क्या पोलोस्की को गांधी जी की हत्या का पूर्वानुमान हो गया था ?

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क्या आपके ध्यान में गांधीजी की शहादत की कोई तस्वीर है?

आशुतोष कुमार की फेसबुक से.

ईसा मसीह का नाम आते ही सलीब पर टंगी हुई छवि याद आती है. इस छवि ने ईसा के करुणा-संदेश को दुनिया भर में फैलाने में ईसाई मिशनरियों से ज़्यादा बड़ी भूमिका निभाई है .

भगत सिंह की फांसी की कोई छवि तो नहीं है, लेकिन उनके नाम के साथ शहीदे आज़म इस तरह जुड़ा हुआ है कि वो ख़ुद शहादत की एक शबीह जान पड़ता है. इस नाम के साथ आज़ादी, इंसाफ़ और इंसानी मुहब्बत के लिए सर्वोच्च बलिदान का संदेश जुड़ा हुआ है . अपनी याद दिलाता है .

लेकिन गांधीजी ?
नंदलाल बासु के दांडी मार्च करते गांधीजी याद आते हैं . या फिर उनकी लाठी खींचता वो शरारती बच्चा. नेहरू पटेल के साथ उनकी ऐतिहासिक तस्वीरें. एक जिन्ना के साथ की भी. उनके पार्थिव शरीर और असाधारण अंतिम यात्रा की तस्वीरें भी याद आती हैं. लेकिन ठीक शहादत के वक़्त की तस्वीरें इतनी कम और धुंधली क्यों हैं ?

क्या जाने अनजाने गांधीजी के बारे में हमारी राष्ट्रीय स्मृतियों को एक खास तरह से क्यूरेट किया गया है? कि हमें उनका जीवन तो याद आए, लेकिन शहादत कम से कम?

क्या यह गांधीजी की शहादत के साथ जुड़े संदेश को धुंधला करने के लिए किया गया है ? क्योंकि अपने आप तो कुछ भी नहीं होता!

गांधीजी के कथित अंतिम शब्दों -हे राम- को तो खूब प्रचारित किया गया है, लेकिन उस अमानवीय हिंसा को बहुत कुछ कालीन के नीचे दबाया गया है, जिसका शिकार गांधीजी को सिर्फ़ इसलिए बनना पड़ा कि वे उस हिन्दुस्तानी तहजीब की नुमाइंदगी करते थे , जिसमें ईश्वर और अल्ला कभी अलग नहीं किए जा सकते थे!

राष्ट्रपति भवन में पोलिश ब्रिटिश चित्रकार फेलिक्स पोलोस्की की बनाई एक शबीह मौजूद है, जिसमें गांधी जी की हत्या का क्षण अंकित है . यह एक पुनर्निर्मित पेंटिंग है. इसकी मूल तस्वीर पोलोस्की ने सन 1946 में बनाई थी.

राष्ट्रपति भवन.में.लगी पेंटिंग

क्या पोलोस्की को गांधीजी की हत्या का पूर्वानुमान हो गया था? द वीक के अभी आए उम्दा गांधी अंक में इस पेंटिंग की एक दिलचस्प कहानी दी गयी है .

मुझे हैरत यह है कि इतनी खूबसूरत और ‘रहस्यमय’ होने के बावज़ूद पोलोस्की की यह तस्वीर बहु-प्रचारित और लोकप्रिय क्यों नहीं हुई? इसे अवाम की नज़रों से कुछ छुपा कर क्यों रखा गया है?

यहाँ पहली तस्वीर पोलोस्की की सन १९४६ में बनाई पहली तस्वीर है और दूसरी उसकी पुनर्निर्मित राष्ट्रपति-भवन-शोभित तस्वीर.

यहाँ मौजूद एक और तस्वीर किसकी रचना है, बताने की जरूरत नहीं.

क्या हमारे समय के चित्रकार और मूर्तिकार गांधीजी की शहादत में छुपे असाधारण संदेश को जनप्रचलित करने लायक कोई छवि गढ़ने की चुनौती स्वीकार करेंगे ?

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