जीने को कुछ नही फिर भी चल रही है जिंदगी , जगरगुंडा जो कभी गॉव था

जीने को कुछ नही फिर भी चल रही है जिंदगी , जगरगुंडा जो कभी गॉव था 
नितिन  त्रिपाठी [ पत्रिका ]
 रेड कोरिडोर में बसा दक्षिण बस्तर का सुकमा ब्लॉक में जगरगुंडा गॉव ,देश में माओवाद से प्रभावित  गॉव में सबसे ऊपर है ,यहाँ जिंदगी बहुत कठिन हैं ,राशन के लिए आदिवासियों को मीलो  चक्कर लगाना पड़ता हैं ,या ऐसी चीजो को खाना पड़ता ही जो इंसानो के खाने के लिए बिलकुल नहीं हैं ,यहाँ राशन के आभाव में लोग भुखमरी की कगार पे हैं ,नौबत यहाँ तक आ गई है की लोग चूहे खाने को मजबूर हो गए हैं ,वही  उनके मासूम बच्चे चावल का माङ  पीने  को मजबूर हैं ,
भुखमरी के कगार पे खड़ा परिवार  सोडी भीमा का हैं ,यह उन आदिवासी परिवारो में से एक यही जिन्हे सलवा जुडूम शुरू होने पे परिवार सही बसाया गया था। सलवा जुडूम के चलते इस पुरे गॉव को राहत शिविर में तब्दील कर के आसपास के गॉव के लोगो को यही बसाया  था ,यहाँ कोई बात करने को तैयार  नहीं था , बड़ी मुश्किल से भीमा बात करने को राजी हुआ।  भीमा ने बताया की जो राशन सरकार ने भिजवाया था वि तो कब का खत्म हो गया , आज तीन दिन से एक दाना  भी खाने को नहीं हैं ,आसपास के आदिवासी डर के मरे अपना नाम तक बताने को तैयार नहीं हैं।  
इसका कारण  पूछने पे मालूम हुआ की इनको लगता है की इस मुश्किल दौर में जो सीआरपी के लोग थोड़ा बहुत अनाज इन्हे देते है वो भी बंद हो जायेगा ,और बच्चे भूखे मर जायेंगे , इससे ये बात तो तय है की इनके परिवार को भूख से बचने के लिए जोअनाज मिल प् रहा हैं वो सीआरपी वाले ही दे रहे हैं। बताया गया की एक सप्ताह पहले एक लड़का भूख से परेशान जंगल में वनोपज बीनने गया था ,तो उसकी लाश ही जंगल में  मिली। हालत ऐसे है किउसका पोस्ट मार्टम करवाना भी मुश्किल था , ले दिनों हेलीकॉप्टर का इंतजार करने के बाद जब वो नहीं आया और उसकी लाश सड़ने लगी तो रोड ओपनिंग पार्टी के साथ दोरनापाल पहुचाया गया ,
देश का ये एकमात्र गॉव है जिसकी  रक्षा  देश की सीमाओ की तरह होती है ,करीब पांच हजार की आबादी वाला ये गॉव कटीले तारो से घिरा हैं ,गॉव की चोकसी के लिए 270 वी  बटालियन के अलावा 201  कोरबा बटालियन और पुलिस बल  भी तैनात हैं ,शाम 6  बजे  प्रवेश द्वार बंद  कर दिया जाता हैं ,इसके बाद कोई व्यक्ति न तो गॉव से बहार जा सकते यही और न ही कोई अंदर आ सकता हैं ,पहरा इतना सख्त है की बिना कोई खास कारण  बताये आप गॉव में प्रवेश नहीं का सकते हैं , सलवा जुडूम के समय  इस गॉव को राहत शिविर में बदल दिया गया था ,जब से ये गॉव माओवादियों के निशाने पे हैं ,और भी बहुत से शिविर बनाये गए थे , लेकिन अब सिर्फ यही शिविर बचा है बांकी सब बंद हो गए हैं।  
किसी समय बेहतरीन स्टेट हाइवे  56
 पे आजकल सिर्फ दहशत फैली हैं ,इस सड़क  पे हर वो गॉव है जो कभी सुर्ख़ियो में रहा हैं पोलमपद्दी ,पूसावाङा ,कांकेर लंका ,चित्तागुफा ,चिंतलनार  ,नसरवाड़ा में सीआरपी केम्प बनाये जा चुके हैं , इनके सामने पहुँचते ही आप एके 47 या एलएमजी  के निशाने पे होते हैं ,सिपाही रोबदार  आवाज़ से गाड़ी सड़क पे ही छोड़ के आने को  कहता हैं. फिर शुतु हो जाता है पूछ ताझ का सिलसिला ,कहा से आये हो ,क्यों आये हो ,कोण साथ है ,कब लौटोगे ,गड़ी का नंबर क्या है ,वगैरा वगैरा। और हाँ  आईकार्ड तो होना हो चाहिए, और ऐसी पूछ ताछ रस्ते में मिलन ेवाले आठो केम्प में होती हैं ,सी आर पी के लोगो को ये भरोसा  दिलाना मुश्किल है की आप माओवादियों से मिलने नहीं जा रहे हो ,यदि नहीं तो फिर इतने घने जंगलो में जा क्यों रहे हो, 
हर जगह आतंक के निशान 
माओवाद पे अंकुश  लगाने के लिए सरकार ने 8  केम्प दोरनापाल से जगरगुंडा के बीच  लगा दिया है , इसके अलावा  जगरगुंडा में सीआरपी का बेसकेम्प भी हैं , बाबजूद इसके माओवादियों की धमक यहाँ आसानी से सुनाई देती हैं।  सड़क पे आवाजाही न का बराबर है ,हर जगह सेना केलोग हथियार सही मौजूद है , लेकिन ज्यो ज्यो आगे बढ़ते है सड़क पे सन्नाटा छा  जाता हैं , पुसवाड़ा  और मल्ले गॉव के पल बिस्फोट लगा के उड़ा दिया हैं ,स्कुल भवन ध्वस्त कर दिए गए हैं ,यहाँ तक की बिजली के पोल भी गिरा दिये  गए हैं ,सालो बाद भी सरकार इस मंजर को बदल नहीं पाई हैं सड़क तो दूर की बात है अभी तक स्कुल तक शुरू नहीं कर पाई है सरकार , आज भी 24 गॉव के स्कुल पोलमपल्ली में संचालित हो रहे हैं ,चिंतलनार आखरी गॉव है जहा राशन दुकान हैं , और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी ,इसके बाद न तो जवान दीखते है और न ही ग्रामीण सड़क बुरी तरह ख़राब हो गई है ,आवाजाही न होने के कारन झाड़ियाँ  सड़क पे आ गई हैं।  पहली कोशिश तो यही होती है की अँधेरा होने के पहले यह ऎसे निकला जाये। क्यों की सीआरपी केम्प में शरण मिलना तो दूर वहां सामने से गुजरने तक की इजाज़त  तक नहीं मिलती और गॉव मे  रुकना भी संभव नहीं है क्यों कि पहली बात तो ये की ग्रामीण भी तैयार नहींहोता फिर भरोसे का भी सवाल हैं। 
सात महीने  पहले राशन  आया था 
इस गॉव में  6  महीने में एक  बार ही राशन पहुचाया जाता हैं  ,आखरी बार 2  मार्च 2014
 को राशन आया था ,अगर सरकार का दावा 6  महीने  पहुचने का भी हो तो भी उसे ख़तम हुये दो  महीने हो गए हैं। जगरगुंडा  थाने   का  परिसर  अब बच्चो के खेलने का मैदान बन गया हैं जर्जर हाल खड़ी बख्तर बंद गाड़ियों के आसपास खेलते बच्चे अब जवानो के आदी हो  गए हैं गॉव के लोग अब अपने  झगड़े सुलझाने थाने  नहीं जाते बल्कि राशन और भूख की शिकायत  लेके जाते हैं ,वहाँ  पे  तैनात सिपाही बताता है की लोग रोज पूछने आते है की  राशन  कब आएगा ,मुश्किल तो ये भी है की थाने  का भी राशन खत्म हो गया होता हैं। इन्स्पेकर संजय शिंदे ने बताया की यहाँ लोग अपनी कोई रिपोर्ट लिखने नहीं आते ,सिर्फ नक्सली वारदात की ही रिपोर्ट होती हैं। 

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