संशोधन ग्राम सभाओं के सामुदायिक वन अधिकारों के खिलाफ ग्राम वनों का इस्तेमाल करते हुए सारी शक्ति वन नौकरशाही के हाथों में सौंप देने का प्रयास भर है .

मोहनभाई हीराबाई हीरालाल ( लेखक महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में स्थित मेंढा लेखा गांव के कम्यूनिटी लीडर हैं )

औपनिवेशिक कालीन भारतीय वन अधिनियम , 1927 की धारा – 28 में ग्राम वनों का उल्लेख है । ऐसे वनों में समुदायों के लिए कई लाभ थे , जिनमें से कुछ 1865 में लागू किए गए भारतीय वन अधिनियम में भी शामिल थे और यहां तक कि स्वतंत्र भारत में भी यह बने रहे । प्रख्यात विद्वान और इतिहासकार रामचंद्र गुहा के शोध से पता चलता है कि भारत के पहले वन महानिरीक्षक डिट्रीच बैंडिस ने 1865 में ऐसे प्रावधानों पर जोर दिया था .

दुर्भाग्य से ग्राम वन पूरी तरह से उपेक्षित बने रहे । 1988 में आई वन नीति में भी इनका उल्लेख । नहीं किया गया । 1990 के दशक से संयुक्त वन प्रबंधन को बढ़ावा दे रही केंद्र और राज्य सरकारों ने भी कभी इन वनों के अस्तित्व पर ध्यान नहीं दिया । हालांकि , लोगों की अनदेखी और स्वैच्छिक संगठनों व शोधकर्ताओं की उदासीनता को इसके लिए दोषी ठहराया जाता है , लेकिन केंद्र सरकार यह दावा नहीं कर सकती है कि उसे इस प्रावधान के बारे में कोई जानकारी नहीं थी । अपने अध्ययन में गुहा ने पाया कि रॉबर्ट बैडेन – पॉवेल जैसे प्रभावशाली ब्रिटिश , जिन्होंने भारत में ब्रिटिश सेना में सेवाएं दी थीं , उन्होंने ग्राम वनों के विचार का विरोध किया । ऐसे कानूनों के प्रति साम्राज्यवादियों के विरोध को । आसानी से समझा जा सकता है । लेकिन आजादी के बाद भी इस प्रावधान की उपेक्षा जारी रही , जो हमारी सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति के बारे में बहुत कुछ बताता है । अच्छे प्रावधान को लागू कर पाने में वन विभाग की विफलता को अपराध माना जाना चाहिए । उत्तराखंड और ओडिशा जैसे राज्यों ने तो प्रावधान का दुरुपयोग करने की कोशिशें भी की .

प्रस्तावित संशोधन , वर्तमान में ग्राम सभाओं के पास मौजूद सामुदायिक वन अधिकारों के खिलाफ ग्राम वनों का इस्तेमाल करते हुए सारी शक्ति वन नौकरशाही के हाथों में सौंप देने का प्रयास भर है । इस प्रकार से नए मसौदे को उल्टी दिशा में उठाए गए कदम के तौर पर देखा जाना चाहिए । भारत को एक ऐसे व्यापक वन कानून की आवश्यकता है , जो लोगों को अवसर व मान्यता प्रदान करते हुए उन्हें सीधे ग्राम सभा स्तर पर प्रतिनिधित्व करने की अनुमति प्रदान करे ।

( सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिये डाउन टू अर्थ हिंदी म ई 2019 के अंक से आभार सहित. )