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 कभी धर्म का 'उद्विकास' प्राकृतिक शक्तियों के 'रहस्यों' को न समझ पाने से उस पर अलौकिकता का आरोपण और जीवन की अनिश्चितताओं से उत्पन्न त्रासदियों से 'मुक्ति' के लिए हुआ था. धीरे-धीरे धर्म का संस्थागत रूप सघन होता गया और यह अब 'मुक्ति' का नही,लोगों को बांधकर रखने की 'युक्ति' बनता गया. इसने सामन्तवाद को मजबूत आधार दिया तो साम्राज्यवाद को भी बढ़ावा दिया.कई देश, दूसरे देशों को जनता की 'सेवा' के लिए उपनिवेश बनाने लगें. 



इस 'सेवाभाव' में यह सोच काम करती रही है कि हमारा धर्म अन्य धर्मों से श्रेष्ठ है; और इसलिए इन 'पिछड़ो' की 'मुक्ति' के लिए धर्मांतरण आवश्यक है.इसका सर्वाधिक प्रभाव जनजातीय क्षेत्रों में पड़ा क्योंकि जनजातियों में 'धर्म' का अभी संस्थागत रूप उभर नही पाया था ; उनमे 'ईश्वर' मुख्यतः अभी प्राकृतिक शक्तियां ही थीं, उनके सहज विश्वासी जीवन को भरमाना अभी आसान था. उस पर सांसारिक जरूरतों के अभाव, संघर्षपूर्ण जीवन की कठिनाइयों ने 'मदद' करने वालों के राह को और आसान कर दिया.ये 'मदद' अवश्य कुछ हद तक आदिवासियों के लिए सकारात्मक साबित हुएं; कुछ जगह उन्हें सामंती उत्पीड़न से उन्हें कुछ हद तक मुक्ति मिली, उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवायें मिली जो कालांतर में उन्हें जागरूक और अधिकार सम्पन्न भी बनाया.मगर 'मदद' करने वाले अपने हितों के प्रति सचेत रहे हैं. वे मदद उसी हद तक करते हैं, जहां तक उनका हित सधता है; और कोई उनके हितों को आईना दिखाये तो उनका असली चेहरा दिखने लगता है, जो भयावह है.

 इधर पिछली सदी में आखरी दशक से जो धार्मिक पुनरुत्थान का दौर चला, उसके नियामकों का  ध्यान भी जनजातियों की तरफ गया. वे भी उन्हें 'मुक्त' करने को प्रयत्नशील हुए.अचानक उन्हे 'घर वापसी' का ध्यान आया. यह ध्यान तब न आता था जब वे भूख, बीमारी, अशिक्षा,बेगार से पीड़ित थें. आज भी उनका मुख्य ध्येय  'धर्म' और राजनीतिक जरूरत ही है, कल्याण नही.

  इन दोनों पक्षों के द्वंद्व के बीच आदिवासियों का अपना पक्ष सिरे से गायब रहता है. उनकी अपनी पहचान, संस्कृति, भाषा, विश्वास, पूजा पद्धति की बात कोई नही करता.क्यों जरूरी है कि वे ईसाई अथवा हिन्दू हों, वे आदिवासी ही क्यों नही रह सकते?

    तेजिंदर जी का उपन्यास 'काला पादरी' इस विडम्बना को  शिद्दत से उभारता है.उन्होंने छत्तीसगढ़(पहले मध्य प्रदेश) के सरगुजा-जशपुर क्षेत्र को उपन्यास के कथानक के लिए चुना है,जहां उरांव जनजाति पर मिशनरियों का प्रभाव काफी रहा है, और धर्मांतरण हुआ है.उपन्यास का मुख्य पात्र जेम्स खाखा  'काला पादरी' है.उसके दादा उरांव थें, जो तत्कालीन राजा के सामंती बंधन से जकड़े बेगार करते थें, मिशनरियों ने उसे बंधन से छुड़ाया, नयी जिंदगी दी, इसलिए एक पीढ़ी बाद जेम्स आज पढ़ा-लिखा पादरी है.जेम्स को इसलिए मिशनरी से सहानुभति है, और वह यीशु के शिक्षाओं का कायल है.वह मानता है यीशु मानवमात्र से प्रेम करना सिखाते हैं .मगर आज जब अकाल के कारण आदिवासी भूख से मर रहे हैं तो अनाज होने के बावजूद चर्च उन्हें बांट क्यों नही रहा है? इस द्वंद्व का पटाक्षेप विशपस्वामी के जवाब से हो जाता है "हमारा अपना इंट्रेस्ट हमारे लिये सबसे बड़ा है.वी हैव टू ब्रिंग मैक्सिमम पीपल इन अवर फोल्ड दैट इज अवर ड्यूटी फॉर व्हिच गॉड सेंट अस टू दिस अर्थ, इसके लिये अगर कुछ लोग भूख से मर जाते हैं तो यह भी प्रभु की इच्छा है".

 उपन्यास में पात्र कम हैं जेम्स खाखा, सोजेलिन मिंज,आदित्य, ब्रदर हरपाल, राय साहब आदि. जेम्स और सोजेलिन के बीच प्रेम का प्रस्फुटन उस बेचैन माहौल में ठंडी बयार के समान है. यहाँ जेम्स का सहज मानवीय रूप प्रकट होता है, पादरी का पद तो एक तरह से उस पर आरोपित है, जो उसका चुनाव नही था. जेम्स ही उपन्यास का केंद्रीय चरित्र है जिसे उपन्यासकार ने बखूबी उभारा है.उसकी सम्वेदना, करुणा, द्वंद्व पूरे उपन्यास में बिखरे हैं. वह 'काला पादरी' है, आदिवासी ईसाई है.धर्म परिवर्तन से उसके सारे समस्याओं का हल नही हो गया है. वह ईसाइयों में भी द्वितीयक है.वह दलितों में आ रही जागरूकता से वाकिफ है.आदित्य के साथ गांधी जी को लेकर उसकी तीखी बहस होती है.वह गाँधी जी को दलित विरोधी मानता है; आदित्य इसका प्रतिवाद करता है.

  ब्रदर हरपाल के चरित्र से मिशनरी में फैले चमत्कार वाद और पाखण्ड का खुलासा हुआ है जो 'अकाल में लोगों को चावल देने की जगह यीशु का चित्र दिखाते हैं'.भूख से मरते एक व्यक्ति का बैगा द्वारा 'उपचार' का चित्रण भी भयावह है.'राय साहब' इस क्षेत्र के 'राजा ' हैं. इस क्षेत्र के तमाम कारोबार, प्रशासन, बैंक, राजनीति में उनका दबदबा है. वे सत्ताधारी पार्टी से हैं. उनका अंतर्विरोध 'हिंदूवादी' पार्टी और संगठन से है,मिशनरी और उससे सम्बद्ध आदिवासियों से है. वे मिशनरी को वहीं तक महत्व देते हैं जहां तक उनका हित सधता है.

 आदित्य का चरित्र कथा के विकास में महत्वपूर्ण है. वह शहरी जीवन का अभ्यस्त, आदिवासी क्षेत्र में बैंक की नौकरी के लिये आया है. जेम्स से उसकी मित्रता हो जाती है.वह बैंक के क्रियाकलाप और जेम्स से बहस करते हुये इस भयावह स्थिति से वाकिफ होता है; उसका सम्वेदनशील मन इस व्यवस्था से घृणा करने लगता है.

 यह उपन्यास अकार में लघुता लिये अवश्य है, मगर कथा में अपूर्णता का अहसास नही होता. उपन्यासकार जो कहना चाहते प्रतीत हो रहे हैं,वह पूरी तरह अपने सभी आयामों में व्यक्त है.उन्होंने परिवेश, उसकी संस्कृति, उसके द्वंद्व का सार्थक चित्रण किया है,जिससे पाठक को कथा में स्वाभाविकता का अहसास होता है.पूरे उपन्यास में एक तनाव, एक आशंका पृष्टभूमि में व्याप्त है, जो जितना बाहर है, उससे कहीं अधिक पात्रों के अंदर है.उपन्यास जहां खत्म होता है वहां पाठकों के लिये एक स्पेस छूट जाता है,और एक द्वंद्व पाठक में व्याप्त हो जाता है. निश्चित रूप से यह तेजिंदर जी का महत्वपूर्ण उपन्यास है और जैसा कि उदय प्रकाश जी ने लिखा है "निश्चित ही इसकी एक अपनी ही जगह होगी"
तेजिंदर , प्रमुख साहित्यकार और लेखक

अजय चन्द्रवंशी
राजा फुलवारी चौक
वार्ड नं.09 कवर्धा(छ. ग.)
मो. 9893728320

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