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छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने कल धरना स्थल से वापस होने पर यह बयान दिया कि जो वन विभाग डिपोजिट 13 के लिये 2018 में पेड़ काटने की अनुमति देता हैं वही विभाग 2019 में इसकी जांच की बात करता है ,यह विडम्बना ही है .इससें क्या होने वाला है

पूरा बयान निम्न हैं.

आलोक शुक्ला ने कहा कि पहला आदेश आज दिनांक 11 जून 2019 प्रधान मुख्य वन संरक्षक द्वारा – — 13 नंबर डिपॉज़िट में पेड़ो की कटाई की जांच करने के लिए, दूसरा देश प्रधान मुख्य वन संरक्षक द्वारा दिनांक 11/1/18 को —– डिपॉज़िट 13 में 25000 पेड़ काटने की अनुमति दी गई थी.. कटाई का आदेश, जांच का आदेश और जांच करने वाले एक ही विभाग। इससे कुछ निकलेगा नही ।

जांच इस बात की होनी चाहिए कि आदिवसियों के देवता का स्थान नंदराज पहाड़ पर लोहा उत्खनन के लिए वन स्वीकृति किस आधार पर दी गई

जबकि प्रभावित ग्रामसभाओं ने कभी भी नियमानुसार प्रक्रिया के तहत ग्रामसभा में सहमति नही दी बल्कि विरोध में सात प्रस्ताव दिए और वनाधिकर मान्यता कानून 2006 की धारा 5 ग्रामसभा को अपने जंगल जमीन , जैवविविधता संस्कृति के संरक्षण का अधिकार सौंपता हैं ।

moef का वर्ष 30 जुलाई 2009 के आदेश के तहत किसी भी वन भूमि का डायवर्सन नही हो सकता जब तक वनाधिकारों की मान्यता की समाप्ति और ग्रामसभा की लिखित सहमति नही होती।

वन भूमि के डायवर्सन की प्रक्रिया वन विभाग के द्वारा चलाई जाती है और वनाधिकार मान्यता कानून के कंप्लाइन्स की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर की होती है । इन दोनों प्रतिवेदन के बाद राज्य सरकार की अनुशंसा के बाद केंद्रीय वन मंत्रालय द्वारा स्टेज 1 और स्टेज 2 अर्थात अंतिम स्वीकृति मिली। इस स्वीकृति के बाद राज्य सरकार ने वन भूमि (डायवर्सन) अधिनियम 1980 की धारा 2 के तहत अंतिम आदेश जारी किया है और फिर वन विभाग ने पेड़ कटाई का आदेश जनवरी 2018 में जारी किया ( ये सारी प्रक्रिया राज्य में रमण सरकार और केंद्र में मोदी सरकार के समय हुई थी)

इस प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए और गलत पाए जाने पर राज्य सरकार के पास पूरा अधिकार है कि वह धारा 2 के अंतिम आदेश को वापिस ले सकता है ।

डिपॉजिट 13 की वन स्वीकृति के प्रस्ताव को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने वर्ष 2011 में इस आधार पर खारिज कर दिया था कि यह वन क्षेत्र दखलरहित और उच्च जैव विविधता वाला हैं, परंतु इसी क्षेत्र में 22 -23 सितंबर 2014 को वन सलाहकार समिति इसे स्टेज 1 की स्वीकृति प्रदान कर देती हैं।

पहाड़ पर वन और जैव विविधता में कोई परिवर्तन नही आया फिर राज्य सरकार द्वारा 2014 में ऐसे कोन से दस्तावेज भेजे गए कि समिति ने स्वीकृति जारी कर दी ।

दल असल यह स्वीकृति जानकारियों को छुपाकर हुई । वन स्वीकृति के प्रस्ताव में ( तीसरी तस्वीर में 17 नंबर बिंदु) वन क्षेत्र से संवंधित जानकारी छुपाई गई जैसे पहाड़ पर आदिवसियों के देव स्थल नादराज का स्थान है दस्तावजे में ऐसी जानकारी के सामने नहीं लिख दिया गया।

इसे कहा जाता है अस्वीकृतियों को स्वीकृतियों में बदल देना । वर्ष 2014 से ऐसी कोन सी ताकत काम कर रही थी जिसने इतने महत्वपूर्ण वन क्षेत्र में स्वीकृति हासिल कर ली????

राज्य सरकार को सही दिशा में कार्यवाही आगे बढ़ाना चाहिए .

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