” अरपा ” को बचाने का मतलब है संस्कृति, सभ्यता,जीवनशैली व मानवीय मूल्यों को बचाना : गणेश कछवाहा.

अरपा नदी – इसका उद्गम पेण्ड्रा पठार की पहाड़ी से हुआ है। यह महानदी की सहायक नदी है। यह बिलासपुर तहसील में प्रवाहित होती है और बरतोरी के निकट ठाकुर देवा नामक स्थान पर शिवनाथ नदी में मिल जाती है। इसकी लम्बाई 147 किलोमीटर है।

मेरी जन्मभूमि है बिलासपुर में 25 जनवरी 1962 को गोलबाजार के पास काली मंदिर के पीछे तेलीपारा में एक मिट्टी के मकान में एक मध्यम परिवार में मेरा जन्म हुआ। वहां अभी वैष्णवी ट्रेडर्स ( रामदेव बाबा व आयुर्वेद उत्पाद की दुकान है )और पीछे अभी भी घर है।।मेरे पिताश्री काशी प्रसाद जी खपरगंज स्कूल में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। व्यवसाय व रोजगार के लिए पिताजी परिवार सहित रायगढ़ आ गये।पिताजी के बड़े भाई श्री लल्लु प्रसाद जी का परिवार बिलासपुर में ही रहा आज भी हैं।

इम्पीरियल गज़ेटियर ऑफ़ इंडिया के अनुसार शहर का नाम ‘बिलासपुर’, सत्रहवीं शताब्दी की मत्स्य-महिला ‘बिलासा’ के नाम पर पड़ा।बिलासपुर के बारे में माना जाता है की यह लम्बे समय तक मछुवारों की बस्ती रही है। बिलासपुर जिले का गठन 1861 में हुआ तथा बिलासपुर नगर निगम 1867 में अस्तित्व मे आया.1901 में बिलासपुर की जनसंख्या 18,987 थी जो कि ब्रिटिश राज के केंद्रीय सूबे में आठवीं सबसे बड़ी थी।और अब 2011 की जन गणना के अनुसार 335293 है।

मेरी स्मृति में चार पांच प्रमुख स्थल ही थे , गोलबाजार, लालबहादुर शास्त्री स्कूल,और उसका भव्य मैदान जहां बडी बडी सभाएं हुआ करती थी,पुलिस ग्राउंड,पुराना बसस्टैंड,रेलवे का जंक्शन ,रेलवे अधिकारियों कर्मचारियों के क्वाटर्स कालोनी व स्कूल ,तांगों की अपनी एक संगीतिय मनभावन संस्कृति, खेत – खलिहान एवं कलकल करती जीवन दायनी “अरपा ” की निश्छल जलधारा जो समूचे बिलासपुर की जीवनरेखा ही नहीं एक उन्मुक्त जीवन शैली भी थी। अरपा के घाटों में बच्चों का उछलकूद, युवाओं और बुजुर्गों को मानवीय रिश्तो- संबधों,और जीवन के ताने बाने को बुनते व सुलझते- सुलझाते देखा है। भावी योजनाओं को गढ़ने , राजनीतिक विमर्श एवं सामाजिक समरसता की भी साक्षी रही है ‘अरपा’।

अब बिलासपुर बहुत बदल गया है

बड़ी बडी इमारतें,कार्यालय,भवन,उच्चन्यायालय,व्यवसायिक परिसर, मंहगी भव्य कालोनियां, बिगबाज़ार,मॉल, होटल, बार तथा मनोरंजन , चमक दमक , चकाचौंध पश्चि से सराबोर क्लब व सेंटर सबकुछ बिलासपुर की उपलब्धि का हिस्सा हो गया है। हां अब तांगेऔर तांगे की संस्कृति दिखाई नहीं देती। विकास की प्रक्रिया में ऑटो रिक्शा ने शायद उसे इतिहास के पन्नों में दफ़न कर दिया है।खेत खलिहान और मछुआरे उतने नहीं रहे।जो सबसे अधिक चिंताजनक है , मन को अंदर से झकझोर देती है कि अब बिलासपुर की अस्मिता “अरपा” नदी के तट पर ,टीलों और घाटों पर बच्चों के उछलकूद उनकी नटखट टोलियाँ,तथा अरपा के परछी और घाट दिखाई नहीं पड़ते।परछी और घाटों पर जीवन के अनुभवों, सुख दुख को बांटते बुजुर्गों की आराम मस्ती से भरी चहल पहल ,अरपा नदी की वो कलकल करती जलधारा दिखाई नहीं पड़ती।शहर के हृदय स्थल आते आते सबको जीवन देने वाली अरपा स्वयं दम तोड़ती दिखती है।

बिलासपुर की अस्मिता,जीवन रेखा,सभ्यता व संस्कृति की प्रतीक ‘अरपा’ कहीं मलबों में दबकर सिसकती दिखाई पड़ती है।तो कहीं विकास के नाम पर ही उसके अस्तित्व को ही समाप्त करने की गहरी साज़िश दिखाई देती है।पूंजीपतियों ,उद्योगपतियों एवं धन्ना सेठों द्वारा पूंजी की हवश के चलते अरपा को खुलेआम लूटते हुए आम जनता बेवश हो देख रही है।”अरपा नदी ” के कलकल करती जलधारा की मधुर संगीत स्वरलहरियां, उसके पावन पवित्र जीवन दायनी स्वरूप को देखना,सुखद अनुभूति को पाना अब दुर्लभ सा हो गया है।
सोचता हूं।ढूंढता हूं। पूछता हूं कहां खो गया है मेरा बिलासपुर?

“अरपा ” बच पाएगी या नहीं? अरपा को बचा पाएंगे या नहीं?अरपा में घाट की संस्कृति आबादी, बसाहट की तरह पुरानी है। । पचरीघाट के पास जनकबाई घाट अपनी पुरातन संस्कृति की याद दिलाती है। हालांकि इसके लोकार्पण का पत्थर गायब हो चुका है। वक्त के निर्मम थपेड़ों ने घाट को जीर्ण जीर्ण दशा में पहुंचा दिया है। ब्रितानीराज में इसकी स्थापना शंकर राव बापते, गोविंद राव बापते(अब स्वर्गीय) के परिवार ने की। इसके लोकार्पण पर अरपा तट की साज सज्जा की तस्वीर बापते परिवार के पास वर्षों तक रही। दिनचर्या से लेकर समस्त संस्कारों के दौरान जमाने से यह घाट एक समाज के मिलन स्थल बने रहे। पचरीघाट जूना बिलासपुर की स्थाई पहचान बन चुका है। जिस नदी के घाट लोगों को मिलाने का काम करते रहे हों, उसकी सुरक्षा तो लोगों को ही करनी होगी।

कुछ लोग 56 इंच का सीना तान कर कहते हैं कि बिलासपुर का चहुँमुखी विकास हुआ है। पर्यावरण विद, सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकार के पक्षधर,संस्कृतिकर्मी,बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक एवं प्रबुद्धजन चिंतित हैं। यह जानना चाहते हैं कि विकास का मतलब क्या है?और यह कैसा विकास है ? जहां जीवन और प्रकृति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाये, संस्कृति और सभ्यता नष्ट हो रही हो, सामाजिक ताने बाने के बिखरने और टूटने का खतरा बढ़ रहा हो,बिलासपुर की अस्मिता व जीवनरेखा कही जाने वाली “अरपा”का अस्तित्व ही समाप्त होने की कगार में हो। सवाल यह है कि जिन पर रक्षा करने का नैतिक व संवैधानिक जिम्मेदारी व अधिकार हो यदि वे ही विकास के नाम पर विनाश की गाथा लिखने लगेंगें तो क्या होगा?यदि लोगों का जीवन ही नही बचेगा?प्रकृति,संस्कृति व सभ्यता ही नहीं बचेगी?तो उस विकास का क्या करेंगे?

एक रिपोर्ट के अनुसार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल दिल्ली द्वारा वर्ष 2015 से लगातार नगरीय निकायों कोआदेश जारी कर चेतावनी दी जा रही, है कि वे नदी, तालाब या अन्य जलस्रोतों के आसपास कचरा और मलबा डंंप न कराएं। लेकिन निगम प्रशासन और सीवरेज के ठेकेदारों ने उसी अरपा नदी को कचरे और मलबे से पाट डाला ।तत्कालीन नगरीय प्रशासन मंत्री ने तो लंदन की टेम्स नदी की तर्ज पर विकसित करने का सपना दिखाकर 18 अरब 58 करोड़ की योजना बनाई। जिसमें करोड़ों रुपए खर्च भी हो चुके हैं। और यह योजना अभी तक कागज पर ही चल रही है। गड्ढे,मलवे और कचरों के ढेर शहर के सौंदर्य बढ़ाते नजर आते हैं।

जब संवैधानिक पद पर आसीन जनप्रतिनिधि संवैधानिक पदों की रक्षा कर सकने में समर्थ न हो,स्वयं गुलामी की मानसिकता से जकड़ा हो उससे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं।? एक सामुदायिक भवन के लोकार्पण कार्यक्रम जिसके मुख्य अतिथि नगरीय प्रशासन मंत्री थे और महापौर विशिष्ट अतिथि थे । मंत्री महोदय नहीं पहुंच पाए उनकी जगह मंत्री पुत्र आये और वे मुख्य अतिथि हो गये । महापौर की उपस्थिति में मंत्री पुत्र मुख्य अतिथि हो गये यह बात कुछ समझ में नहीं आई।इतना ही नहीं स्वयं महापौर मंत्री पुत्र की स्तुति गान में लगकर अपने आप को सबसे बड़ा भाग्यशाली व्यक्ति बतलाने की मशक्कत कर रहे थे।मैं उस कार्यक्रम में मौजूद था।मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह हो क्या रहा है?क्या यह संविधान या प्रोटोकॉल का उल्लंघन नहीं है? गुलाम मानसिकता का परिचायक नहीं है?संवैधानिक पद और उसकी गरिमा का सार्वजनिक अपमान नहीं है? सवाल यह उठता है कि जो स्वयं अपने संवैधानिक पद की गरिमा की रक्षा करने में समर्थ नहीं हो , उनसे जनता के आत्मसम्मान की रक्षा या “अरपा” को बचाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?।यह सवाल काफी अहम विचारणीय और चिंताजनक है।

वैसे बिलासपुर का भौतिक , भगौलिक और आर्थिक विकास बहुत हुआ है।परन्तु जीवन,प्रकृति, संस्कृति, सभ्यता,सामाजिक ताने-बाने ,मानवीय मूल्य,प्राकृतिक संसाधन,इतिहास, विरासत और धरोहर को बचाने के संघर्ष से जूझता दिखाई पड़ता है।

गणेश कछवाहा
रायगढ़ छत्तीसगढ़

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