मंटो ने ताउम्र मजहबी कट्टरता के खिलाफ लिखा, मजहबी दंगे की वीभत्सता को अपनी कहानियों में यूं पेश किया कि आप सन्न रह जाए. उनके लिए मजहब से ज्यादा कीमत इंसानियत की थी.मंटो ने लिखा, ‘मत कहिए कि हज़ारों हिंदू मारे गए या फिर हज़ारों मुसलमान मारे गए. सिर्फ ये कहिए कि हज़ारों इंसान मारे गए और ये भी इतनी बड़ी त्रासदी नहीं है कि हज़ारों लोग मारे गए. सबसे बड़ी त्रासदी तो ये है कि हज़ारों लोग बेवजह मारे गए.

हज़ार हिंदुओं को मारकर मुसलमान समझते हैं कि हिंदू धर्म ख़त्म हो गया लेकिन ये अभी भी ज़िंदा है और आगे भी रहेगा. उसी तरह हज़ार मुसलमानों को मारकर हिंदू इस बात का जश्न मनाते हैं कि इस्लाम ख़त्म हो चुका. लेकिन सच्चाई आपके सामने है. सिर्फ मूर्ख ही ये सोच सकते हैं कि मजहब को बंदूक से मार गिराया जा सकता है.’

बिल्कुल अपनी कहानियों की औरतों की तरह ही मंटो को भी किसी खांचे में फिट करना एक बेहद मुश्किल काम है. उस वक्त कृश्न चंदर, राजिन्दर सिंह बेदी, अहमद नदीम क़ासमी, इस्मत चुग़ताई और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे लेखकों के होते हुए भी मंटो तो अकेला ही था.

बंटवारे का दर्द हमेशा उन्हें सालता रहा. 1948 में पाकिस्तान जाने के बाद वो वहां सिर्फ सात साल ही जी सके और 1912 में भारत के पूर्वी पंजाब के समराला में पैदा हुए मंटो 1955 में पाकिस्तान के पश्चिमी पंजाब के लाहौर में दफन हो गए.

कैसी विडंबना है कि मंटो के जाने के इतने सालों बाद ज़िंदगी भर कोर्ट के चक्कर लगाने वाला, मुफलिसी में जीने वाला, समाज की नफरत झेलने वाला मंटो आज खूब चर्चा में है. उन पर फिल्में बन रही हैं. उनके लेखों को खंगाला जा रहा है. अभी कुछ सालों पहले ही मंटो के लेखों का एक संग्रह ‘व्हाई आई राइट’ नाम से अंग्रेजी में अनुवाद कर निकाला गया है.

लेकिन मंटो अपनी किताब गंजे फरिश्ते  में लिखते हैं कि मैं ऐसे समाज पर हज़ार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल हो कि मरने के बाद हर शख्स के किरदार को लॉन्ड्री में भेज दिया जाए जहां से वो धुल-धुलाकर आए.

अनुज श्रीवास्तव ने मुबंई में.मसाला चाय की श्रंखला प्रारंभ की थी जिसमें वे देश के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार ,कवि और लेखकों की कहानी, कविता का पाठ करते है.यह श्रंखला बहुत लोकप्रिय हुई ,करीब 50,60 एपीसोड. जारी किये गये. सीजीबास्केट और यूट्यूब चैनल पर क्रमशः जारी करने की योजना हैं. हमें भरोसा है कि अनुज की लयबद्धत आवाज़ में आपको अपने प्रिय लेखकों की कहानी कविताएं जरूर पसंद आयेंगी.

मसाला चाय के इस अंक में सुनिए.. टोबा टेकसिंह …