जो सबसे ज्यादा परेशान है वह तो मोर्चे पर डटा है। जो उतनी मुश्किल में नहीं है वह परेशान बैठा है, “लुट गए रे-मर गए रे- अब तो कच्छु नहीं होगो रे” के वृंदगान में सुर मिला रहा है, हारी हारी सी बातों से वातायन भर रहा है ।


● अब अगर वे इतने गहरे अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचे होंगे तो कुछ तो वजहें रही होंगी । वास्तविक न सही आभासीय होंगी । हालांकि इतिहास में अक्सर ऐसा भी हुआ है कि हवा में मची घुटन या आसमान में किसी खास कारण से छाए कुहासे को ही धरातल का सच मान लिया गया और नतीजे में जो किया जा सकता था वह भी नही किया जा सका या न करने के “ठोस” बहाने तलाश लिए गए ।


● ये सब – इनमे से ज्यादातर – भले लोग हैं। छिटक गई चाशनी पर भिनकती मख्खियां नही हैं । मूलतः अच्छे लोग है। इन पर सच्ची में (इनकी उम्र के हिसाब से) स्नेह, आदर, लाड उमड़ता है।
● इन प्यारे इंसानों को अर्पित है

सरोज_जी का एक गीत ;

तुम ने शायद दुनिया को देखा ही नही करीब से
इसीलिए बातें करते हो हारी हारी ।

देखी केवल भीड़ और हिम्मत खो बैठे
रचे रचाये मन की सब मेहंदी धो बैठे ।
मुस्कानों की फसल उगेगी भी तो कैसे
जब सपनों के खेतों में आंसू बो बैठे ।

मौन मुखर करने के लिए किसी मूरत का
इतना ढालो नेह डूब जाये मंदिर की बाराद्वारी


लहरों की इन बातों में कुछ सार नही है
इस अपार पानी का कोई पार नही है।
क्योंकि नाव कोई कोई देखी ऐसी भी
जिसे डुबाने कोई भी तैयार नही है ।

बहने वाला हो तो ये मंझधारों में क्या है?
आगे आगे हाथ पकड़ खुद चलती है आंधी बेचारी ।


लगी बुरी होती है कैसे काम न होगा
और बहुत से बहुत तुम्हारा नाम न होगा
चलती जब तक सांस समय का साथ निबाहो
जीवन तो कमसेकम फिर बदनाम न होगा ।

कैसे संभव जहां तुम्हारा गिरे पसीना
वहां उतर कर चांद न आये करने को आरती तुम्हारी ।

तुम ने शायद दुनिया को देखा ही नही करीब से
इसीलिए बातें करते हो हारी हारी ।

मुकुटबिहारीसरोज

(26 जुलाई 1926- 18 सितंबर 2002)