Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

 

टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (टीएचडीसी) के महा प्रबंधक ने हाल ही में जो ब्यान दिए हैं। उन्हीं के संदर्भ में माटूजन संगठन उनसे पूछना चाहता है कि यादें टिहरी व कोटेश्वर बांध से प्रभावितों को आज भी पुनर्वास के लिए ऐसा क्यों नही दे रही। जबकि  2001 के ऑफिस मेमोरेंडम के तहत  टीएचडीसी को यह निर्देश था कि पुनर्वास के लिए जब भी जरूरत होगी वह पैसा देगी। जो टिहरी व कोटेश्वर बांध के प्रभावितों के लिए नहीं कर रहे वैसे ही बातें अब विष्णुगाड-पीपलकोटी के संदर्भ में बांध प्रभावितों के लिए किए जा रहे हैं।

टीएचडीसी एक ही कंपनी है जो टिहरी बांध व कोटेश्वर बांध बना चुकी और अभी विष्णुगढ़ पीपलकोटी बांध विश्व बैंक के पैसे से बना रही है। राज्य को जिस 12% मुफ्त बिजली देने की वह बात कर रहे हैं, 1% बिजली विस्थापितों को और 100 यूनिट बिजली प्रतिमाह प्रभावितों को देने की बात है हम प्रमाणित कर सकते हैं कि यह बातें आज तक जमीन पर नहीं उतरी हैं बांध प्रभावितों को इनके कोई लाभ नहीं पहुंचे।मात्र अपनी तथाकथित छवि सुधारने के लिए वे ऐसा कह रही है। 

ज्ञातव्य है कि केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय की सन 2006 और 2008 की नीतियों के अनुसार राज्य को 12% बिजली पर्यावरण और पुनर्वास की समस्याओं को दूर करने के लिए दी जाती है। टिहरी  बांध के उद्घाटन के समय तत्कालीन ऊर्जा मंत्री सुशील शिंदे जी ने 1% लाभ अलग से और 100 यूनिट बिजली प्रभावितों को देंने की घोषणा की थी। 

बाद में केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने नीति बनाई। जिसमें राज्य भी अपने हिस्से की ओर से 1% लाभ जोड़ते हुए स्थानीय क्षेत्र विकास कोष बनायेगा, जिसमें प्रभावितों की आजीविका वृद्धि के लिए काम हो सके। 100 यूनिट बिजली प्रत्येक प्रभावित परिवार को 10 वर्षों तक दी जाएगी या उसका पैसा उसके बराबर पैसा या दोनों ही दिए जाएंगे।

ऊपर लिखी नीतियों में से एक भी जमीन पर नहीं उतर पाई। टिहरी व कोटेश्वर बांध से प्रभावित इनमें से किसी भी नीति से आज तक लाभ नहीं ले पाए हैं। टिहरी बांध प्रभावितों के थोड़े थोड़े से छोटे छोटे से काम भी पैसे की कमी के चलते रुके पड़े हैं। बांध बनने के 13 साल बाद भी भागीरथी व भिलंगना नदी में डूबे 10 पुलों के बदले बनने वाले पुल नहीं बन पाए। टिहरी बांध का जलाशय भरने के बाद जो गांव पहले आंशिक रूप में माने गये थे। बाद में वहां धसान, भूस्खलन, मकानों में दरारें आदि आ रही है। उनके लिए राज्य सरकार ने एक सम्पाशर्विक नीति बनाई। मगर टीएचडीसी ने उसको उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। नतीजा है कि झील किनारे के इन लगभग 40 गांवों में धसान भूस्खलन जारी है। मगर उनका नीति ना होने की वजह से मुआवजा और पुनर्वास नहीं हो रहा है। दोनों ही बांधों से प्रभावित विस्थापितों की पुरानी समस्याएं तो हल नहीं हो पाई बल्कि नई-नई समस्याएं और खड़ी हो गई हैं। ग्रामीण पुनर्वास स्थलों में पेयजल, स्कूल, स्वास्थ्य, परिवहन आदि समस्या है नहीं हो पाई है। 

विष्णुगाड- पीपलकोटी बांध में ही टीएचडीसी ने और उसकी ठेकेदार कंपनियों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 80 लोगों पर विभिन्न तरह के मुकदमे किये हुए हैं। हरसारी व गांव के लोगों लोगों पर से न्यायालय ने यह मुकदमा खारिज किए हैं 2010 से बांध का काम शुरू करने वालीटीएचडीसी जब से इस क्षेत्र में आई लोगों ने अपनी समस्याओं के लिए बात उठाई। उन्होंने धरने किए, प्रदर्शन किए, आवेदन किए। पर जब बात नहीं सुनी गई तब लोगो ने बांध का काम रोका। जिसका सहारा लेकर उन पर तुरंत मुकदमे थोपे गए। यानी लोगों पर नई मुसीबत डाली गई। इससे लोगों की आर्थिकी और कमजोर हुई।


आज भी कमजोर कथा बिना भूमि देने वाली पुनर्वास नीति और उसके लागू ना होने के कारण हॉट गांव के सभी लोग विस्थापित नहीं हो पाए हैं।

 
हरसारी तोक के लोग 14 साल से पहले यह मांगे करते आए हैं:-


-गैरकानूनी रूप से हो रही अत्यधिक मात्रा की ब्लास्टिंग रोकी जाए ताकि हमारे घरों, जलस्रोतों, खेती आदि पर कोई नुकसान न हो।
– हमें आज तक किए हुए नुकसानों का मुआवजा, फसल मुआवजा, सूखे जल स्रोतों और मकानों की दरारों की भरपाई टीएचडीसी द्वारा तुरंत की जाए।
– हमें इस बात की गारंटी दी जाए कि परियोजना से हमारे जीवन व आजीविका पर किसी भी तरह जैसे कि धूल, विस्फोटकों से कंपन, जल स्त्रोतों का सुखना जैसे असर नहीं पड़ेंगे

यह बात भी दीगर है कि टीएचडीसी बांध कॉलोनी और दफ्तर सियासैन गांव में जहां बहुत व्यवस्थित तरीके से बनाए गए हैं। दूसरी तरफ हॉट गांव के विस्थापित प्रभावितों को मजबूरन उनकी अपनी ही जमीन पर स्थापित होने को मजबूर किया गया। जहां किसी तरह का कोई योजनाबद्ध कार्य नहीं किया गया है। लोग पानी, सड़क, बिजली की समस्याओं के साथ वर्षा ऋतु में जलभराव की समस्याएं झेलते हैं।

टीएचडीसी ने पर्यावरण शर्तों का भी उल्लंघन ने किया है। 
सियासैन गांव के पास बांध कंपनी में सुरंग से निकलने वाले मलबे यानी मक को सीधा ट्रकों से नदी में डालना शुरू किया इस पर जो मुकदमा विमल भाई बनाम भारत सरकार दायर हुआ उसमे राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने टीएचडीसी पर 50 लाख का जुर्माना किया हुआ है और नदी में मक ना डालने तथा अन्य पर्यावरणीय संरक्षण संबंधी निर्देश जारी किए हैं। 50 लाख के जुर्माने को लेकर अभी टीएचडीसी
सर्वोच्च न्यायालय गई है। मगर यह तो जाहिर हो ही गया कि विश्व बैंक से समर्थित इस परियोजना में पर्यावरणीय शर्तों का उल्लंघन भी हो रहा है।

बेहतर होगा कि टीएचडीसी लोगों से झूठे वादे ना करें बल्कि पहले टिहरी बांध कोटेश्वर बांध में अपने वादे वादे पूरे करें।
हरसारी तोक के लोगों की मांगों को तुरंत पूरा करें।

विमल भाई,  नरेंद्र पोखरियाल, बृहर्षराज तड़ियाल

Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.