साहित्य के विधाओं में कहानी यथार्थ के चित्रण के लिए प्रसिद्ध है; यानी कहानी में यथार्थ को चित्रित करने की बेहतर संभावना और अवसर होता है.लेकिन समकालीन कहानियों में 'विमर्शों' का आतंक इस कदर है कि कहानियां या तो विचार-मात्र दिखाई देती हैं या अमूर्तन का शिकार हो रही हैं. आज कहानियों में जीवंत मानवीय संबंधों, समाज के विडम्बनाओं की मूर्तता, साधारण से दिखने वाले व्यक्तियों और परिवारों का चित्रण कम दिखाई देता है. आज कथाकार चरित्र में 'विशिष्टता' ढूंढते हैं, सामान्यता उनके लिए जैसे हेय है. ऐसे में प्रेमचंद याद आना स्वाभाविक है. संतोष जी भी इसी 'सामान्यता' की कथाकार हैं. जय प्रकाश जी ने ठीक ही लिखा  है उनकी कहानियों में सहजता का दुर्लभ स्वाद है.

       आज का स्त्री विमर्श वर्गीय भिन्नता से अपने को दूर रखता है, वह यह नही देखता की विभिन्न वर्गों के बीच स्त्री के शोषण के स्तर और रूप में भिन्नता होती है. वह यह भी नही देखता कि पुरुषमात्र स्त्री का शोषक नही होता, स्त्री और स्त्री के बीच भी ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और शोषण होता है.दरअसल आर्थिक विषमता सामाजिक विषमता को भी जन्म देती है, और वहां शोषक और शोषित का भेद ही मुख्य रह जाता है, स्त्री-पुरुष का नही. कहना न होगा कि संतोष झांझी जी की सहज दिखने वाली कहानियाँ इन विडम्बनाओं को उजागर करती हैं.'मछली' कहानी जहां पुरुष का की लोलुपता को चित्रित करती है वहीं 'पराये घर का दरवाजा', 'मौन आवाज़', 'कोहरा', 'युगांतर' आदि कहानियों में स्त्री द्वारा स्त्री के शोषण का चित्रण है.'फुरसत' कहानी में भी एक स्त्री की संवेदना को कोई नही समझ पाता; एक स्त्री भी.हमारा यहां यह मतलब नही है कि ये कहानियां स्त्री अत्याचार की कहानियां हैं; हमारा कहना है कि स्त्री समस्या का कारण जेंडर असमानता के साथ-साथ आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, व्यक्तिगत स्वार्थ, सामंती-पूंजीवादी मूल्य, आदि बहुत से हैं जिनका शिकार पुरुष वर्ग भी है, जो इन कहानियों से  स्पष्ट है.

         कुछ कहानियों जैसे 'ऋण', 'गोदावरी नानी', दुखवा मैं कासे कहूँ', 'पिस्सू' में वृद्धों की समस्याओं का चित्रण है.आज के इस बाज़ारवादी, उपयोगितावादी समाज मे वृद्धों को बोझ समझा जाता है, उनका महत्व तभी तक समझा जाता है जब तक उनसे आर्थिक हित जुड़ा होता है. लेकिन 'पलटवार' कहानी में ऐसी प्रवृत्तियों पर करारा जवाब है; पर हर कोई चोपड़ा सर की तरह आर्थिक रूप से सक्षम कहाँ होता है?

         कुछ और कहानियां जैसे 'भूख', 'कभी किसी दिन', 'पहेली है ये मन बेईमान' 'निरामिष', 'मिसकाल', 'मुआवजा', 'सपनो के पंख', अलग-अलग मानवीय संवेदनाओं और समस्याओं का चित्रण करती हैं. ये समस्याएं  छोटे जरूर लगते हैं, लेकिन ये हमारे समाज के अनिवार्य हिस्से हैं. 'भूख' और 'निरामिष' में बेमेल विवाह का कारण गरीबी ही है. 'मुआवजा' महत्वपूर्ण कहानी है जिसमे एक स्त्री को विकलांगता और गरीबी की दोहरी मार झेलनी पड़ती है.उस  पर भी समाज का स्वार्थी अभिजात वर्ग उनके हिस्से की मुआवजा खा जाते हैं. 'सपनो के पंख' में भी प्रचलित स्त्री विमर्श पर करारा व्यंग्य है. कहानी में कहीं नही लगता कि 'वीरों' के अधिकारों का हनन हो रहा है. सहजता या संकोची स्वभाव हमेशा गुलामी नही होता. 'अति क्रन्तिकारिता' साहित्य और समाज दोनों का अहित करता है.

         कुल मिलाकर ये कहानियां अपने शिल्प की सहजता, आकार की लघुता, कथानक की विविधता, विविध सांस्कृतिक परिवेश के कारण पाठकों को आकर्षित करती रहेंगी.

पराये घर का दरवाजा(कहानी संग्रह)
कथाकार-श्रीमती संतोष झांझी

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अजय चन्द्रवंशी
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