विश्व पर्यावरण दिवस : सरकारों द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की जगह मिथकीय भटकावों की ओर जाने से यह संकट गहराया है. : नंद कुमार कश्यप .

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नंद कुमार कश्यप

हम प्रत्येक वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं, परंतु उसके साथ ही यह भी सच्चाई है कि उपभोक्ता वादी व्यवस्था के चलते हमारी ऊर्जा खपत बढ़ने से पृथ्वी गर्म हो रही है और धीरे धीरे यह संकट बढ़ता ही जा रहा है। आवश्यक जंगलों को बचाने की जगह समारोह पूर्वक वृक्षारोपण कार्य में करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं परंतु उनके रखरखाव के अभाव में वे नन्हे पौधे वृक्ष नहीं बन पाते। दूसरी ओर लोग एक दिनी समारोह के बाद प्रर्यावरण की चिंता छोड़ देते हैं।

वास्तविकता यह है कि आज का संकट वृक्षारोपण की औपचारिकताओं से बहुत बड़ा है। हमारे देश की आबादी की तुलना में शुद्ध जल बहुत सीमित है और हिमालय क्षेत्र के बाद विशुवत (कर्क रेखा क्षेत्र) रेखा के वनों से निकलने वाली नदियां शुद्ध जल का मुख्य स्रोत हैं। परंतु आज विभिन्न खनिजों के खासकर कोयले और बाक्साईट के दोहन के लिए इन वनों को काटा जा रहा है। नतीजा यह है कि एक ओर मध्य और मध्य पश्चिम भारत में तापमान पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते जा रहा है और पेयजल का भीषण संकट खड़ा हो गया है।

सरकारों द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की जगह मिथकीय भटकावों की ओर जाने से यह संकट गहराया है। दुनिया की ओर देखें तो जिन देशों में आस्था के ऊपर वैज्ञानिक दृष्टिकोण है वहां की नदियां साफ सुथरी हैं और वहां पानी का संकट नहीं है लेकिन जहां विज्ञान पर आस्था और मिथक हावी है वहां नदियां कचरे के ढेर में बदल गई हैं और जंगल नष्ट हो रहे हैं। इसलिए आइए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हमारे प्रर्यावरण के लिए सोचें।


पृथ्वी को ठंडा रखने में उष्ण कटिबंधीय जंगलों की भूमिका और उत्तरी छत्तीसगढ़ के घने जंगल
Ecosystem restoration is the alpha and omega of managing this little spaceship we call Earth.
We lose an acre and half of every forest, every second. Almost 15 billion trees a year.


जैसा कि हम सभी जानते हैं वृक्ष दिन में आक्सीजन छोड़ते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड खींचते हैं। पृथ्वी के गर्म होने के बड़े कारणों में एक ग्रीनहाउस गैसों का अति उत्सर्जन और लगभग प्रति सेकेंड डेढ़ एकड़ जंगलों की कटाई है, मतलब साल भर में लगभग 15 अरब वृक्षों की कटाई। एक ओर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और दूसरी ओर जंगलों की कटाई,इसने पृथ्वी के पर्यावास को ही असंतुलित कर दिया है। मार्च 2017 में ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि जंगलों की भूमिका सिर्फ कार्बन अवशोषण तक सीमित नहीं है वरन् वे पृथ्वी की सतह और वातावरण के बीच जल और उर्जा संचरण को भी नियंत्रित करते हैं इसलिए जंगलों को बचाना अति आवश्यक कर्त्तव्य है।


(Trees impact climate by regulating the exchange of water and energy between Earth surface and the atmosphere,an important influence that should be considered as policymakers contemplate effort to conserve forested land , said the author’s of an international study)


इस अध्ययन के शोधकर्ताओं ने पाया कि एक ओर ये उष्णकटिबंधीय जंगल भूमध्य रेखा की ओर की धरती को बड़ी मात्रा में ठंडा करते हैं तो वहीं दूसरी ओर ऊपर ध्रुवों की ओर के वातावरण को गर्म रखते हैं।यह इस बात की तस्दीक करता है कि उष्ण कटिबंधीय वन पृथ्वी के एयरकंडीशनर हैं। यद्यपि उष्णकटिबंधीय मिश्रित वर्षावन पूरी पृथ्वी के 7% भूभाग में है परंतु वह पृथ्वी के 50% वन और जैव विविधता को धारण करते हैं, साथ ही विश्व के दो तिहाई सूक्ष्म जीव जंतुओं को, लगभग 30 लाख प्रजात के जीव जंतु इन वनों में पाए जाते हैं.


आइए जानें कि उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र क्या है और उनका ऐतिहासिक महत्व क्या है।ट्रापिक या विषुवत रेखा पृथ्वी पर वो काल्पनिक रेखाएं हैं जिन्हें सूर्य की गति और ताप वितरण मापने के लिए 2000 साल पहले नाम दिया गया था।उत्तरी गोलार्ध में कर्क रेखा और दक्षिणी गोलार्ध में मकर रेखा। ये रेखाएं भूमध्य रेखा से लगभग 23.5 डिग्री पर हैं। चूंकि सूर्य भी अपने अक्ष से 23अंश झुका हुआ है इसलिए विषुवत रेखाओं पर सूर्य पूरे वर्ष अपनी रोशनी और गर्मी देता है। लगातार रोशनी और फोटो सिंथेसिस ने करोड़ों वर्षों में इन क्षेत्रों में सघन वन विकसित किए जिसके कारण पृथ्वी का तापमान जीवन के अनुकूल हुआ, और जो आज तक बना हुआ है। मकर रेखा से लगे हुए अमेज़न के जंगल और नदी विशव ट्रापिकल जंगल का सबसे बड़ा क्षेत्र है जो दो महाद्वीपों तक फैला हुआ है। अमेज़न के जंगल जहां 55 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं वहीं अमेज़न बेसिन 70लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।


भारत में कर्क रेखा देश के लगभग बीचों-बीच पार करती है। उत्तर पूर्व में मिज़ोरम के चंफई 23.45°अक्षांश , त्रिपुरा के उदयपुर 23.53°अक्षांश नदी गोमती, बंगाल कृष्ण नगर 23.4° अक्षांश जलंगी नदी, झारखंड लोहरदगा 23.43°अक्षांश कोएल नदी, छत्तीसगढ़ सोनहत 23.47°अक्षांश हसदेव नदी, मध्यप्रदेश शाजापुर 23.43°अक्षांश पार्बती नदी कालीसिंध बेसिन, राजस्थान कलिंजर 23.43°अक्षांश माही नदी एवं गुजरात जसडन 22.03°अक्षांश माही नदी कर्क रेखा को दो बार पार करती है वह मध्यप्रदेश के धार झाबुआ से होते हुए राजस्थान के बांसवाड़ा से लौटते हुए गुजरात के जसडेन से होते हुए अरब सागर में मिलती है। गुजरात से छत्तीसगढ़ के सोनहत तक कर्क रेखा के क्षेत्र न सिर्फ सघन वन क्षेत्र हैं वरन् यह आदिवासी बहुल इलाके भी हैं।

सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के अमरकंटक से नर्मदा और सोन जैसी दो राष्ट्रीय नदियों के साथ साथ अनेक छोटी बड़ी नदियां निकलती हैं जिनमें हसदेव अहिरन आदि महत्वपूर्ण नदियां हैं। छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य क्षेत्र सघन वन क्षेत्र है है। इसके साथ ही साथ यह क्षेत्र देश के मानसून की प्रगति के लिए बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। छत्तीसगढ़ दक्षिण पश्चिम मानसून के मध्य, उत्तर, उत्तर पश्चिम भारत की ओर जाने का प्रवेश द्वार है।हम जानते हैं कि सूर्य किरणें कर्क रेखा पर जून में सीधी पड़तीं है, और उसके आसपास के तापमान को यही सघन वन कम रखते हैं। अमरकंटक क्षेत्र में बाक्साईट और हसदो अरण्य क्षेत्र में कोयले के खनन से इस क्षेत्र के वनों का बड़ा हिस्सा काट दिया गया इस कारण क्षेत्र का मई जून महीनों का तापमान पिछले 25 वर्षों में औसतन 5°सेल्सियस से ज्यादा बढ़ा है।

हम यह भी जानते हैं कि यदि सतह का तापमान बढ़ता है तो उपरी हवा काफी ऊंचाई तक पहुंच मानसूनी बादलों को आगे उड़ा ले जाती है। उत्तर छत्तीसगढ़ के वनों के विनाश से न सिर्फ बड़ी नदियां मर जाएंगी ,बड़ी संख्या में आदिवासियों का विस्थापन होगा वरन् मानसून के बादल छत्तीसगढ़ मध्य भारत छोड़कर सीधे हिमालय क्षेत्र में कहर बरपा रहें हैं। इसलिए यह जरूरी है कि सरकारें और योजना बनाने वाले लोग हसदेव अरण्य क्षेत्र का व्यापक अध्ययन कर देश के प्रर्यावरण को केंद्र में रखकर योजना बनाएं और तब तक इस क्षेत्र में नये खनन की अनुमति नहीं दें। बिलासपुर शहर भी 22.8° अक्षांश पर बसा हुआ है इसलिए आसपास के जंगलों के कटने और शहर के भीतर 100 पुराने सिरिस के पेड़ कटने से लगभग 10 करोड़ लीटर सतही भूजल से वंचित हो गया। इसलिए आज बिलासपुर शहर का तापमान लगातार बढ़ रहा है और शहर पानी के संकट से जूझ रहा है।

नंद कुमार कश्यप , पर्यावरण विद् .

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