दो सफाईकर्मियों की नारकीय हालत में काम करने की एक दुःखद सच्चाई.

देवनगर कचरा डिपो, रमाबाई नगर(मुम्बई, के नज़दीक) में काम करने वाले दो सफाईकर्मियों की नारकीय हालत में काम करने की एक दुःखद सच्चाई।
किस तरह उनका शोषण हर स्तर पर किया गया। यह सारी बातचीत आनंद पटवर्धन की एक डॉक्यूमेंट्री ‘जय भीम कॉमरेड’ से ली गई है। डॉक्यूमेंट्री पुरानी है पर सफाईकर्मियों की भयावह हक़ीक़त बयान करती है।

प्रस्तुति ःः प्रोम्थियस प्रताप सिंह

कैमरामैन- किस गांव से हो?

सफाईकर्मी- उस्मानाबाद जिला।

कैमरामैन- किस समाज से?

सफाईकर्मी- बौद्ध समाज से।

कैमरामैन- कब से काम कर रहे हो?

सफाईकर्मी- दस साल से।

कैमरामैन- पक्की नौकरी है?

सफाईकर्मी- नहीं, टेम्परेरी हूँ।

कैमरामैन- कितनी पगार है?

सफाईकर्मी- 73₹, दिन में तीन फेरी के बाद।

कैमरामैन- क्या बारह घण्टे ऐसे ही काम करते हो?

सफाईकर्मी- हाँ।

कैमरामैन- ये तुम्हारी आंख को क्या हुआ?

सफाईकर्मी- काम करते वक़्त एक आंख चली गई।

कैमरामैन- कैसे?

सफाईकर्मी- कांटा चुभ गया।

कैमरामैन- कैसे हुआ?

सफाईकर्मी- मैं कचरा बीन रहा था, लकड़ी टूटी और कांटे की नोक आंख में घुस गई।

कैमरामैन- म्युनिसिपैलिटी ने मुआवजा दिया?

सफाईकर्मी- कुछ नहीं दिया, मैंने उन पर मुकदमा दायर किया चार साल हो गए अभी तक फैसला नहीं आया। हमें कभी कांच लगता है, कीले घुसती हैं पैर में चोट लग जाती हैं। ट्रक(कचरे वाली) जब रिवर्स जाती है लोग घायल होते हैं। किसी तरह की कोई सुविधा नहीं मिलती।

दूसरे सफाईकर्मी से बातचीत-

कैमरामैन- कितने सालों से काम कर रहे हो?

सफाईकर्मी- 12 साल से।

कैमरामैन- किस समाज से हैं?

सफाईकर्मी- जय भीम(अम्बेडकरवादी दलित) यहां ज़्यादातर काम करने वाले जय भीम वाले हैं। कुछ पढ़े-लिखे हैं पर काम धंधा नहीं है

कैमरामैन- आपने भी पढ़ाई की है?

सफाईकर्मी- जी, हाँ नौंवी फेल हूँ। हम यहां कई साल से कांट्रेक्ट पर काम कर रहे हैं तो नौकरी पक्की करनी चाहिए। हमें गम बूट और टोपी देनी चाहिए। कचरा हमारे सर पर गिरता है हमें टोपी चाहिए। घर के पिछवाड़े के कचरों में संडास ही होता है हम उसे उठाते हैं तो हमारे पास मास्क नहीं रहता, वो हमारे मुंह और पूरे शरीर पर गिरता है। पहले तो साफ करने को पानी तक नहीं मिलता था। 10-12 तक हमें पीने और हाथ धोने तक के लिए पानी नहीं मिलता था। हमें किसी होटल में भी नहीं लेते थे। हमारी गाड़ी खराब होने पर हमें बस में चढ़ने नहीं देते क्योंकि हमारे गन्दे कपड़ों से बदबू आती थी। किसी होटल वाले से पानी मांगे तो वो हमें भगा देते थे। पहले डंपिंग मैदान में पानी नहीं मिलत था। 2-3 साल पहले हमने यूनियन बनाई। अब यूनियन की बदौलत कुछ इज़्ज़त मिली।

सफाईकर्मी- हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि हमें गम बूट, टोपी, रेनकोट और मास्क दिए जाएं। हाईकोर्ट ने कहा कि- यदि कांट्रेक्टर नहीं देता तो म्युनिसिपैलिटी को देना होगा लेकिन म्युनिसिपैलिटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। वो वकील को रोज़ाना 65000₹ दे सकते हैं लेकिन 2000 कामगारों को गम बूट और रेनकोट नहीं दे सकते।

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