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25 मई 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिला के नक्सलबाड़ी गांव से भूमिहीन गरीब किसानों ने एकजुट होकर पूंजीपतियों और जमींदारों के क्रूर व्यवाहर के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। यह चिंगारी नक्सबाड़ी के रूप में पूरे देशभर में फैल गई। कानू सान्याल, चारू मजुमदार, जंगल संथाल, सोरेन बोस, खोखन मजुमदार, केशव सरकार, शांति मुंडा जैसे नेताओं ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। जब 1962 में जोतदारों पर पूंजीपतियों व जमींदारों का अत्याचार नक्सलबाड़ी क्षेत्र में बढ़ने लगा तब गरीब भूमिहीन किसानों ने अपना अधिकार को लेने के लिए सड़क पर उतर पड़े।

24 मई 1967 को बेंगाइजोत गांव में गर्भवती आदिवासी महिला को पुलिस सब इंस्पेक्टर सोनम बाग्दी द्वारा लाठी मारकर हत्या कर दी गई थी। उसके बाद हिंसक भीड़ ने सब स्पेक्टर को मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद 25 मई 1967 दोपहर बेंगाइजोत नक्सलबाड़ी में जब निहथ्थे महिलाओं का जथ्था सभा के लिए जा रहा था। पुलिस ने गोलीबारी कर दी जिसमें एक पुरुष, आठ महिलाए और दो महिलाओं के पीठ पर बंधे दो बच्चे भी मारे गए। उसके बाद यह आंदोलन पूरे राज्य में नक्सलबाड़ी आंदोलन के रुप में प्रारंभ हो गया।


नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन के 52वें साल पर शहीद साथियों को बेंगाइजोत नक्सलबाड़ी स्थिति शहीद वेदी पर सलामी देने अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा के उपाध्यक्ष कॉमरेड डी एच पुजार(कर्नाटक) महासचिव कॉमरेड प्रदीप सिंह ठाकुर (पश्चिम बंगाल), सचिव कॉमरेड तेजराम विद्रोही (छत्तीसगढ़), कोषाध्यक्ष कॉमरेड शंकर (ओडिसा), केंद्रीय कमेटी सदस्यगण कॉमरेड बिरेन सरकार, गौर बैद्य, परितोष दास सहित नक्सलबाड़ी क्षेत्र के आंदोलनकारी उपस्थित रहे।

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