दलित अस्मिता के लिए एकजुट होने का आह्वान.


उत्तराखंड के इतिहास में हम ऐसी जगह पर खड़े हैं जहां उत्तराखंड का दलित समाज डर और खौफ़ के साए में जीने पर मजबूर है। उत्तराखंड में लगातार पिछले कुछ वर्षों में दलितों पर दमन की खबरें आ रही हैं। जन आंदोलनो के राष्ट्रीय समन्वय की ओर से आज “उत्तराखंड में बढ़ते दलित अत्याचार: आगे की राह” विषय पर चर्चा का आयोजन किया गया। जिसमें देहरादून के विभिन्न जनसंगठन प्रतिनिधिक रूप में साथ आये।

लंबे मंथन के बाद तय किया गया कि


–दलितों को ऐसे ही नहीं छोड़ा जाएगा। इन घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो उसको रोकने के लिए उनके संघर्ष में सभी साथ होंगे।
–30 जून को “उत्तराखंड में दलित अस्मिता” के प्रश्न पर राज्यभर के समाज कर्मी व जनसंगठनों को बुलाया जाएगा।

गांधी मैदान में हुई बैठक में शामिल हुए साथियों ने बहुत आक्रोशित स्वर में दलित अत्याचारों की मुद्दे उठाए।
प्रमुख वक्ता रहे—-मनीष, प्रिया, कुमारी शीला व राजेश कुमार- जन हक मंच, संदीप -उत्तराखंड समाज सेवा, सुशील गौत- भीम आर्मी, विमल भाई व जबर सिंह वर्मा – राष्ट्र सेवादल व जन आंदोलनो के राष्ट्रीय समन्वय, दलीप चंद्र आर्य, वीरेंद्र वर्मा, डॉ जितेंद्र भारती व भार्गव चंदोल-सामाजिक कार्यकर्ता, कैलाश – परिवर्तन कामी छात्र संगठन, जयकृत कंडवाल-पीपुल फोरम, कु0 विमला, शकुंतला गुंसाई व गीता गैरोला- महिला मंच, आशीष छाछर आदि

उत्तराखंड आंदोलन के समय टिहरी जिले के निर्भीक पत्रकार स्वर्गीय कुवंर प्रसून ने कहा था कि यह आंदोलन दलित विरोधी है। आज दलित बेटियों से बलात्कार व हत्या जैसी लगातार हो रही घटनाओं ने हमें कुवंर प्रसून की दी गई हिदायत पर सोचने के लिए मजबूर किया है।
आज दलित अस्मिता के सवाल पर नये सिरे से बात करने की जरुरत है।
बलात्कार जैसी घ्रणित कार्य मे भी पंचायत बुलाकर समझौता कराने की कोशिश की जाती हैं जिसका पैसा भी बाद में नहीं दिया जाता।
30 मई को 9 साल की बिटिया को लेकर उसकी मां 8 किलोमीटर अकेले दौड़ती रही। और उच्चजाति के गांव के लोग उसका पीछा कर के उसको वापस लौटने के लिए दबाव बनाते रहे। मगर वह रुकी नहीं तब जाकर केस दाखिल हो पाया। इसके बाद भी लंबी लड़ाई चली और 11वे दिन जाकर बिटिया का 164 का बयान दर्ज हो पाया। केस में बहुत अनियमितताएं की गई है।
दलित अत्याचार ऐसे समाप्त उसकी समाज में गैर बराबरी की बात और परंपरा को कैसे समाप्त किया जाए ताकि समाज में दलित वर्ग को उनके हक मिल सके? सबसे बड़ी बात उनके सम्मान की रक्षा हो सके।

घटनाएं पहले भी होती थी पर अब सामने आ रही हैं। यह प्रतिरोध की शुरूआत है। उत्तराखंड को कैसे देव भूमि कहां जाए या माना जाए? विजय गौड़ की कविता है ” पहाड़ो में देवता नहीं चरवाहे रहते हैं” । समाज में जब अशांति है तो हम शांति शांति कैसे कह सकते हैं? हर तरफ पाखंड है शांति कैसे कहे?

गलती सोच के स्तर पर है। गलत सोच का विरोध हर स्तर पर होना चाहिए। मुसलमान से नफरत, दलितों से नफरत? यह नफरत कहा ले जाएगी? मात्र निर्भया फंड बनाने से काम नहीं चलेगा। हमें एकजुट होकर दबाव बनाना पड़ेगा। हम अन्याय नहीं बर्दाश्त करेंगे। एक साथ आकर लड़ने की जरूरत है। बाबा साहब के नाम पर हजारों संगठन हैं। मगर मुश्किलें है कि sc st एक्ट में 100 में से 2 मुकद्दमे भी दर्ज नहीं होते। पीड़ित का चारों तरफ से दवाब, बहिष्कार होता है और दलित हारकर चुप बैठ जाता है।

बैठक के बाद में एक प्रस्ताव पारित करके दलित अस्मिता के साथ एकजुटता घोषित की गई।

“हम उत्तराखंड के जौनपुर इलाके के में नो वर्षीय बिटिया के साथ हुई इस है हैवनाक बर्बादी की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं। हम कुछ दिन पहले विवाह में साथ बैठकर खाना खाने के कारण से युवक जितेंद्र की हत्या की निंदा करते हैं।
उत्तराखंड में जगह-जगह दूर गांव में, शहरों में हो रहे दलित अत्याचार कि हम पूरी तरह से निंदा करते हैं।
हम मानते हैं कि दलितों का उत्तराखंड राज्य में बराबर का हिस्सा है। उनको प्रताड़ित करना, उनको इंसान ना समझकर बहुत आसानी से उनके साथ कोई भी अपराध कर लेना और फिर उसको बड़े लोगों की पंचायत में दबा देने की परंपरा का हम पूरी तरह निषेध करते हैं।


उत्तराखंड की इतिहास में यह काले पन्ने है हम इसका न केवल निषेध करते हैं बल्कि भविष्य में ऐसा ना हो उसके लिए एक रणनीतिक संघर्ष का भी आह्वान करते हैं।”

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय,
कांडी खाल, केंपटी फॉल, टिहरी गढ़वाल

कु0 शीला, जबर सिंह वर्मा, विमल भाई, रीना कोहली, राजेश कुमार

9927145123, 9718479517

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