक्रिय कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विशाल समर्थन के खिलाफ कांग्रेस को राष्ट्रीय आवाज बनाने की कोशिश की है। मैं निजी तौर पर कांग्रेस की नीतियों का आलोचक रहा हूँ,लेकिन भारत में उदारवादी राजनीति और उदार सामाजिक परिवेश की रक्षा के लिए कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर पर शक्तिशाली पार्टी के रूप में सक्रिय रहना बेहद जरूरी है। यह भारतीय राजनीति का सामान्य और रूटिन दौर नहीं है। इस समय पूरे देश में दक्षिणपंथी राजनीति की आंधी चल रही है, भाजपा-आरएसएस की विचारधारा को सघन प्रचार अभियान के जरिए साधारण आदमी के जेहन में कॉमनसेंस के रूप में बिठा दिया गया है। 

आज भारत में हरेक स्तर पर सामान्य आदमी यह मानकर बैठा है कि मोदी सही कर रहे हैं, उनके अलावा कोई इस देश की नैय्या पार नहीं लगा सकता। इस वैचारिक माहौल की आड़ में आरएसएस ने भारत के सभी संवैधानिक संस्थानों को बधिया करके रख दिया है,आज वैचारिक तौर पर संवैधानिक संस्थान अपनी भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं,अर्थव्यवस्था एकदम चरमरा गई है, लेकिन आम आदमी के मन में नरेन्द्र मोदी और  संघ की विचारधारा सही है, यह विचार जड़ें जमा चुका है। तकरीबन समूचा विपक्ष इसबार के चुनाव में बुरी तरह हार गया और वे अभी भी अपने असली शत्रु और असली मुद्दों को देखने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसी अवस्था में कांग्रेस पार्टी अपने अकेले दम पर राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरकर सामने आई है,इसके पचास से अधिक सांसद जीतकर आए हैं। 

    राहुल गांधी के बयान में स्थिति की भयावहता और उससे लड़ने की छटपटाहट साफ नजर आ रही है। राहुल गांधी ने अपने त्यागपत्र के रूप में लिखी चिट्ठी जिस स्थिति का उल्लेख किया है उसे बार-बार पढ़ने की जरूरत है। राहुल ने लिखा है,‘पूरी तरह से स्वतंत्र और साफ़-सुथरे चुनाव के लिए देश की संस्थाओं का निष्पक्ष रहना अनिवार्य है. कोई भी चुनाव स्वतंत्र प्रेस, स्वतंत्र न्यायपालिका और एक पारदर्शी चुनाव आयोग जो कि निष्पक्ष हो के बग़ैर सही नहीं हो सकता. तब भी कोई चुनाव स्वतंत्र नहीं हो सकता है जब तक सभी वित्तीय संसाधनों पर एक ही पार्टी का क़ब्ज़ा हो.

हमने 2019 के चुनाव में एक राजनीतिक पार्टी का सामना नहीं किया बल्कि, हमने भारत सरकार की पूरी मशीनरी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी, हर संस्था को विपक्ष के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया गया था. ये बात अब बिल्कुल साफ़ है कि भारत की संस्थाओं की जिस निष्पक्षता की हम अब तक सराहना करते रहे थे, वो निष्पक्षता अब नहीं रही।’ इस पत्र में साफ रेखांकित किया गया है कि शासकदल ने भारत सरकार के समस्त संसाधनों का विपक्ष को परास्त करने के लिए खुलकर दुरूपयोग किया है।

चुनाव आयोग को रबड़ स्टैंप बना दिया गया । साथ ही यह भी लिखा है ,‘ देश की सभी संस्थाओं पर क़ब्ज़ा करने का आरएसएस का उद्देश्य अब पूरा हो गया है. हमारा लोकतंत्र अब मौलिक तौर पर कमज़ोर कर दिया गया है. सबसे बड़ा ख़तरा ये है कि अब से चुनाव जो कि भारत का भविष्य निर्धारित करते थे अब वो केवल एक रस्म-अदायगी भर रह जाएंगे. सत्ता पर क़ाबिज़ होने के परिणाम स्वरूप भारत को अकल्पनीय हिंसा और पीड़ा सहना होगा. किसानों, बेरोज़गार, नौजवानों, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों को सबसे ज़्यादा नुक़सान सहना होगा.हमारे देश की अर्थव्यवस्था और साख पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा.


प्रधानमंत्री की इस जीत का मतलब ये नहीं है कि वो भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त हो गए हैं. कोई कितना भी पैसा ख़र्च कर ले या कितना ही प्रौपेगैंडा कर ले, सच्चाई की रोशनी को छिपाया नहीं जा सकता है. भारत की संस्थाओं को दोबारा हासिल करने और उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए पूरे भारत को एक होना होगा और कांग्रेस पार्टी ही इन संस्थाओं को दोबारा खड़ा करेगी.’


‘इस अहम काम को करने के लिए, कांग्रेस पार्टी को ख़ुद में आमूलचूल बदलाव लाना होगा. आज बीजेपी भारत के लोगों की आवाज़ को सुनियोजित तरीक़े से कुचल रही है. इन आवाज़ों की रक्षा करना कांग्रेस पार्टी का कर्तव्य है.’
भारत में लोगों की आदत रही है कि शक्तिशाली लोग सत्ता से चिपके रहते हैं, कोई भी सत्ता को त्यागना नहीं चाहता. लेकिन सत्ता के अपने मोह को छोड़े बिना और एक गहरी विचारधारा की लड़ाई लड़े बिना हम अपने विरोधियों को नहीं हरा सकते।’


इस पत्र की अंतिम दो पंक्तियां बेहद महत्वपूर्ण हैं और ये पंक्तियां कांग्रेस के बदलते स्वरूप का संकेत भी हैं। पढें- ‘सत्ता के अपने मोह को छोड़े बिना और एक गहरी विचारधारा की लड़ाई लड़े बिना हम अपने विरोधियों को नहीं हरा सकते।’ यानी कांग्रेस अब नए रूप में आने की तैयारी में है। कांग्रेस खत्म नहीं होने जा रही,राहुल गांधी वनवास पर नहीं जा रहे,बल्कि नई तैयारियों के साथ कांग्रेस को लाने की तैयारियां हो रही हैं,हम सब लोकतंत्र प्रेमी लोग कांग्रेस के नए रूप के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

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