एक व्यक्तित्व : जब्बार भाई हमसे अलग नहीं हो सकते.- गणेश कछवाहा

जब्बार भाई के युवाकाल का फोटो.

मैं जब भी बिलासपुर अपने पैतृक निवास जाता स्टेशन पर जब्बार भाई दोनों हाथ जोड़कर स्वागत करते मेरा लगेज खुद उठा लेते आदर पूर्वक विनम्रता से बोलते भाई साहबै बहुत दिनों बाद आये । काकी कैसी है?(हमारी माँ को बिलासपुर घर में सभी काकी कहते हैं)घर में सब अच्छे हैं न।आप आते हैं तो अच्छा लगता है।जब्बार की बातों से ऐसा लगता मानो मेरा भाई मुझसे बात कर रहा है।

बिलासपुर में हमारे बड़े भाई श्यामलाल जी परिवार के सबसे विश्वसनीय, ईमानदार, ज़िम्मेदार व कर्तव्यनिष्ठ सदस्य है जब्बार मियां।श्यामलाल जी अपने दो भाइयों से ज्यादा विश्वास जब्बार पर करते थे।कभी पूरी दुकान तो कभी मकान अकेले जब्बार के भरोसे छोड़ देते थे।श्याम भाई का शायद कोई बच्चा हो जिसे जब्बार अंगुली पकड़कर चलना न सिखाया हो। उनके बच्चों के बच्चों को गोद में न खिलाया हो। उन्हें स्कूल ले जाना स्कूल से घर लाने का काम भी जब्बार के विश्वसनीय कंधो पर था।शायद उस परिवार की दूसरी पीढ़ी तक के साथ जब्बार भाई का गहरा आत्मीय संबंध रहा ।उन्हेंअंगुली पकड़ कर चलाना, गोद मे उठाना,कंधों में बैठाकर खेलना-खिलाना तथा परिवार के आदर्शों एवं संस्कारो को समृद्ध करते हुए रिश्ते और संबंधों जीना। वास्तव में जब्बार उस परिवार का अहम अभिन्न हिस्सा बन गये थे।

मुझे याद है जब बड़े भाई श्याम लाल जी तबियत बहुत खराब हो गई थी उन्हें हैदराबाद ले जाने की तैयारी चल रही थी जब्बार के आंखों में आंसू आ रहे थे।उनका दिल अज़ीज उनका बड़ा भाई उनसे दूर जा रहा है।उनके मौत के बाद जब्बार आधा टूट सा गया। बच्चों ने भी जब्बार का पूरा ध्यान रखा और बेहद सम्मान भी देतें थे।

“जब्बार” का उस परिवार के साथ एक इंसानियत भरा पवित्र मानवीय रिश्ता था।जो किसी मज़हब और सियासत से ज्यादा बड़ा, पाक और साफ है।सियासत और मज़हब यहां दम तोड़ देती है।केवल जिंदा रहती है इंसानियत।और यही मानव सभ्यता की सबसे बड़ी सच्ची और पवित्र धरोहर है।इसे बचाने और समृद्ध करने की जरूरत है।
सियासत और मज़हब कुछ भी हो पर “जब्बार “को कोई हमसे अलग नहीं कर सकता।यही हिन्दोस्तान की मिट्टी की खूबसूरती और महक है।”सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।”

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