अरपा पर नवल शर्मा का कविता पाठ सुनेंगे , तो सुनिये.

नवल शर्मा .
हिंदी का विद्यार्थी .
बिलासपुर ने गढ़ा – यहीं बढ़ा .
छत्तीसगढ़ की माटी मालिक मैं कमिया हथगढ़िया.

नवल शर्मा जी से अरपा पर लिखीं कविताएँ यदा कदा कभी कभी कहीं सुनते रहे थे ,सोचा एक बार कविता पाठ के लिये तैयार कर ही लिया जाये। प्रथमेश जी के घर अमियां की पार्टी और प्रथमेश ,सविता जी ,अनुज और अपुन यानी लाखन सिंह.

उन्होंने पढीं …

पानी की मज़ार .., नदी कब अकेली होती है ,
सावन . सूखी . अरपा …का पाठ हुआ.थोडा़ रचना प्रक्रिया भी .
तो आप भी सुनिये ..

🐟🐠🐟🐠🐟🐠🐟🐠

कवि नवल शर्मा ने अरपा नदी से जुड़े अपने अनुभव और अपनी यादों को कविता रूप में हमें सुनाया. नवल शर्मा की ये कविताएँ पाटोपाट बहती जवान अरपा के किस्से सुनती हैं. बड़े दुःख के साथ वो कहते हैं कि अरपा अब मर गई है और हमारे दौर के लोगों को अरपा के कातिलों की तरह भी याद किया जाएगा.  

अनुज

🔹 पानी की मज़ार ..

जंगल तरफ़ से आती – नदी के
किनारों पर ,
आते – जाते रहे ,
रहनुमा पीर पैगंबर .
सूरज को साधने की तरकीबें बतलाते ,
मजमा जमाए मदारी
कंदीलों के पीछे चलते , उजियार तलाशते – लोग
आगे के अंधेरों में धंसते रहे .
एक बुढ़िया कहानी सुनाती है –
गांव गंवई के हिस्से की रौशनी ,
उस पार ले गये नावों में लाद कर – आन देश के लोग .
बहते पानी में गिर गयी थी – थोड़ी सी आग .
पानी डूबी चिंगारियों से – बीड़ियां सुलगाने आ बैठते हैं ,
बिना नागा – जायरीन ,
उजाले की मन्नतें लिये –
पानी की मज़ार पर .
सूखी नदी के घाट पर.

💦💧

🔹 नदी कब अकेली होती है

उजेला जागने से पहले
नदी के घाट पर
आने लगती हैं – औरतें .

नहाई धोई पंडिताइन
गीला लुगरा कस के लपेट लेती है छातियों पर
देखती इधर – उधर
कोई बोहा देती भरा हौंला .

मोहल्ला करबला वाली .
रात भर का धंधा निपटा
आती – घाट पर ,
सहर की अज़ान के पहले .
वेणी – गजरा उतार , डुबकी लगाती
गमकने लगता पानी का दायरा – दूर तक .

सुनारिन – नई बहुरिया को साथ लाती
दिप दिप करता रूप – गहनों से लदी
देह को मलती – सावधानी से
एक डुबकी लगाती – दूसरी नज़र रखती .

कितना कुछ घटता है घाट पर
भुजरिया – दुर्गा की मूरतें – ताजिये – पितरों के पिंड
सिरा लें —-
इतनी गहराई बनी रहे ,
दुबली पतली ही सही
नदी – बहती रहे ।

💦💧

🔹 सावन . सूखी . अरपा …

1

गोंड़पारा के किनारे से लगे किनारे पर ,
सजेधजे किन्नर सा इतराता
पानी ,
हनुमान मंदिर के सामने बैठी
मंगती डोकरी सा
खांसता हांपता
हरी काई की गुदरिया ओढ़ कर
पसर जाता है ,
रपटे के नीचे तक आ कर
गंधाती है – छिछली नदी – सावन के महीने में .

2:

सूखी नदी पर औंधा पड़ा रपटा – पार कर
रिक्शे पर आती है बिटिया ,
राखी के दिन .
अरपा किनारे ,
बचपन को ढूंढती है , पानी कहां गया पूछती है – पगली
मेरी कहानियों पर हंसती है .
अचरज करती है , सुनाता हूं उन दिनों की कहानी
डोंगी चढ़ के आती थी , तेरी बुआ
जैसे तू आई है – राखी बांधने .
तब अरपा पाटों पाट चलती थी .
पूर भरी अरपा – सावन में इतराती थी .

💦💧

🔹 प्रिया शुक्ला कहती हैं ,
प्रथमेश बतलाते हैं – नंद कश्यप लिखते हैं …..
रेत नदी का जिस्म है , कैसे
जुनूनी लोग हैं – रेत की खातिर लड़ते हैं .
नदी की ख़ूबसूरती पुल पर से दिखती है
ये नदी में उतर कर तलाशते हैं , नोच नोच कर की गयी –
नदी की हत्या के निशान .

💦💧 💦💧 💦💧 💦💧 💦💧 💦💧

नवल शर्मा

Anuj Shrivastava

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