● पश्चिम बंगाल में हिंसा को लेकर सप्ताह भर से जो तूमार सा खड़ा किया जा रहा है उसमे त्रासदी से ज्यादा विडम्बना और पाखण्ड है । विडम्बना इस मायने में कि पारस्परिक पूरक और प्रतिद्वंद्वी साम्प्रदायिक उन्माद में अब तक इससे तकरीबन अछूते रहे, देश भर के सामने साम्प्रदायिक सौहार्द्र और शांति की सबसे मजबूत मिसाल प्रस्तुत करने वाले पश्चिम बंगाल को डब्लू डब्लू एफ की रिंग बनाया जा रहा है । पाखण्ड इस मामले में कि भारतीय राजनीति में हिंसा और प्रतिशोध के दो सबसे बड़े योद्दा “करें गली में कत्ल बैठ चौराहे पर रोयें” की मुद्रा में आमने सामने हैं । इसकी ताईद इस हिंसा के बहाने जोरशोर से उठाई जा रही राष्ट्रपति शासन की मांग कर देती है और साफ हो जाता है कि इस विक्टिम सिंड्रोम की नाटकीयता में लोकतंत्र के प्रति चिंता नही उसे हड़पने के अपने अवसर की आतुरता अधिक है । इसकी ठोस वजहें हैं जिनके प्रमाणित तथ्य हैं ।

● कौन नही जानता कि ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही पश्चिम बंगाल उनकी सरपरस्ती में जारी राजनीतिक गुण्डई का मरकज़ और जम्हूरियत का मक़तल बना हुआ है । किसान सभा, ट्रेड यूनियन सहित वामोन्मुखी संगठनों और सीपीएम-सीपीआई जैसे राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दलों के सैकड़ों दफ्तरों पर कब्जा कर लिया गया । नवान्नो (राज्य सचिवालय) पर हुए प्रदर्शन सहित समय समय पर हुए जनता के आंदोलनों पर हुए भीषण लाठीचार्ज में वाम के वरिष्ठतम नेताओं के सर फोड़ दिए गये – सुदीप्तो जैसे युवा छात्र को मार डाला गया । यह वह दौर है जिसमें सीपीएम और वामपंथी दलों, संगठनों के 250 नेता-कार्यकर्ता जान से मार दिये गये । जिनमे से अधिकांश खेत मजदूर, दिहाड़ी श्रमिक, दलित-आदिवासी और मुस्लिम थे । तब तो, आज जो गला फाड़ रहे हैं उनके मुंह से उफ तक नही निकली । क्या इसलिये कि उनके लिए “वैदिकी हिंसा – हिंसा न भवति” की तरह “वाम की हत्या – हत्या न भवति” है ।

● ममता और उनकी टीएमसी ने राजनीतिक हिंसा के मामले में क्रूरता की जुगुप्सा जगाने वाली मिसालें रचीं । इनके सांसदों, मंत्रियों, विधायकों ने बाकायदा आमसभाओं के वीडियो रिकार्डेड भाषणों में सीपीएम कार्यकर्ताओं और उनके परिवार की महिलाओं के साथ बलात्कार करने के आव्हान किये । इन आव्हानो के अमल में सैकडों – जी हां सैकड़ों – बलात्कार की घटनाएँ घटीं, जिनमे से ज्यादातर दर्ज तक नही की गईं …और आज जो हिंसा की चीखपुकार मचाते हुए लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं वे आल्हादित हुए इस वाम मर्दन को ताकते रहे । निंदा, भर्त्सना तो छोड़िए एक दो पंक्ति का क्षोभ व्यक्त करने वाला वक्तव्य भी जारी नही कर पाये । क्या यह अनायास है ? नहीं । क्यों नही ?

● इस क्यों नहीं के पीछे के सच को समझना है तो त्रिपुरा के हाल के हालात देख लीजिए । वह त्रिपुरा जो सात पूर्वोत्तर राज्यों में अकेला है जिसमे शान्ति थी । अलगाववादी आंदोलन की कोई सुगबुगाहट तक नही बची थी । और यह सब अर्धसैनिक बलों से, ताकत के जोर से नही वाममोर्चे की सरकारों, कार्यकर्ताओं द्वारा जनता के लिए अनथक काम करके उसका भरोसा जीतकर उसे 100 फीसद साक्षर और यथासंभव चेतनासम्पन्न बनाकर किया था । पिछली सवा साल में इसी शान्त और सुंदर त्रिपुरा को रक्तरंजित कर दिया गया है । सीपीएम सहित वामपंथी पार्टियों और वामोन्मुखी जनसंगठनों के 200 दफ्तर तो खुद सरकार ने बुलडोजर चलवाकर तोड़ दिये । सैकड़ों कार्यालय सरकारी पार्टी – यहां टीएमसी नही बीजेपी है – के गुंडों ने दखल कर लिये । एक जिला और तीन सबडिवीजनल ऑफिस खोलने नही दिए जा रहे । छह नेतृत्वकारियों की हत्या की जा चुकी है । हजारों कार्यकर्ताओं पर शारीरिक हमले हुए । महज 38 लाख की आबादी वाले प्रदेश के हिसाब से ये संख्यायें वीभत्सता के भयावह आयाम दिखाती हैं । हमलो का निशाना गौतम दास, बादल चौधुरी, रतन भौमिक, जितेंद्र चौधरी जैसे लब्ध प्रतिष्ठित और त्याग-समर्पण की मिसाल नेता भी बने और आज भी बने हुए हैं । पंचायतों और गांवों पर बारम्बार हमले हो रहे हैं । भाजपाई गुण्डा वाहिनी का हौंसला यहां तक है कि वह तीन चार बार माणिक सरकार तक की कार रोक चुकी है । राजनीति का नकाब ओढ़े इस घोर गुण्डई का नजारा इस लोकसभा चुनाव में मोदी-संकोची कें चु आ (केन्द्रीय चुनाव आयोग) को भी मानना पड़ा और आधे अधूरे मन से पुनर्मतदान का आदेश देना पड़ा । क्या यह अनायास है ? नहीं ।

● ममता की टीएमसी और मोदी-अमित शाह की बीजेपी दो ऐसे सहोदर भाई बहिन हैं जो कभी कुम्भ के मेले में भी नही बिछुड़े । वे एनडीए के अटल कुम्भ में भी साथ थे । आडवाणी कुम्भ में भी । मोदी जी के भाषण और इंटरव्यू पर यकीन करें तो अब भी दीदी उन्हें हर साल मिठाई और कुर्ता भेजती हैं । आडवाणी से लेकर तब के एनडीए संयोजक जॉर्ज फर्नान्डीज तक सब उनके साथ, उनके लिए कोलकता से सिंगूर तक के अर्ध-कुम्भो में अपने अखाड़े लेकर जा चुके हैं ; अब अचानक इन्ही को बंगाल में राजनीतिक हिंसा का दिखाई देने लगना संजय की सेलेक्टिव रिपोर्टिंग है या धृतराष्ट्र के मन की “आंखोंदेखी” या शकुनि की पासा-पारंगतता या फिर तीनों ? जो भी है किन्तु इसमें लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली या संवैधानिक शासन की चिंता नहीं पांचों अंगुली घी में किसकी रहें इसकी है । वरना जो आज की वारदातों पर बोल रहे हैं वे इससे पहले के कत्लेआम जैसे हालात पर सुट्ट मारकर नही बैठते ।

● इसके पीछे खालिस वर्गीय पक्षधरता है । वाम पर हमले और अवाम को रौंदे जाने की खीर में साझेदारी और आपसी बंदरबाट की महेरी में न्यारा दिखने की इस चतुराई के करतब के लिए वाम भी कम जिम्मेदार नही है । सारी विद्वत्तापूर्ण “सलाहों समझाईशों” के बावजूद न उसने कारपोरेट से गलबहियां की न धर्म, सम्प्रदाय और जाति की प्रैक्टिकल राजनीति की समझदारी ही दिखाई । मुनाफे को श्रम की चोरी, शोषण को असभ्यता और लूट को बर्बरता मानने की जिद पर अड़ा रहा । न मनु को पढ़ने के लिए राजी है न शरियत पर चलने चलाने का हामी है । अभी भी आधुनिक मानवीय मूल्यों के सपने संजोये, अंधेरों के बेपनाह उत्सव में इंसानियत की उम्मीद की शमां रोशन किये बैठा है ।

● छुटपुट घटनाओं पर चट पट दांवपेंच से फटाफट राजनीतिक फायदे की फसल लहलहाने को व्याकुल आत्मायें भूल रही हैं कि सबसे ज्यादा फुर्ती से या तो धतूरा फूलता है या विषवेल फलती है । दीर्घायुता भी सिर्फ दिमाग मे घर बसाये बैठे प्रेतों की होती हैं। सभ्यताओं के संस्कारित होने में सदियां लग जाती हैं उन्हें ढहाने में बर्बर सप्ताह भर भी अधिक मानते हैं। ठीक यही काम इन दिनों पश्चिम बंगाल में हो रहा है । उस बंगाल को उन्मादी बनाया जा रहा है जहां ज्योति बाबू के मुख्यमंत्रित्वकाल मेंं 1984 के सिख विरोधी दंगों, 1990 की आडवाणी की विनाश रथ यात्रा और 1992 में बाबरी ध्वंस के बाद देश भर में हुई वीभत्स साम्प्रदायिक हिंसा के दौरान पत्ता तक नही खड़का था । उस बंगाल को बांटा जा रहा है जो बंटवारे में आधा-आधा बंटने के बाद भी अपने घावों जख्मों को धो-पोंछ सबसे पहले उठ खड़ा हुआ था । इसके पीछे सिर्फ नोआखाली में महात्मा गांधी का साहसी अनशन ही नही था, काका बाबू मुज़फ्फर अहमद, मोहम्मद अब्दुला रसूल और मोहम्मद अमीन जैसे वाम दिग्गजों की भागीदारी के साथ कम्युनिस्टों की अगुआई में चला महान शरणार्थी आंदोलन भी था जिसने बेदखल हो कर आये बंगालियों को पूरे सम्मान और यथोचित साधनों के साथ पुनर्वासित किया था । जो बंगाल को नही जानते वे असल मेे भारत को ही नहीं जानते – इसी आधार पर जो बंगाल को सुलगा रहे है वे बाकी जो हों सो भारत की सलामती चाहने वाले तो नही ही हैं।

● मगर यहां मसला सिर्फ वाम भर का नही है । तानाशाही जब आती है तो किसी को नही बख्शती । 1972 में ऐसा ही हुआ था । पश्चिम बंगाल में अर्ध-फासी आतंक ने अपना साया गहरा किया था, बाद में 1975 में पूरे भारत ने इमरजेंसी देखी । इस बार स्थिति उससे ज्यादा गंभीर और बदतर है । अबके तानाशाही का मूलतत्व फासीवाद है जो धर्म की धजा में साम्प्रदायिकता की फ़िज़ा के साथ है। उसके निशाने पर लोकतंत्र, बहुलता, संविधान और पिछली डेढ़ सौ साल के सामाजिक जागरण की उपलब्धियों के साथ साथ भारत भी है । टीएमसी और बीजेपी की नमक से नमक खाने की कोशिशें इस मुख्य खतरे को आड़ मुहैया कराने के सिवा कुछ नही है ।

औरआखिर में

जो खुद 2002 के गुजरात की भस्मी से लिपेपुते हैं , जिनके शासित प्रदेशों की हालत इन पंक्तियों के लिखे जाते वक्त आई आगरा की अदालत में यूपी बार कौंसिल की अध्यक्षा की दिनदहाड़े हत्या की भयावह खबर उजागर करती हो, उनके मुंह से कानून व्यवस्था की बात शैतान के मुंह से कुरान की आयत नही तो क्या है ?

बादल सरोज

माकपा मा के वरिष्ठ नेता