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जी हा यह सच है की गौतम बुद्ध भी गोन्ड़ थे. . . कौनसे गोन्ड़ थे ? जाहिर है की वे माडिया गोन्ड़ थे .

लिन्गोवासी व्यंकटेश आत्राम इन्होने 30 साल पहले अपनी किताब “गोन्डी संस्कृतीचे सन्दर्भ” मे इसका जिक्र किया है और गौतम बुद्ध माडीया गोन्ड़ होने का पुख्ता सबूत दिया है . .उन्होने कहा की आप पहले जे एफ हेविट इनका कथन ध्यान मे ले. . .

उन्होने क्या कहा था अपनी “Ruling Races of Prehistoric Time” इस किताब के 159 इस पेज पर देखिए . . . .”गौतम की माँ ‘माया’ कपिलवस्तू इस नगरी का पुर्ववर्ती भाग रहे “कोईया” याने “कोलारिया” इस गाव की राहनेवाली थि. . .कपिलवस्तू याने कपिलवन्शिय लोगो का मूलस्थान है और यही गौतम के पिताजी का घराना था. . . इस अवतरण से आत्रामजी ने गोन्डी भाषा अध्ययन के अनुसार 6 चीजे बाहर निकाली और उसका विश्लेशण किया . . .आजतक उसे कोई चेलेंज नही कर पाया . . .इसपर पूना के एक मनुवादी ने बहस भी की थी आत्रामजी के साथ किंतु उस सरदेसाई नामक मनुवादी का कुछ नही चला . . .

निम्न 6 मुद्दे देखिए . .
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1) गौतम के माँ का ग्राम “कोईया” था
2) गौतम की माँ का नाम “माया” था
3) “कोईया” गाव मे “कोलारियन” लोग रहते थे
4) कोईया यह कपिलवस्तू नगरी का पुर्ववर्ती हिस्सा है
5) कपिलवस्तू यह “कोपाल वन्शिय” लोगो का मूलस्थान है
6) कोपाल वंश यह गौतम बुद्ध का घराना है .. .

1) अब देखिए कोई, कोया, कोईया, कोयतुर यह सारे सम्बोधन गोन्ड़ शब्द के लिए हजारो साल से प्रयोग मे लाये गये है . . . कोइया शब्द का अर्थ होता है गोन्ड़ (समाज) माता . . . गोन्ड़ लोग समाज को अपनी मा समजते है . . .जहा ज्यादातर गोन्ड़ लोग रहते है उसे कोइया कहते है . . .जब कोईया याने गोन्डो की बस्ती है तो जाहिर है की गौतम की मा गोन्ड़ थी.

2) गौतम बुद्ध के माता का नाम “माया” था . . . माया का मतलब गोन्डी मे समाजमाता होता है . . .मा+या इन दो शब्दो से माया बना . . .हम मतलब हम सब लोग इसे गोन्डी मे मराट, अमाट, आमोट कहते है . . . व्याकरण के अनुसार प्रथमपुरुशी शश्टी मे इसे हम “मावा” या ‘मा’ कहते है . . .

माँ के लिए गोन्डी मे आवाल, याया, अया, अवा, आया शब्दो का प्रयोग किया जाता है . . .मावा+आया, याया इन शब्दो को मिलकर गोन्डी मे “हमारी माता” इस रुप के लिए “माया” कहा जाता है . . .गोन्ड़ समाज के लई माया का घराना प्रतिष्ठित बना था. . .पुरा गोन्ड़ समाज माया को माता के रुप मे मानते थे. . .जब गौतम बुद्ध के माताजी का नाम ही गोन्ड़ शब्द से था तो आप इससे तर्क लगा सकते है . .

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3) कोईया गाव मे ज्यादातर कोलारियन लोग थे. . .ये कोलार या कलार नाम से भी जाने जाते है . . . गोन्डो मे “कल अरक” का मतलब होता है दारू छाननेवाले . . .कल याने दारू . . .गोन्डो मे कोलार गोन्ड़ नाम का भी एक गण है . . .कोईया मे उसवक्त बहुसंख्य कलार थे. . .
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4) कोइया ये कपिलवस्तू का हिस्सा है . . .मतलब कोई लोगो मे से ज्यादातर कोलार गण के लोग वहा ज्यादा रहते थे.

5) कोईया मे कोपालवन्शी लोग भी रहते थे याने गोन्ड़गवारी रहते थे. . . गोन्ड़गवारी को गोन्डी मे कोईकोपाल कहते है . . .गोन्डो के गायो की रक्षा करनेवालो को पालक या कोपाल कहते है . . .इन्हे मराठी मे गोवारी कहते है . . . इसका मतलब कपिलवन्शी घराना याने गोन्ड़गवारी घराना होता है . . .कोपाल ग्राम आगे कपिलवस्तू नाम से जाना जाता गया . . . कोपिलवस्तु का पाली मे कोपिलमत्थू होता है . . .इसमे कोय+पील+मत्तू यह तीन शब्द आये है . . .इसमे गोन्ड़ (कोय)+बालक(पील)+रहनेवाले (मत्तू)=कोयापिलमत्थू=कोपिलमत्थू=कपिलमस्तू=कपिलमच्त्थू=कपिलवस्तू ऐसे रुप बनते गये. .

6) उक्त सारी बातो से पता चलता है की गौतम कोपिलवन्श के राजकुमार थे. . . बौद्ध साहित्य मे गौतम बुद्ध के सात अवतार माने गये है . . .उसमेसे चौथा अवतार कोपाल गोत्र याने गोन्ड़गवारी गोत्र माना है . . .यह सुत्तपिटके दिघ निकाय पाली मे स्पष्ट किया है . . .वह निम्नप्रकार है, जिसमे गोन्ड़गवार का स्पष्ट उल्लेख किया गया है . .

“कक्कू सन्धो भिक्कवे भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो कोप्पो गोत्तेन आहोसी” भगवान बुद्ध के सात अवतारोमेसे तीसरा अवतार गोन्ड़ गोत्र का था ऐसा भिक्षुवर्य जगदिश कस्श्यपने प्रतिपादित किया है . . .

1) “विपस्सी भिक्खवे भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो कोन्ड़न्य गोत्तेन आहोसी”

2) सीखी भिक्खवे भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो कोन्ड़न्य गोत्तेन आहोसी”

3) “वेस्सभू भिक्खवे, भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो कोन्ड़न्य गोत्तेन आहोसी”
विद्वानोके मतानुसार क ख ग घ ये शब्द समानोच्चार से किये जाते है . . . कोन्ड़ और गोन्ड़ यह एकही शब्द है . . .मतलब कोन्डेन गोत्तेन याने गोन्ड़ गोत्र के ही गौतम थे. . . .

इसके साथ साथ चन्द्रिका प्रसाद इन्होने अपने बौद्धचर्या किताब मे दूसरे श्लोक मे “वदे कोन्ड़न्य सत्थार, वन्द मंगल नायक

2″ तथा 7 मे “कुकुसन्ध मुनिवन्दे कोया गननायकं, कस्सप सुगतं वन्दे वन्दे गौतमु महामुनी 7 ऐसा उल्लेख किया है . . . .इसमे कोयागण यह शब्द गोन्ड़गण इसी अर्थ से आया है . . .दूसरी बात यह है की और एक शब्द इसमे है जिसका अर्थ गोन्ड़ बन्धू ऐसा होता है . . . देखिए “गौतमु” . . . गौतमु इसका विग्रह करे जैसे गो+तमु=गौतमु. . . . यह शब्द कोतमु या कोतम शब्द का अपभ्रन्ष है . . . .कोतम मतलब कोया + तमु इससे आगे गोतमु बना . . . आप जानते है की बुद्ध शब्द के आगे गौतम शब्द आता है . . . यह नाम गौतम की माँसी गौतमी इनके नाम से आया है . . .गौतमी यह शब्द भी “कोयतमी” याने कोयत+अमी इन दो शब्दो का है . . . इसका मतलब गोन्ड़ माता है . . . गौतमी और कोतमी ये दोनो शब्द एक ही है . . .आगे गौतमी जैसा अपभ्रन्शित शब्द प्रचलन मे आया . . .देखे कैसे? कोयतमी, कोवतमी, गोवतमी और आखिरी मे गौतमी . . . याद रहे गौतम की माता माया की बहन का नाम गौतमी था. . .और माया मरने के बाद गौतम का पालन पोषण गौतमी ने किया था. .

इतिहासकार हमेशा कहते आये और कहते है के, “शाक्य नामक गनतन्त्र जनजाती मे लिछवी कुल मे इ.पू.563 मे गौतम बुद्ध का जन्म हुवा. . . इसमे दो शब्द आयि है

1) शाक्य और 2) लिछवी. . . . इन दो शब्दो के बारे मे आत्रामजी ने बडे ही खूबी से लिखा . . . गोन्डी मे माँसी को ‘कुच्चो’ कहा जाता है . . . . गोन्डी मे हजारो सालो से ये रिवाज है की अगर किसी लडके की माँ मर जाये तो उस लडके का पालन पोषण उसकी माँसी करती है और उसे माँसी का वंश प्रदान किया जाता है . . . . इस माँसीवंश को गोन्डी मे “कुच्चोवन्श” कहा जाता है . . . . गोन्डी मे काच्च से चाक्य और चाक्य से शाक्य यह अपभ्रन्शित शब्द तयार हुवा है . . . मतलब साफ़ है की जब गौतम शाक्यवंश के थे तो उनके पीछे उनकी माँसी गौतमी का योगदान है . . . मावंसीवंश के गौतम शाक्यवन्शी थे. . .

.दूसरा शब्द लिचवी है जिसे कुल के तौर पर प्रायोजित किया गया . .. गोन्डो मे मडावी, वाढिवा, भलावी, लेस्किवा, लेस्कावी ऐसे व कारान्त शब्द है . . . लेस्कावी इस गोन्डी शब्द का अर्थ होता है दिव्य शक्ति का चमत्कार कर्नेवाला . . . .

लेस्कावी या लेस्कावा यह शब्द लेस्किमाल इस क्रियापद से बने . . . लेस्क इस शब्द का गोन्डी मे अर्थ होता है दिव्य शक्ति का प्रचलन . . . गोन्डो का लेस्कावी गोत्रही आगे लिछवी गोत्र बना . . . .लेस्कावी का लिछवी यह अपभ्रन्ष है . . . .

आपको मालूम है की आत्राम गोत्र के अपना गोत्र कितने नाम से बदल चुके है . . . बस यही आत्राम पुराने लेस्कावी याने लिछवी गोत्र के है . . . .मतलब एकदम साफ़ है की जो आत्राम है अपना छुपाने के लिए चन्देकर भी बने उन्हे याद रहना चाहिए की हमारा हजारो साल पुराना गोत्र याने गोत्ता लेस्कावी मतलब याने लिछवी है . . . गोत्रनाम बदलने का कितना बडा नुकसान होता है ये आप जान लिए होंगे . . . .बदलो आपके गोत्रनाम . . . .बन जाओ और चान्देकर. . . . दे दो अपने आपको चाँद और चाँदनी का नाम . .. . . दोस्तो आगे की लेखमाला मे हम व्यंकटेश आत्रामजी की इसी किताब का और एक प्रकरणपर चर्चा करेंगे जिसका नाम मोरिय बुद्ध मोरिय गोन्ड़ और सालव्रुक्ष माहात्म्य रहेगा. . .

संकलन :- मारोती उइके, वर्धा

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