प्रकृति के संकेतों को नहीं समझने वाली सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं.

कबीर संजय जी की वॉल से साभार

प्रकृति के संकेतों को नहीं समझने वाली सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं। लग तो ऐसा ही रहा है कि हमारी पीढ़ी भी इन चेतावनियों को नजरअंदाज करने वाली पीढ़ी के तौर पर ही गिनी जाएगी। नीचे दो तस्वीरें है। सेटेलाइट से ली गई पहली तस्वीर चेन्नई के रिजरवायर की हालत को दर्शाती है। इस शहर का रिजरवायर लगभग सूख चुका है और पानी की किल्लत जानलेवा हो गई है। जबकि, दूसरी तस्वीर चेन्नई में वर्ष 2015 में आई बाढ़ के दौरान की है।


बीते कुछ सालों में हमने अपने देश में कुछ असामान्य से हालात देखे हैं। कुछ ही सालों पहले कश्मीर में बाढ़ देखी गई। बाढ़ के चलते चेन्नई में फ्लाईओवर से लेकर रेल लाइन और हवाई अड्डा तक डूब गया। फिर केरल में भी असामान्य बाढ़ आई। इससे पहले केदारनाथ में भारी बरसात के चलते भयंकर आपदा को भी झेल लिया गया था। यह सबकुछ पिछले आठ-दस सालों में ही हुआ है। अभी मुंबई बारिश के चलते बाढ़ से परेशान है, जबकि देश के तमाम हिस्से सूखे का सामना कर रहे हैं।


क्या प्रकृति की ओर से कोई संकेत दिया जा रहा है। कोई खतरे की घंटी बजाई जा रही है। कुछ सुनने की मांग की जा रही है।


यूरोप के लोग इस साल गर्मियों से बेहाल है। यूरोप के एक बड़े हिस्से में लू का प्रकोप छाया हुआ है। फ्रांस जैसी जगह में पारा 45.9 डिग्री तक पहुंच गया है। जर्मनी में 39.3, चेक रिपब्लिक में 38.9 और पोलैंड में पारा 38.2 डिग्री तक रिकार्ड किया गया है। अंतरराष्ट्रीय मौसम विज्ञानियों का कहना है कि अफ्रीका से आने वाली गर्म हवाओं के चलते यूरोप में लू के थपेड़े महसूस किए जा रहे हैं और यह सब कुछ भारत, पाकिस्तान, मध्यपूर्व और ऑस्ट्रेलिया में चलने वाले लू के थपेड़ों का ही एक क्रम है। गौर करें कि इस बार दिल्ली में भी तापमान अपना पुराना रिकार्ड तोड़ चुका है।
यूरोप में 72 फीसदी आबादी शहरों में रहती है। इन गर्मियों ने शहरों को बुरी तरह से तपा दिया है। इससे निकलने का रास्ता भी उन्हें नहीं सूझ रहा है। भीषण ठंड के चलते यूरोप के ज्यादातर शहरों में लोग अपने घरों को गरम करने का उपाय करते हैं। उन्हें ठंडा करने का उपाय नहीं होता। उदाहरण के लिए जर्मनी में केवल दो फीसदी घरों में ही एयर कंडीशनर लगा हुआ है। ऐसे में गर्मी यूरोप के लोगों के लिए भी जानलेवा होती जा रही है।


दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आने वाली तमाम समस्याएं एक-दूसरी से जुड़ी होने का भी संकेत कर रही हैं।
पर सवाल यह है कि क्या कोई इसे समझने को तैयार है। खासतौर पर हमारे देश में।


(दोनों तस्वीरें इंटरनेट से)

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Kabir Sanjay जी की वॉल से साभार

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