इप्टा रायगढ ने बहुत ही समसामयिक पुस्तक प्रकाशित की धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार संदर्भ नरेन्द्र दाभोलकर. जिसका संयोजन जानी मानी रंगकर्म उषा आठले वैरागकर ने किया है .
मुझे यह पुस्तक कपूर वासनिक जी के माध्यम से मिली ,वो बिलासपुर में हम सभी को पत्र पत्रिकायें उपलब्ध कराने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर रहे है . हमें लगा कि नरेन्द्र दाभोलकर जी से किये गये प्रश्न और उसके उत्तर हम सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को जरूर पढना चाहिए .गूगल टटोलने पर उनकी हत्या से समबन्धित सामग्री जरूर बहुत मिलती हैं वह भी मराठी में. उषा जी ने बताया कि दूरदर्शन ने एक बार प्रश्न और उत्तर पर कुछ एपीसोड बनाये थे ,बहुत खोजने पर वह मिले नहीं ,मराठी में जरूर दो दो मिनट के एपीसोड उपलब्ध हैं.
उषा जी से बात हुई तो उन्होंने इसे सीजीबास्केट में क्रमशः छापने की अनुमति भी सहर्ष दे दी. हमारी कोशिश है कि रोज एक प्रश्न और उसका उत्तर का प्रकाशन नियमित करेंगे.कुल पच्चीस अंक होंगे.हमें आशा हैं कि आपको निश्चित ही यह प्रश्नोत्तरी समृद्ध करेगी.

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नरेन्द्र दाभोलकर की अब और ज्यादा जरूरत.

भारत की मार्क्सवादी सैद्धांतिकी में प्रायः धर्म और जाति के सवालों पर चर्चा कम मिलती है । धर्म और जातियों का विभेद दूर हुए बिना समाज – परिवर्तन या व्यवस्था – परिवर्तन नहीं हो सकता , भारतीय परिप्रेक्ष्य में अब इस पर विचार करने की पहल हो चुकी है और कुछ क्षेत्रों में इस दिशा में आंदोलन की नींव भी पड़ गई है । जाति – उन्मूलन की दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं । भारत का समाज सिर्फ वर्गाधारित समाज नहीं है । उसमें धर्म – सम्प्रदाय जाति – उपजातियों की अनेक दृश्य – अदृश्य दीवारें खड़ी हैं । इनकी जड़े भी बहुत गहरी हैं । इसलिए इस वास्तविक परिस्थिति से जमीनी स्तर पर जूझते हुए ही वामपंथी आंदोलन आगे नए रास्ते खोज पाएगा । विभिन्न प्रकार के आंदोलन के अनेक पुरोधाओं ने जो काम किया है ,उसपर हमें विचार करना होगा .

जब 2015 में नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या हुई , उस समय से ही यह सवाल करेद रहा था कि अंध श्रद्धा निर्मुलन का काम क्या वाकई इतना अधिक अवरोधक है कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी । इस बीच रावसाहेब कसले की किताब भक्ति और धम्म का अनुवाद करते हुए मुझे स्पष्ट महसूस हुआ कि समूचे विश्व में ही धर्म नामक संस्था का कितना जबर्दस्त प्रभाव मध्य युग से रहा है और आज उसकी जड़े और भी फैलकर अपना रूप बदल चुकी हैं । अब धर्म की राजनीति शुरू हो गई है । ऐसे समय में धर्म की प्रचलित धारणाओं के प्रति अपनी सैद्धांतिकी पर हमें पुनर्विचार करना ही होगा ।

यूट्यूब पर नरेन्द्र दाभोलकर से पचीस सवालों का एक धारावाहिक , लघु जवाबों के रूप में ( हर्षल जाधव संपादित ) जब मैंने मराठी में सुना तो मुझे लगा कि उनकी अधिकांश किताबों का हिंदी अनुवाद हो चुकने के बावजूद इस सीरीज के छोटे – छोटे सवाल – जवाबों के आधार पर पुनर्विचार के लिए बिंदु प्रस्तुत किये जाने चाहिए .

उषा वैरागकर आठले

तो आज प्रस्तुत हैं पहला प्रश्न . वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है ?

इसका जवाब देते हुए दाभोलकर कहते हैं कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ है इस दुनिया पृथक दृष्टिकोण से विचार करना । कोपर्निकस ने वैज्ञानिक क्रांति की थी । तब तक माना जाता था कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर घूमता है परंतु उसने सिद्ध किया कि के चारों ओर पृथ्वी और अन्य ग्रह घूमते हैं । देखने का यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण इतना महत्वपूर्ण साबित हुआ कि भारतीय संविधान में नागरिक कर्तव्यों के अंतर्गत इसे भी । सम्मिलित किया गया । इसका समावेश शिक्षा के सार में , मूल्य – शिक्षा में किया गया । संविधान में लिखा गया -It is duty to every indian citizen to promote scientific temperament.. जब यह इतना महत्वपूर्ण माना गया है तो आखिर इसका अर्थ क्या कुछ बिंदु हैं –

1.
कार्य – कारण संबंध – हरेक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है । उसके पीछे ईश्वर या भाग्य या किस्मत नहीं होती पूर्वजन्म़ों का फल भी नहीं होता

2
यह कारण हमारी बुद्धि समझ सकती है । हमें भरमाया गया कि तुम ओबीसी हो तो तुम्हें इतना ही समझ में आएगा । तुम दलित हो , तुम्हें कुछ भी समझ में नहीं आएगा । तुम स्त्री हो , तुम्हें पढ़ने का अधिकार नहीं है । इन बातों के प्रमाणस्वरूप कोई कारण नहीं है ।

3
दुनिया में घटने वाले सभी कार्यों का कारण तुरंत समझ में आए , यह ज़रूरी नहीं है । जैसे , आज कैंसर क्यों होता है , इसका ठीक – ठीक कारण हमें पता नहीं है । परंतु वैज्ञानिक हमेशा ही विनम्र होता है । वह कहता हैं । कि अखंड सत्य की खोज जारी है । वह कभी भी अंतिम सत्य की बात नहीं करता , बल्कि सत्य की निरंतरता की बात करता है ।

4.

न्याय – प्राप्ति के लिए मनुष्य द्वारा प्राप्त किया गया सबसे भरोसेमंद रास्ता वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही है । यह उन सभी मागों को नकारता है – बुद्धि – प्रामाण्य , ग्रंथ – प्रामाण्य , किसी ने किसी के सिर पर हाथ रखकर ज्ञान दे दिया , आदि आदि

इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का स्वीकार जिसतरह मानव – जीवन का महत्वपूर्ण भाग है , उसी तरह इस देश की विकास – यात्रा की भी अनिवार्य शर्त है .