प्रसिद्ध जर्मन नाटककार और कवि बर्तोल्त ब्रेख्त के राजनीतिक व्यंग्य ‘इफ़ शार्क्स वर मैन’ का हिंदी अनुवाद….

मकान मालकिन की छोटी-सी बच्ची ने श्रीमान क्यूनर से पूछा, ‘अगर शार्क इंसान होतीं तो क्या वे नन्ही मछलियों के साथ अच्छा बर्ताव करतीं?

‘हां, बिलकुल’ उन्होंने जवाब दिया, ‘अगर शार्क इंसान होतीं तो वे नन्ही मछलियों के लिए समंदर में बड़े-बड़े बक्से बनवातीं. इनमें हर तरह का खाना होता, शाकाहारी भी और मांसाहारी भी. हमेशा ख्याल रखा जाता कि बक्सों में ताज़ा पानी रहे. कुल मिलाकर उनमें सभी सुविधाएं होतीं. मसलन किसी छोटी मछली का पंख यदि ज़ख़्मी हो जाता तो उसकी तुरंत मरहम-पट्टी होती ताकि वह मर न पाए और अपने समय से पहले शार्कों के लिए ख़त्म न हो जाए. दुखी मछलियों की बजाय ख़ुशहाल मछलियों का स्वाद अच्छा होता है सो मछलियों को ख़ुश रखने के लिए समय-समय पर बड़े-बड़े जल उत्सवों का आयोजन किया जाता.’

‘और हां, इन बड़े-बड़े बक्सों में स्कूल भी होते. इनमें नन्ही मछली सीखती कि कैसे तैर कर शार्क के जबड़े में समाना है. उन्हें भूगोल का अध्ययन करने की जरूरत भी पड़ती जिससे कि उन्हें उन विशालकाय शार्कों के बारे में पता चलता जो कहीं अलसायी हुई सी पड़ी रहती हैं.
हालांकि इन मछलियों की पढ़ाई का मुख्य विषय नैतिक शिक्षा होता. उन्हें पढ़ाया जाता कि खुशी-खुशी आत्मबलिदान से अच्छी और खूबसूरत दुनिया में कोई चीज़ नहीं है. उन सब को शार्कों पर विश्वास करना होता, ख़ासतौर पर तब जब वे कहतीं कि वे नन्हीं मछलियों के लिए एक सुंदर भविष्य का निर्माण कर रही हैं. मछलियों को पढ़ाया जाता कि उनका भविष्य तभी सुरक्षित है जब वे बात मानना सीखेंगी. नन्ही मछलियों को क्षुद्र भौतिकवादी, स्वार्थपूर्ण और मार्क्सवादी प्रवृत्तियों से सावधान रहना पड़ता और यदि उनका कोई साथी इनके चक्कर में पड़ता तो उन्हें तुरंत ही इसकी सूचना शार्कों को देनी होती.’

‘यदि शार्क इंसान होतीं तो वे एक दूसरे से मछलियों के बक्से और मछलियां छीनने के लिए युद्ध भी छेड़तीं. ये युद्ध उनके लिए उनकी नन्ही मछलियां ही लड़तीं. मछलियों को सिखाया जाता कि उनमें और दूसरी शार्कों की मछलियां में बहुत अंतर है.
शार्क घोषणा करतीं कि नन्हीं मछलियां बेजुबान होने के लिए पहचानी जाती हैं जबकि दूसरी मछलियां एक अलग ही भाषा में चुप रहतीं हैं इसलिए उनका एक दूसरे के साथ तालमेल बिठाना नामुमकिन है.
हर एक नन्ही मछली, जो अपनी ही भाषा में चुप रहने वाली कुछ दूसरी दुश्मन मछलियों को मारती, को समुद्री काई से बने मैडल दिए जाते और उन्हें नायक की उपाधि दी जाती.’

‘यदि शार्क इंसान होतीं तो वहां कला भी होती. ख़ूबसूरत तस्वीरें होतीं जिनमें शार्क के दांतों को अद्भुत रंगों में रंगा हुआ दिखाया जाता. उनका जबड़ा मनोरंजन पार्क की तरह दिखाया जाता जिनमें कोई भी उछलकूद मचाते हुए खेल सकता है. समंदर की तलछट में थियेटर होते जहां बहादुर नन्ही मछलियां ज़बरदस्त उत्साह के साथ शार्क के जबड़ों में तैरते हुए जातीं. संगीत इतना ख़ूबसूरत होता, साज़ों का संगत इतनी अच्छा होता कि नन्ही मछलियां इसमें खोई हुईं, ख़ुशी-ख़ुशी शार्कों के जबड़ों में समाने के लिए जातीं.’

‘यदि शार्क इंसान होतीं तो वहां धर्म भी होता.
इसकी शिक्षा होती कि नन्हीं मछलियों का असल जीवन शार्कों के पेट में जाने के बाद ही शुरू होता है.’

‘और शार्क इंसान होतीं तो नन्ही मछलियों में बराबरी भी ख़त्म हो जाती जैसा कि अभी है. कुछ को महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां देकर बाकी से ऊपर का दर्जा दे दिया जाता. जिनका आकार कुछ ज़्यादा बड़ा होता उन्हें अपने से छोटी मछलियां खाने की भी अनुमति होती. शार्कों के बीच इस पर सहमति होती क्योंकि तब उन्हें अमूमन खाने के लिए अक्सर बड़े-बड़े कौर मिलते.
बड़े आकार वाली नन्ही मछलियां, जिन्हें पद मिलते, बाकी मछलियों के बीच व्यवस्था का निर्माण करतीं. वे शिक्षक, अधिकारी और बॉक्स इंजीनियर आदि बनतीं.’

‘संक्षेप में कहें तो यदि शार्क इंसान होतीं तो वे समंदर में पहली बार संस्कृति की स्थापना करतीं.

Anuj Shrivastava

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