इतना भाव क्यूँ खा रहे हो कल मुँहे अशिष्ट , तुम बादल हो या कैपिटलिस्ट ??

बादल सरोज

नदी से नहर से, कुंए से बावड़ी से,
गमले से बाल्टी से, डबरे से घाटी से,
ताल से तलैया से, खुले में रखी कटोरी और थाली से
यहां तक कि
प्यासे पक्षियों के लिए बालकनी में लटकाये मिट्टी के बर्तनों
और दुःख और विरह में भीगी आंखों तक से भी ;
बिन पूछे बिन कहे कतरा कतरा चुराकर
खुद को कर लेते हो बदशक्ल और आकाश भर मोटा ।

जब लेना होता है तब :
और बाय द वे तुम्हे लेना नही होता कब ?
हमेशा ही तो ताक में रहते हो कि बस दिखे भर
नमी या आर्द्रता और धर लो उसे तुम अपनी गीली तिजोरी में !!
क्या है तुम्हारा अपना ?
सब कुछ तो धरती से उठाया धरा है तुम्हारे पास ।

लेने की बारी आती है तब न झिझक न संकोच न लाज न शरम
और जब लौटाने का वक़्त आया तो खुद के होने का इतना भरम
इतना भाव क्यूँ खा रहे हो कलमुँहे अशिष्ट
तुम बादल हो या कैपिटलिस्ट ??

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