रूब़रू में इस्लाम और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में जुलैख़ा जबीं से चर्चा . तीन एपीसोड़ .

दुनिया के सभी प्रचलित धर्म अपने अंदर कई रूढ़ियाँ और ग़ैरज़रूरी परम्पराएं लिए हुए हैं, और जब मैं “सभी धर्म” कह रहा हूं तो ज़ाहिर है इसमें इस्लाम भी शामिल है. किसी भी स्थापित व्यवस्था को समय समय पर व्याख्या और सुधार की ज़रुरत होती है. यही बात धार्मिक व्यवस्था पर भी लागू है. इतिहास गवाह है कि जो सभ्यताएं ग़ैरज़रूरी रूढ़ियों और अवैज्ञानिक परम्पराओं के लिए जड़ और कट्टर रहीं उनका क्या हश्र हुआ. आज के समय की ये मांग है कि हर धार्मिक व्यवस्था को अपना विश्लेषण कर वैज्ञानिक और मानवीय मूल्यों के हिसाब से ढालना होगा.

सीजीबास्केट की इस नई श्रृंखला हम ऐसे ही विषयों पर विश्लेष्णात्मक चर्चा करेंगे.

कार्यक्रम में हमारी मेहमान ज़ुलैख़ा जबीं ने इस्लाम में औरतों की स्थिति पर खुल के बात की है. जुलेखा कहती हैं वर्णों में बंटे भारतीय समाज में आज औरतों और वंचित समाज के लिए बराबरी और इंसाफ की बात ख़्वाबों में जीने जैसी है. फ़िर वो इस्लाम को मानने वाले मुसलमान ही क्यों न हों. इसीलिए जातिवादी, सामाजिक, सांस्कृतिक विभिन्नता वाले भारत में मुसलमान नाम वाली आबादी तो है मगर वास्तविक इस्लाम को मानने वाले यहां न के बराबर हैं.

वे कहती हैं कि दरअसल मामला कुछ ऐसा है कि इस्लाम के मूल इल्म को लोग यहाँ समझ ही नहीं पाए. इस्लाम नफरत नहीं मोहब्बत सिखाता है. कुरआन में इसका साफ़ साफ़ ज़िक्र मिलता है कि इस्लाम अन्य मजहबों का सम्मान करना और भाईचारा सिखाता है. अब गलत सीखकर कोई बुरा हो जाये तो इस्लाम को तो बदनाम नहीं किया जा सकता न. 

जुलैख़ा जी बिलासपुर में पली पढी और बढ़ी रायपुर भोपाल पहुचते पहुचते दिल्ली में बस गईं ,अभी पिछली ईद पर बिलासपुर अपने घर आईं तो उनके साथ इस चर्चा का संयोग बना.
उनसे चर्चा का समन्वय किया सामाजिक कार्यकर्ता नंद कश्यप ने और तीन एपीसोड़ में चर्चा की सामाजिक कार्यकर्ता अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला ने.
डा.असगर अली ने इस्लाम और महिलाओं के हक़ूक पर न केवल खूब लिखा है बल्कि इसके प्रशिक्षिण जैसी कक्षायें भी संचालित की थी.जुलैख़ा उन कक्षाओं में अध्यन रत रहीं और वामपंथी आंदोलन के साथ सामाजिक जन संगठनों के साथ छ्त्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में काम करती रहीं।उनके साथ इस्लाम और महिलाओं के आधिकार के साथ वर्तमान राजनैतिक स्थितियों में भारत के मुसलमानों पर प्रभाव पर चर्चा करना निश्चित ही प्रभावित करने वाली है.
वे कहतीं भी हैं कि हमारे देश में जो इस्लाम दिखाई देता हैं उसका वास्तविक इस्लाम से कोई लेना देना नहीं हैं. उस पर यहां के बहुसंख्यक धर्म और संस्कृति का भरपूर प्रभाव पड़ा है.और इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर जो मौलाना टाईप लोग इस्लाम परोसते है वह पूरी तरह भ्रामक और बकवास है यह लोग न केवल इस्लाम के दुशमन है बल्कि भारतीय मुसलमानों के भी दुश्मन है.

दूसरे और तीसरे एपीसोड़ में बात की गई कि इस्लाम का सैद्धांतिक पक्ष उच्च आदर्शों और प्रगतिशील दिखाई देता हो लेकिन उसका व्यवहारिक पक्ष ठीक उसके विपरीत दिखाई देता हैं ,इसके कारणों पर भी प्रकाश डालें.
हलाला ,तलाक ,शादियां ,महिला शिक्षा पर भी विस्तार से बात हुई.

तो आप सुनिये तीन एपीसोड़ में बातचित. हमारी कोशिश हैं कि एसी ही चर्चा हिन्दू ,ईसाई ,बुधिस्ट , सिखी और आखिर में नास्तिकता के जानकारो से बात करें।

तीनो एपीसोड़ को हमने इस तरह तकसीम किया है.

एक

(1)

इसमें कोई शक नहीं के 6वीं सदी में ही दीने इस्लाम भारत में पहुँच चुका था. वर्णों में बंटे भारतीय समाज में आज औरतों और वंचित समाज के लिए बराबरी और इंसाफ की बात ख़्वाबों में जीने जैसा है. फ़िर वो इस्लाम को मानने वाले मुसलमान ही क्यों न हों. इसीलिए जातिवादी, सामाजिक, सांस्कृतिक विभिन्नता वाले भारत में मुसलमान नाम वाली आबादी तो हैं मगर वास्तविक इस्लाम को मानने वाले यहां नहीं के बराबर हैं

दो

( 2)

क़ुरआन के ज़रिए जेंडर जस्टिस की बात लिखित तौर पे कहने वाला दीने इस्लाम है.
सांसकृतिक विविधता के बावजूद पति-पत्नि को बराबर से हक़ देने की बात करने वाला क़ुरआन ही है.
चूंकि दीने इस्लाम में हलाला जैसी अमानवीय, आपराधिक परंपरा के लिए कोई जगह नहीं है, हलाला के नाम पर अपराधी मुसलमान (मर्द) बेबस, मज़लूम औरतों और उनके परिवारों को डराकर सेक्स रैकेट चला रहे हैं..इसलिए IPC की धाराओं के तहत ऐसे मुसलमान मर्दों/संगठनों को क़ानून के तहत जेलों में डाला जाना चाहिए.

तीन.

( 3)

बेवा(विधवा) और तलाक़शुदा औरतों को भी एक से ज़्यादा बार शादी करने का हक़ क़ुरआन के ज़रिए दिया गया है.
मुसलमान मर्दों के लिए एक से ज़्यादा शादी की बात एक ख़ास हालात में कही गई थी जिसपे आगे जाकर रोक भी लगा दी गई है.

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