हंस मत पगली फंस जाबे… एक बंडल फिल्म जिसके सुपरहिट होने के पूरे चांस हैं…

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राजकुमार सोनी अपना मोर्चाा .काम

शीर्षक को देखकर आपका माथा घूम सकता है कि भला एक बंडल फिल्म सुपरहिट कैसे हो सकती है. पूरा विश्लेषण पढ़े और जाने…..

रायपुर. सतीश जैन की नई फिल्म हंस झन पगली फंस जबे को देखते हुए आपको हिंदी की कई सुपरहिट फिल्मों की याद आती है. फिल्म का अंतिम दृश्य राजकपूर की बॉबी की याद दिलाता है जब प्रेमनाथ और प्राण अपनी-अपनी औलाद ( डिंपल कपाड़िया और ऋषि कपूर )  को बचाने के लिए गुंडों से भिंड जाते हैं. फिल्म की शुरूआत में सलमान खान और काजोल अभिनीत प्यार किया तो डरना क्या… की भी याद आती है. आपको शायद याद हो कि इस फिल्म में काजोल का भाई अरबाज खान बेहद कठोर स्वभाव का है और अपनी बहन की रक्षा के लिए मर मिटने को तैयार रहता है. हंस झन पगली में भी एक अरबाज खान टाइप का पात्र है जिसकी बॉडी सलमान खान जैसी है. इंटरवेल के बाद  हंस  झन पगली में… सूरज  बाड़जात्या की फिल्म मैंने प्यार किया का फ्लेवर घुस जाता है. एक बड़े घर का लड़का है जो हिरोइन के लिए गढ्ढे खोदता है. सीमेंट की बोरियां उठाता है और राजमिस्त्री का काम करता है. याद करिए मैंने प्यार किया में सलमान खान ने भी भाग्यश्री के लिए कुछ इसी तरह का काम किया था. इस फिल्म को देखते हुए आपको विवेक मुश्रान और मनीषा कोइराला की फिल्म सौदागर की भी याद आती है. इस फिल्म में भी दो परिवारों के बीच खांटी दुश्मनी थी. फिल्म में कई फिल्मों का मिश्रण होने के बावजूद हंस झन पगली… विशेष दर्शकों की सीटियां, चीखें और सिसकारियां बटोरने में कामयाब रहती है.

सतीश जैन के बारे में यह बात प्रचारित है वे आम जन के लिए फिल्म निर्माण करने वाले एक बड़े डायरेक्टर है. यह भी माना जाता है कि जब कभी भी छत्तीसगढ़ी सिनेमा आईसीयू में शिफ्ट हो जाता है तब अचानक सतीश जैन अवतरित होते हैं और सिनेमा को आईसीयू से निकालकर सामान्य वार्ड में शिफ्ट कर देते हैं. यह अलग बात है कि सामान्य वार्ड में शिफ्ट होने के दौरान भी सिनेमा पर ऑक्सीजन सिलेंडर चढ़ा रहता है. छत्तीसगढ़ी सिनेमा से जुड़े कतिपय लोग सतीश जैन को भीष्म पितामह भी कहते हैं.

भीष्म पितामह की नई फिल्म हंस झन पगली फंस जबे पूरी तरह से एक फैमली ड्रामा है जिसमें हर तरह का मसाला मौजूद है. इस फिल्म में हीरो है. हिरोइन है. मुसीबत में काम आने वाले हीरो के कॉमेडियन दोस्त है तो मुसीबत से बचाने वाली हिरोइन की सहेलियां भी है. दो परिवार है जिनमें एक सड़क निर्माण के टेंडर के बाद दुश्मनी चलती है. दो परिवार के बीच खानदानी दुश्मनी होने के बावजूद हीरो और हिरोइन एक-दूसरे को दिलो-जान से चाहते हैं. छत्तीसगढ़ की संस्कृति के नाम पर इस फिल्म में केवल एक-दो जगह बिहाव के दृश्य है और अंग्रेजी मिश्रित छत्तीसगढ़ी बोली. बाकी फिल्म में बड़ा सा घर है. रायल इनफील्ड है. खुली जीप में लाठी-डंडे, तलवार लेकर घूमने वाले गुंडे हैं. ( फिल्म में तीन-चार बार इस दृश्य को देखकर यह सवाल कौंधने लगता है कि हम छत्तीसगढ़ में रहते हैं या बिहार में ) हीरो के बदन पर एक से बढ़कर एडिडॉस की टी शर्ट है. हिरोइन के शरीर पर गुलाबी टॉवेल भी है. मुंबईयां फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी कई जगह दनादन गोलियां चलती है और अंत में मद्रास की पुरानी पारिवारिक फिल्मों की तरह सब कुछ ठीक-ठाक हो जाता है. यानी सुखद दी एंड. कुल मिलाकर फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे हजारों-हजारों बार हिंदी फिल्म में न देखा गया हो.

देश-दुनिया में अभी यथार्थ ने दम नहीं तोड़ा है और उसका धरातल भी कायम है. यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि यथार्थ के धरातल पर जिस तरह के सिनेमा को देखा-समझा और पसंद किया जा रहा है, जैन का सिनेमा उससे कई हजार किलोमीटर दूर है. यह फिल्म कोरी भावुकता की चाशनी में लिपटी हुई एक प्रेम कहानी है जिसे देखकर दर्शक हंसता है और कई जगह जमकर रोता है. शायद यही विशेष दर्शकों का आनंद भी है. यश चोपड़ा, राजश्री प्रोडक्शन और करण जौहर की फिल्मों की तरह इस फिल्म में एक खास तरह का संगीत बार-बार गूंजता है. हालांकि पूरी फिल्म का यही सबसे मजबूत पक्ष है.

मीडिया को दिए गए इंटरव्यूह में सतीश जैन कई मर्तबा यह कह चुके हैं कि वे केवल मनोरंजन के लिए फिल्म बनाते हैं, लेकिन दिमाग को खूंटी पर टांगकर भला कोई कितनी देर तक दांत निपोर सकता है, बावजूद इसके हंस मत पगली  विशेष दर्शक वर्ग को थोड़ा हंसाती है. रुलाती और गुदगुदाती है. इस फिल्म को देखने के बाद आदम जमाने की कहानी को पसंद करने वाले दर्शक फीलगुड का अनुभव कर सकते हैं, लेकिन इस खबर को लिखने वाले ने फिल्म को देखने के दौरान यह महसूस किया कि वह एक बी ग्रेड मूवी के चक्कर में फंस गया है.

इस खबर में लेखक की अपनी राय है. एक दर्शक की हैसियत से आप लेखक की राय से सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन लेखक इस बात की अपील नहीं करता है कि फिल्म हंस मत पगली फंस जबे को बिल्कुल भी देखने मत जाइए. एक फिल्म काफी मेहनत के बाद तैयार होती है इसलिए निर्माता या निर्देशक के उत्साह पर ठंड़े पानी का छींटा नहीं पड़ना चाहिए. ( कई बार खराब फिल्मों में भी मनोरंजक तत्व निहित होते हैं. बात केवल स्वाद यानी जायके की होती है. अगर दर्शकों को बंडल फिल्मों से भी मनोरंजन और आनंद हासिल होता है तो उन्हें मनोरंजन और आनंद को हासिल करने का पूरा अधिकार है. सतीश जैन की फिल्म को पसन्द करने वाले सभी दर्शकों के साथ लेखक सहानुभूति रखता है. )

यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि हंस झन पगली फंस जबे… एक बंडल फिल्म है और उसके सुपरहिट होने के पूरे चांस है. अब आप कहेंगे कि भला बंडल फिल्म कैसे सुपरहिट हो सकती है. गोविंदा छाप फिल्मों का भी एक स्तर तो होता ही है. हकीकत यह  है कि यह फिल्म सबके लिए नहीं है. सतीश जैन ने जिस तरह के खास दर्शकों को ध्यान में रखकर  फिल्म बनाई है वे पहले भी उनकी फिल्मों को हिट बनाते रहे हैं. वे दर्शक कौन है. कैसे दिखते हैं. क्या करते हैं. इन सवालों का जवाब आपको  छबिगृह में जाए  बगैर नहीं मिल सकता है. छविगृह जाकर आप इस बात पर हैरत में पड़ सकते हैं कि अरे… ये लोग किस बात पर हंस रहे हैं. किस बात पर रो रहे हैं. किस बात पर गाने का वीडियो बना रहे हैं. घिसी-पिटी कहानी पर बनाई गई इस फिल्म में कई तरह की कमियां है मगर खास तरह के दर्शकों के उत्साह को देखकर लगता है कि फिल्म चमत्कार पैदा कर सकती है. तमाम तरह की असहमतियों के बावजूद यह तो मानना ही होगा कि जिस तरह से किसी समय दर्शक मिथुन चक्रवर्ती की आयं-बाय-साय फिल्मों को देखने के लिए टूट पड़ते थे ठीक वैसे ही सतीश जैन की फिल्म को देखने के लिए भी टिकट खिड़की पर लाइन लगाते हैं. बहरहाल विशेष तरह के दर्शक वर्ग के लिए खास ट्रीटमेंट के साथ बनाई गई फिल्म बनाने के लिए सतीश जैन को बधाई तो दी जा सकती है. उन्हें बधाई. फिल्म में किस का काम अच्छा है यह मत पूछिए. बस दो चरित्र अभिनेता पुष्पेंद्र सिंह औरआशीष सेंद्रे के काम में परिपक्वता नजर आती है. फिल्म में एक जगह हीरो और हिरोइन को दोसे का ठेला खोलकर दोसा बनाते हुए देखना सुखद लगता है. यह ख्याल भी आता है कि मोदी ने यूं ही पकौड़ा तलने के काम को रोजगार से नहीं जोड़ा था. 

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