बुद्ध नए समाज के क्रांतिकारी : बुद्ध जयंती .

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उत्तम कुमार ,संपादक दक्षिण कोसल


साल 2016 में दक्षिण कोसल ने बुद्ध पर एक विशेष अंक निकाला था। शीर्षक था बुद्ध : समाज विज्ञान, व्यक्तिगत सम्पत्ति और राज्य और यही सच्चाई भी है कि जो व्यक्ति इन मोहमाया से ऊपर उठ गया वह बुद्ध यानी ज्ञान के करीब पहुंच गया। बुद्ध जयंती है हजारों सालों बाद आज भी लोग उन्हें याद करते हैं और उनके विरोधी उनके मूर्तियों को तोड़ता हैं। जो लोग बुद्ध को मानते हैं वे उपासक बन बैठे हैं ज्ञान पिपासु नहीं।

बुद्ध ध्यान के तपस्वी या मनोचिकित्सक नहीं बल्कि अंधकारमय समय में धार्मिक अंधविश्वास को उखाड़ फेंकनेवाला तर्कशास्त्री थे जो ज्ञान और सच को मनुष्य के सामने रखनेवाला महान व्यक्ति कहलाए। बुद्ध ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने भगवान को नकारा और  प्रतीत्य समुत्पाद जैसे दर्शन को रखा। अर्थात सभी वस्तुएं क्षण भर के बाद नष्ट हो जाती है और उनके बाद दूसरी नई वस्तु या घटना क्षण भर के लिए आती है अर्थात उत्पत्ति विछिन्न प्रवाह-सी है। उन्होंने कहा था कि मैं जो कुछ कहता हूं उसे ना माने और लोग जिसे कहते हैं उसे ना माने बल्कि जो आपका विवेक कहता है उसे माने । और इस विज्ञान को बहुत बाद में कार्ल मार्क्स  ने अपने दर्शन में व्यापक रूप देते हुए चेतना आधारित ज्ञान में बदल दिया। जिसे लोग द्वंद्वात्मक भौतिकवाद  के  रूप में हमारे समक्ष रखा।  इस तरह ज्ञान अपने सर्वाेच्च स्थान पर पहुंचा। दर्शन के हिसाब से समाज के बदलाव के साथ दर्शन में बदलाव होता रहता है और दुनिया को बदलने में बुद्ध और इस  युग में कार्ल मार्क्स की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने धार्मिक अंधविश्वास और ब्राह्मणवाद का विरोध किया था आज यह जाति और देशी विदेशी पूंजीवादी के विरोध का रूप ले लिया है। आज अगर भारत है और संविधान है तो इस पूरे घटनाक्रम में बुद्ध और कार्ल मार्क्स की भूमिका हैं। हां आज भी हिंदूवादी व्यवस्था के साथ फासीवाद के उन्मूलन में हमें दोहरे ताकत के साथ दर्शन का उपयोग हथियार के रूप में मानवतावाद के स्थापना में दिखानी होगी।


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