मसाला चाय कार्यक्रम में आज सुनते हैं यशपाल की कहानी “फूलो का कुर्ता”
कथाकार यशपाल का बचपन ऐसे दौर से गुजरा, जब बरसात या धूप से बचने के लिए उनके शहर फ़ीरोज़पुर छावनी (पंजाब) में कोई हिन्दुस्तानी अंग्रेज़ों के सामने छाता लगाकर नहीं गुज़र सकता था। बड़े शहरों और पहाड़ों पर मुख्य सड़कें उन्हीं अंग्रेजों के लिए थीं, हिन्दुस्तानी उन सड़कों के नीचे बनी कच्ची सड़क पर चलते थे। वह लिखते हैं, ‘मैंने अंग्रेज़ों को सड़क पर सर्व साधारण जनता से सलामी लेते देखा है। हिन्दुस्तानियों को उनके सामने गिड़गिड़ाते देखा है, इससे अपना अपमान अनुमान किया है और उसके प्रति विरोध अनुभव किया।’

यशपाल मूलतः उपन्यासकार, कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनके कहानी-संग्रहों में पिंजरे की उड़ान, फूलो का कुर्ता, धर्मयुद्ध, सच बोलने की भूल, ज्ञानदान, भस्मावृत्त चिनगारी, तुमने क्यों कहा था मैं सुंदर हूँ, उत्तमी की माँ प्रमुख हैं। की कहानियों में भरपूर कथा रस मिलता है। वर्ग-संघर्ष, मनोविश्लेषण और तीखा व्यंग्य इनकी कहानियों की विशेषताएँ हैं। उन्होंने दिव्या, देशद्रोही, झूठा सच, दादा कामरेड, अमिता, मनुष्य के रूप, मेरी तेरी उसकी बात, क्यों फँसें आदि उपन्यास लिखने के साथ ही एक व्यंग्य संग्रह चक्कर क्लब, संस्मरण सिंहावलोकन और आलोचना-समालोचना की किताब गांधीवाद की शवपरीक्षा भी लिखी। यशपाल की एक छोटी से लोकप्रिय कहानी है ‘फूलों का कुर्ता’, जो इस प्रकार है- अनुज

अनुज श्रीवास्तव ने मुबंई में.मसाला चाय की श्रंखला प्रारंभ की थी जिसमें वे देश के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार ,कवि और लेखकों की कहानी, कविता का पाठ करते है.यह श्रंखला बहुत लोकप्रिय हुई ,करीब 50,60 एपीसोड. जारी किये गये. सीजीबास्केट और यूट्यूब चैनल पर क्रमशः जारी करने की योजना हैं. हमें भरोसा है कि अनुज की लयबद्धत आवाज़ में आपको अपने प्रिय लेखकों की कहानी कविताएं जरूर पसंद आयेंगी. सीजीबास्केट .

मसाला चाय के इस अंक में सुनिए..