नक्सल आरोपो में बंद आदिवासियों के मामलों में समीक्षा शुरू ,वर्षो अटकी रहती है.सुनवाई, जंगल से शहर आ नही पाते परिजन.: फर्जी मामलों में जेल में बंद आदिवासियों को राहत की उम्मीद.


रायपुर । नईदुनिया राज्य ब्यूरो


छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सल मामलों में सालों से बिना ट्रायल के जेल में पड़े आदिवासियों के मामलों की समीक्षा के लिए जो कमेटी गठित की है उसने काम शुरू कर दिया है । इससे ऐसे आदिवासियों के लिए राहत की खबर आई है जो फर्जी मामलों में सालों तक जेल काटते हैं । कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादा किया था कि सत्ता में आए तो नक्सल इलाकों में जेलों में बंद आदिवासियों के प्रकरणों की समीक्षा करेंगे । सरकार ने  सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एके पटनायक की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गई सोमवार को इस कमेटी की पहली बैठक आयोजित ,की गई थी । इसके साथ ही चार हजार से ज्यादा मामलों की समीक्षा का काम शुरू हो चुका है ।


 नईदुनिया की पड़ताल में ऐसे कई प्रकरण सामने आए हैं जिनमें आदिवासी वर्षों तक जेल में रहे और बाद में निर्दोष साबित हुए । उन्हें जेल में इसलिए रहना पड़ा क्योंकि उनकी मदद करने के लिए कोई न था । दूरदराज के जंगलों से नक्सल आरोप में पकड़े गए आदिवासियों की न पैरवी हो पाती है न सुनवाई । अधिकांश मामलों में उनके परिजन जेल में उनसे मिलने तक नहीं आ पाते । हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले आए हैं जिनसे साफ होता है कि नक्सल इलाकों में आदिवासी दो पाटों के बीच फंसे हुए हैं । निर्दोष आदिवासियों की रिहाई के लिए कानूनी सहायता देने वाली संस्था लीगल एड ग्रुप की शालिनी गेरा कहती हैं कि कई मामले तो बेहद विचित्र हैं । बस्तर की जेलों में नक्सल मामले में बंद आदिवासी खुद भी नहीं जानते कि उनका कसूर क्या है । बस्तर की जेलों में दो हजार से ज्यादा आदिवासी बंद हैं । इनमें 84 फीसद से ज्यादा नक्सल मामलों में बंद हैं ।


ऐसे ऐसे मामले


केस (1)
जुलाई 2007 में नक्सलियों ने सुकमा जिले के एर्राबोर सलवा जुडूम कैंप पर हमला कर 23 जवानों की हत्या की । एक जवान की रिपोर्ट पर मामला दर्ज किया गया । जवान ने दावा किया कि उसने हमले के वक्त कुल 50 नक्सलियों को देखा था और उनके नाम सुने थे । एफआईआर दर्ज होने के पांच महीने बाद उसी जवान ने 50 की जगह 53 नाम बताए । जो तीन और नाम जोड़े गए उसमें बोरगुड़ा गांव की 18 साल की कवासी हिडमें का नाम भी  शामिल था । हिडमे को जनवरी 2008 गिरफ्तार किया गया । कोर्ट में जवान बयान पलट दिया लेकिन हिडमे की जमानत या रिहाई न हो पाई . केस  में विवेचना अधिकारी और डॉक्टर का बयान होना था । इन दोनों के बयान के इंतजार में हिंडमें ने सात साल जेल में बिताया । 2015 में वह   रिहा हुई .उसने हाईकोर्ट में पुलिस के खिलाफ यौन उत्पीड़न का केस दायर किया है । 


केस [2]

)2008 में बीजापुर जिले के नेड्रा गांव के इरपानारायण  को पकड़ा गया । उसके साथ उसी केस में सावनार गांव के मिडियम लच्छू और पुनम भीमा को भी पकड़ा गया था । यह केस एक जवान के बयान पर आधारित था जिसमें उसने दावा किया था कि मुठभेड़ के मौके पर  तीर – धनुष लिए हुए इरपा को पकड़ा गया था । छह साल तक बिना सुनवाई के तीनों आदिवासी जेल में पड़े रहे । इरपा का नाम तो केस डायरी में था पर बाकी दो का तो कहीं नाम भी नहीं था फिर भी जेल में थे । बाद में तीनों बरी हुए । 

केस [ 3 ]

2007 में बीजापुर के  पामेड़ से 60 साल के कुंजामी पुष्पा को नक्सल आरोप में पकड़ा गया । 2010 तक उसके केस में सभी  गवाही पूरी हो गई पर विवेचना अधिकारी और डॉक्टर की गवाही 2016 तक बची  रही वह आखिरी तक इस बात के लिए  परेशान था कि कोई उसके गांव से यह पता कर दे कि उसकी पत्नी अभी है या नहीं

अस्पताल के बिस्तर पर हुई मौत,नही मिली जमानत .


बीजापुर जिले के वेको भीमा को नक्सल आरोप में 2008 में पकड़ा गया था 2014 तक उसके मामले में कोई सुनवाई नहीं हुई  वकील कहते रहे कि अगर गवाह नहीं आ रहे हैं तो केस का निपटारा किया जाए लेकिन कोर्ट नहीं माना  बाद में भीमा की तबीयत बिगड़ गई । उसे रायपुर के मेकाहारा लाया गया जहां डॉक्टरों ने बताया कि उसे कैंसर है  इसके बाद कोर्ट ने गवाही खत्म कर दी पर जमानत इसलिए नहीं दी कि नक्सल केस में जमानत नहीं हो सकती । कोर्ट ने  कहा कि हम उसे रिहा कर सकते हैं , पर जरूरी है कि अभियुक्त का कथन कोर्ट में हो । गवाह को कोर्ट लाया नहीं जा सकता था इसलिए रिहाई नहीं हुई । और अस्पताल में ही भीमा की मौत हो गई । नियम कहता है कि अगर कोई सजायाफ्ता कैदी मृत्युशैया पर हो तो जेलर उसे उसके घर भिजवा दे ताकि वह अंतिम सांस अपने लोगों के बीच ले , लेकिन विचाराधीन बंदी के मामले में कोर्ट ही निर्णय ले सकता है इसलिए भीमा को घर पर नहीं ले जाया जा सका ।

और एक मामला ऐसा भी ……


2010 में पुलिस के एक जवान नोबल खलको की नक्सली घटना में मृत्यु हो गई । साथी जवान बामन राव की शिकायत पर पांच लोगों पर नामजद एफआइआर दर्ज की गई । मामला । कोर्ट में गया तो वामनराव पुलिस को दिए अपने बयान से पलट गया और कहा कि इन पांच में से कोई भी वारदात मे शामिल नहीं था । तीन साल के बाद बामन राव ने फिर एक एफआइआर उसी वारदात के लिए दर्ज कराई । इस बार उसने पहले रिहा हो चुके पांच लोगों के अलावा तीन अन्य का भी नाम लिया । उसके बयान के आधार पर पुलिस ने खत्म हो चुक मामले की फिर से ओपन किया है ।
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