बस्तर से दो साल मे बीस हजार आदिवासी भूख और भय के कारण अपने गॉव छोडने को मजबूर ,
छत्तिसगढ के सुकमा, बीजापुर और दंतेवाडा से सिर्फ दो साल मे करीब बीस हजार आदिवासी आपने गॉव छोड के आंध्रा जाने को एक बार फिर मजबूर हो रहे हैं ,पलायन का दौर अभी भी जारी हैं , आदिवासी कह रहे हैं की रोजगार के अभाव मे भूख मरने की नोबत आ रही हैं , चारो तरफ भय का वातावरण बना हुआ हैं . हालांकी ये सब पहली बार नहीं हो रहा है ,
काम नहीं मिलने के कारण खाने के लाले पड रहे हैं ,एक तरफ सरकार मनरेगा से रोजगार देने का धिंडोरा पीट रही है, वही दूसरी तरफ इन तीन जिलो मे मनरेगा के साढे सात करोड का भुगतान सरकार नहीं कर पा रही हैं , वो अलग बात है की आदिवासी मनरेगा मे मजदूरी बराबर कर रहा हैं .एक तरफ फोर्स का भय है दूसरी तरफ माओवादियो की धोंस है और सबसे बड़ी समस्या है पेट की भूख , सरकार ने लगभग सारी सरकारी योजनाओ को बंद कर दिया है ,स्कूल ,अस्पताल ,राशन दुकान और रोजगार के लिये काम नहीं मिल पा रहा हैं , सरकार कहती है की ,माओवादियो की हिंसा के कारण कोई काम नहीं हो पा रहा हैं, सीआरपी, बीएसएफ ,लोकल पुलिस पुरी हथियारो के साथ हमेशा मोजूद है , सब काम हो सकते है, लेकिन गरीबी उन्मूलन योजनाये लागू नहीं कर पा रहे हैं.
जिन परिवारो को सलवा जुडम केंप मे रखा गया था ,अब वे भी पलायन को मजबूर हैं ,यहा भी राशन बंद हो गए है ,ये लोग गॉव वापस जा नहीं सकते ,तो इनके पस भी भूख मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा हैं गॉव मे जॉ जमीन थी इन परिवारो की अब वो भी इनके पस नहीं रही .
तीन महीने से मनरेगा का कोई भुगता नहीं हुआ है ,सरकारी कर्मचारियो का पेमेंट भी नहीं हो पा रहा हैं , एक काम जरूर बदस्तुर जारी है,वो है माओवादियो के नामसे आदिवासियो को फर्जी हत्याये ,इसमे कोई कमी नहीं आई, सरकार और कम्पनिया यही चाहती है की आदिवासी भूख और भय के कारण अपने गॉव खली कर दें ,ताकी फिजुल मे उनकी हत्याये या गॉव खाली करने की नोबत न आये ,

फ़ोटो: बस्तर से दो  साल मे बीस हजार आदिवासी भूख और भय के कारण अपने गॉव छोडने को मजबूर ,

छत्तिसगढ के सुकमा, बीजापुर और दंतेवाडा से सिर्फ दो साल मे करीब बीस हजार आदिवासी आपने गॉव छोड के आंध्रा जाने को एक बार फिर मजबूर हो रहे हैं ,पलायन का दौर अभी भी जारी हैं , आदिवासी कह रहे हैं की रोजगार के अभाव मे भूख मरने की नोबत आ रही हैं , चारो तरफ भय  का वातावरण बना हुआ हैं . हालांकी ये सब पहली बार नहीं हो रहा है , 
काम नहीं मिलने के कारण खाने के लाले पड रहे हैं ,एक तरफ सरकार मनरेगा से रोजगार देने का धिंडोरा पीट रही है,  वही दूसरी तरफ इन तीन जिलो मे मनरेगा के साढे सात करोड का भुगतान सरकार नहीं कर पा रही हैं , वो अलग बात है की आदिवासी मनरेगा मे मजदूरी बराबर कर रहा हैं .एक तरफ फोर्स का भय है दूसरी तरफ माओवादियो की धोंस है और सबसे बड़ी समस्या है पेट की भूख , सरकार ने लगभग सारी सरकारी योजनाओ को बंद कर दिया है ,स्कूल ,अस्पताल ,राशन दुकान और रोजगार के लिये काम नहीं मिल पा रहा हैं , सरकार कहती है की ,माओवादियो की हिंसा के कारण कोई काम नहीं हो पा रहा हैं, सीआरपी, बीएसएफ ,लोकल पुलिस पुरी हथियारो के साथ हमेशा मोजूद है , सब काम हो सकते है, लेकिन गरीबी उन्मूलन योजनाये लागू नहीं कर पा रहे हैं. 
जिन परिवारो को सलवा जुडम केंप मे रखा गया था ,अब वे भी पलायन को मजबूर हैं ,यहा भी राशन बंद हो गए है ,ये लोग गॉव वापस जा नहीं सकते ,तो इनके पस भी भूख मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा हैं गॉव मे जॉ जमीन थी इन परिवारो की अब वो भी इनके पस नहीं रही .
तीन महीने से मनरेगा का कोई भुगता नहीं हुआ है ,सरकारी कर्मचारियो का पेमेंट भी नहीं हो पा रहा हैं , एक काम जरूर बदस्तुर जारी है,वो है माओवादियो के नामसे आदिवासियो को फर्जी हत्याये ,इसमे कोई कमी नहीं आई, सरकार और कम्पनिया यही चाहती है की आदिवासी भूख और भय के कारण अपने गॉव खली कर दें ,ताकी फिजुल मे उनकी हत्याये या गॉव खाली करने की नोबत न आये ,